गुजरात लोकायुक्‍त विवाद-२ : अहं ब्रह्मास्मि!

गुजरात की सरकार और प्रदेश के राज्यपाल के बीच उभरे मन-भेद पर गुजरात उच्च न्यायालय की इबारत में भारतीय लोक-तन्त्र के लिए स्वीकारे गये संघीय स्वरूप की कितनी और कैसी समझ रही, अथवा भारतीय न्याय-व्यवस्था देश के लोक-तान्त्रिक संविधान को किस स्वरूप में फलते-फूलते देखना चाहती है, इसका आभास उच्चतम न्यायालय की दहलीज से ही आयेगा।


सरसरे ढंग से देखने से भले ही यह लगे कि लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति को लेकर गुजरात में उठा तूफ़ान एक कानूनी विवाद-मात्र है। लेकिन इस विवाद के दूसरे, अधिक महत्‍व-पूर्ण, कुछ ऐसे पक्ष भी हैं जिनकी उपेक्षा करना भारतीय लोक-तान्त्रिक प्रक्रिया के लिए सचमुच घातक होगा। महत्व-पूर्ण तो यह भी है कि लोक-तन्त्र के आधारभूत कहे जा सकने वाले इन पक्षों को, उनमें विहित पूरी गम्भीरता से, जन-मानस तक पहुँचाने में अहम्‌ भूमिका और किसी ने नहीं बल्कि स्वयं मोदी-विरोधी ताकतों ने ही निभायी है। अन-जाने में। और, नहीं चाहते हुए भी।

यहाँ यह कहना भी किसी लक्ष्‍मण-रेखा को लाँघने जितना गम्भीर नहीं होगा कि गुजरात उच्च न्यायालय ने भी, जाने या अन-जाने, कानूनी क्लिष्‍टताओं से जुड़ी, समाज की, कुछ ऐसी ही विडम्बना पर अपनी उँगली टिकायी है। न्याय-मूर्ति अकील क़ुरैशी द्वारा अपनी और न्याय-मूर्ति सोनिया गोकानी की खण्ड-पीठ की ओर से लोकायुक्‍त विवाद के इस बहु-चर्चित मामले में १० अक्‍टूबर २०११ को सुनाये अपने फ़ैसले की शुरूआत जिस संक्षिप्‍त सी टिप्पणी से की गयी उसका सार है कि कानून का दायरा, यदा-कदा, एक न एक ऐसा मुद्दा उछालता ही रहता है जिसको लेकर की जाने वाली समीक्षाओं से कागज की थप्पियों का अम्बार तो अट जाता है किन्तु ऐसा निर्णय मिल पाना छलावे जैसा ही होता है जो पक्ष-विशेष के पूरी तरह अनुकूल हो। विद्वान न्यायाधीशों का मत था कि गुजरात लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति का विवाद उन ऐसे ही मामलों में शामिल है जिनकी ओर व्यापक जन-रुचि आकृष्‍ट हुई।

एक-एक के विभाजित मत से पारित निर्णय की इस संक्षिप्‍त भूमिका ने जैसे स्वयं ही घोषणा कर दी है कि गुजरात लोकायुक्‍त का मामला सहज कानूनी तर्क-वितर्कों और उनकी महज वैधानिक समीक्षाओं से कहीं बहुत ऊपर है। एक न्यायिक निर्णय की ऐसी टिप्पणियाँ देश और समाज को इस बात के लिए प्रेरित करेंगी ही करेंगी कि गुजरात लोकपाल मामले की ऐसी व्यापक समीक्षा भी की जानी चाहिए जिसका दायरा, इसके वैधानिक पक्षों से इतर, व्यवहारिक और सामाजिक ईमान की कसौटी पर कसा हुआ हो। एक न्यायिक निर्णय का ऐसा परोक्ष आमंत्रण इसे स्वीकारने वाले को इतनी छूट तो देता ही है कि लोक-तन्त्र को स्वीकार्य विशुद्ध सामजिक नीयत से की जाने वाली उसकी ईमान-दार कोशिश, लक्ष्‍मण-रेखा के इस पार ही सीमित रहते हुए, किंचित्‌ कानूनी ताक-झाँक भी कर सके।

कागजों पर, गुजरात उच्च न्यायालय की खण्ड-पीठ ने राज्य सरकार की ओर से प्रारम्भ किये उस न्यायिक विवाद पर अपना निर्णय सुनाया था जिसके माध्यम से उसने गुजरात उच्च न्यायालय के अवकाश-प्राप्‍त न्यायाधीश आर ए मेहता को लोकायुक्‍त के पद पर नियुक्‍त किये जाने की २५ अगस्‍त २०११ की राज्यपाल की घोषणा को निरस्त करने का निवेदन किया था। परिवाद के केन्द्र में भारतीय संविधान के वे प्राण-वान, किन्तु अत्यन्त नाजुक, तन्तु थे जिन्हें लिखा तो नहीं गया है लेकिन जिनके बारे में यह मान कर अवश्य चला जाता है कि उनका ‘सम्मान किया जाना’ चाहिए। राज्य सरकार ने राज्यपाल के निर्णय को मुख्य रूप से जिन तीन आधारों पर चुनौती दी थी वे यह थे —

(१) लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति के मामले में राज्य सरकार को अधिकार है कि वह राज्य उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के सुझाव को अस्वीकार कर दे,

(२) राज्यपाल द्वारा परामर्श-प्रक्रिया की पूरी कमान को अपने हाथ में ले लेना, और कानून की अन-देखी करते हुए उसी के आधार पर, लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति करना पूरी तरह से अनियमित था, और

(३) राज्यपाल ने इस संवैधानिक पहलू की खुली अवहेलना की थी कि राज्यपाल को, किसी भी स्थिति में, अधिकार प्राप्‍त नहीं है कि वह मन्त्रि-परिषद्‌ के परामर्श और उसकी सहायता के बगैर, स्वयं अपने स्तर पर ही, कोई निर्णय ले सके।

आम नागरिक की समझ से देखें तो, मुद्दे पूरी तरह से कानूनी-मात्र थे। और, न्यायिक इतिहास बतलाता है कि इनसे मिलते-जुलते सवालों पर, घुमा-फिरा कर ही सही, अनेक बार न्यायिक विचार किया जा चुका है। वहीं दूसरी ओर, सचाई यह भी है कि न्याय-पालिका अन्ततोगत्वा एक संस्था-मात्र है जिसके प्राणों का संचारी भाव उसमें, समय-समय पर, प्रतिष्‍ठित होने वाले व्यक्‍तियों में ही निहित है। इसीलिए समय, काल और परिस्थितियों के फेर में ऐसे सवाल ‘दृष्‍टि-कोण’ के ज्वलन्त मत-भेद के नाम पर शाश्‍वत्‌ रूप से जीवन्त रहे हैं। सम्भवत:, भविष्य में भी रहेंगे। यों, गुजरात लोकायुक्‍त विवाद के कारक के रूप में अनेक संवैधानिक प्रावधानों की अपनी-अपनी भूमिकाओं को रखा जा सकता है किन्तु ऐसा मानने के कारण हैं कि गुजरात लोकायुक्‍त का मामला मूलत: इसी एक धुरी के चौगिर्द पनपा और पोषित हुआ है कि प्रावधान-विशेष की यथार्थ व्याख्या आखिर क्या होगी? विशेष रूप से इसलिए कि भारतीय न्यायिक इतिहास साक्षी है कि काल-प्रवाह में कोई भी न्यायिक व्याख्या अन्तिम या अकाट्य नहीं रह पाती है।

सुखद संयोग है कि, इन और इस तरह के सारे मत-वैभिन्य के बाद भी, इसे अभी तक निर्विवाद न्यायिक निष्‍कर्ष ही माना गया है कि, उन कुछ विशेष स्थितियों को छोड़ कर जिनमें राज्यपाल को अन्यथा स्वतन्त्र रूप से निर्णय लेने के सुस्पष्‍ट संवैधानिक प्रावधान किये गये हों, राज्यपाल को राज्य मन्त्रि-परिषद्‌ के परामर्श और उसकी सहायता से ही अपने दायित्‍वों का निर्वाह करना होगा। इस न्यायिक निर्विवादिता को भारतीय लोक-तन्त्र के लिए स्वीकारे गये संघीय ढाँचे की आत्मा तक कहा जा सकता है। किन्तु दु:खद संकेत यह हैं कि गुजरात लोकपाल विवाद की नींव इस आत्मा को चर-मरा देने की राजनैतिक नीयत पर ही रखी गयी। शुरूआत तो इसी एक प्रयास से हुई कि १९८६ में पारित हुए गुजरात लोकायुक्‍त अधिनियम में धारा ३ के अन्तर्गत्‌ लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति का जो प्रावधान किया गया उसमें ऐसा आभास देने का प्रयास किया गया कि नियुक्‍ति की इस प्रक्रिया में मुख्य मन्त्री की किंचित्‌ भागीदारी की भी हैसियत ‘अतिक्रमण’ करने के तुल्य होगी! सामने आये तथ्य साक्षी हैं कि बाद के तनाव-भरे दिनों में प्रदेश के राज्यपाल ने इस दूषित और कुतर्की मंशा को भर-सक हवा दी। हवा देने का भाव किस सीमा तक विस्तृत था इसके अनुमान के लिए इस एक घटना-क्रम को परखा जा सकता है

संसद्‌ के गलियारों में लोकपाल की नियुक्‍ति को लेकर उठे बवण्डर के दौर में ही गुजरात राज्य विधान सभा ने राज्य-लोकायुक्‍त के दायरे को और अधिक व्यापक व प्रभावी बनाने की नीयत वाला गुजरात लोकायुक्‍त (संशोधन) बिल, २०११ पारित किया। ३० मार्च २०११ को पारित इस बिल को राज्य सरकार ने हस्ताक्षर के लिए राज्यपाल के पास भेजा। किन्तु, उन्होंने अपनी इस आपत्ति पर विचार करने के सुझाव के साथ उसे वापस भेज दिया कि, वह चाहे कितना भी योग्य और क्षमता-वान क्यों न हो, दायित्‍व के दायरे में प्रस्तावित विस्तार के बाद लोकायुक्‍त के लिए सम्भव नहीं हो सकेगा कि वह उसके सामने प्रस्तुत होने वाली समस्त शिकायतों पर विचार कर पाये। इस पर, राज्य सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया जिसमें इकलौते लोकायुक्‍त के स्थान पर लोकायुक्‍त संस्था में एक अध्यक्ष और अधिकतम्‌ दो सदस्यों की नियुक्‍ति किये जाने का प्रावधान किया गया।

अध्यादेश में यह प्रावधान था कि मन्त्रि-परिषद्‌ के परामर्श और उसकी सहायता से राज्यपाल इन नियुक्‍तियों को करेंगे। इसी अध्यादेश में यह प्रावधान भी किया गया था कि इन नियुक्‍तियों का आधार मुख्य मन्त्री की अध्यक्षता में गठित होने वाली पाँच सदस्यों की एक समिति से मिलने वाला सुझाव होगा। प्रस्ताव किया गया कि इस समिति में गुजरात विधान सभा का अध्यक्ष, राज्य का कानून मन्त्री, राज्य उच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश द्वारा नामांकित एक विद्यमान न्यायाधीश तथा विधान सभा में नेता प्रति-पक्ष सम्मिलित होंगे। अनेक कारणों को दर्शाते हुए, राज्यपाल ने इसे भी वापस भेज दिया। एक कारण तो यही बतलाया गया कि राज्यपाल को ऐसा कोई कारण नहीं दिखलाई पड़ रहा था जिसके लिए इस अध्यादेश को इतने आनन-फानन में लाया जाए। इसके अलावा, यह भी कहा गया कि मुख्य न्यायाधीश ने पहले ही लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति के लिए एक नाम प्रस्तावित किया हुआ है और उसकी नियुक्‍ति का मामला अन्तिम चरण में है।

सारा घटना-क्रम २० अगस्त २०११ तक घट गया जिसके बाद, २५ अगस्‍त २०११ को ही, राज्यपाल ने आर ए मेहता को लोकायुक्‍त नियुक्‍त करने का अपना आदेश, आनन-फानन में, जारी कर दिया। मोदी-विरोधी भले ही मनाही की कसमें खायें लेकिन इस नीयत को छिपा पाना असम्भव ही है कि नये संशोधन बिल को ठुकराने के पीछे यह सोची-समझी, विशुद्ध राज-नैतिक, रण-नीति काम कर रही थी कि लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति की प्रक्रिया से मुख्य मन्त्री को बाहर ही ठेले रखा जाए। हाँ, आड़ के लिए मुख्य न्यायाधीश से मिले परामर्श की प्राथमिकता और श्रेष्‍ठता के तकनीकी आधार को भी, अतिरिक्‍त मदद-गार की तरह, चुना गया।

मार्च-अगस्त २०११ के इस घटना-क्रम की तुलना २००६-२००९ के अतीत के दूसरे घटना-क्रम से करना बड़ा रोचक होगा। निर्विवाद सचाई है कि गुजरात के मुख्य मन्त्री ने लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति के लिए अपनी पहल के रूप में ७ अगस्त २००६ को राज्य के कार्य-कारी मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा। ८ अगस्त को ही उन्होंने मुख्य मन्त्री द्वारा प्रस्तावित नाम पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी। १० अगस्त को सरकार ने नियुक्‍ति की गेंद राज्यपाल के पाले में डाल दी।

लेकिन राज्यपाल ने भिन्न-भिन्न शंकाओं, स्पष्‍टी-करणों और कारणों के नाम पर प्रस्तावित हुए इस नाम को, अपने स्तर पर, पूरे एक साल तक तब तक लटकाये रखा जब तक कि उन्हें यह सुनिश्‍चित नहीं हो गया कि अन्यत्र हो चुकी किसी अन्य नियुक्‍ति के तकनीकी आधार पर उस व्यक्‍ति ने प्रस्तावित नियुक्‍ति की अपनी पात्रता खो दी है। जैसे इतना ही पर्याप्‍त न हुआ हो, इसके बाद भी, कतिपय सुविधा-जनक अवसर को पा चुकने तक की प्रतीक्षा कर चुकने तक लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति की प्रक्रिया को राज्यपाल ने अगले एक साल से भी अधिक समय तक ठण्डे बस्ते में डाले रखा। एक नाम-विशेष के प्रति, हठ पूर्वक, इतने ठण्डे रुख को अपना्ये जाने के बाद प्रदेश के राज्यपाल द्वारा लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति को लेकर दर्शायी गयी ऐसी अनोखी उत्कण्ठा आम प्रबुद्ध भारतीय जन को इतनी विरोधाभासी तो लगेगी ही कि वह स्वयं भी ‘कारणों’ को ढूँढ़ने को प्रेरित हो। अचरज नहीं कि जहाँ एक ओर, विभाजित मत से सामने आये उच्च न्यायालय के निर्णय ने उसकी उत्‍कण्ठा को बढ़ाया वहीं दूसरी ओर, इसके समाधान के लिए मुख्य न्यायाधीश द्वारा नियुक्‍त एकल पीठ द्वारा दिये गये फैसले ने भी उसका उतना समाधान नहीं किया जितने के लिए वह लालायित था।

न्यायिक क्लिष्‍टताओं से अनभिज्ञ आम भारतीय के लिए यही एक तथ्य कौतूहल से भर-पूर है कि जिस विवाद की क्लिष्‍टता को स्वीकारते हुए, एक-एक के विभाजित मत से दिये, अपने फैसले की भूमिका में खण्ड-पीठ ने स्वयं भी यह विचार प्रकट किया था कि इस जैसे व्यापक जन-रुचि के मामलों में सबको समान रूप से सन्तुष्‍ट करने वाला निर्णय दे पाना छलावे जैसा ही होता है उस पर किसी अन्तिम निष्कर्ष को पाने के लिए एकल पीठाधिकारी को प्रतिष्‍ठित करना क्या सच-मुच ही न्यायिक विचारण को अधिक व्यापक करने तुल्य रहा होगा? इस सोच का आधार मात्र यह सरल सा विचार है कि जिस फैसले पर एक तरह से पुनर्विचार किया जाना था स्वयं उसी फैसले ने यह दिखाया था कि विवाद इतनी सँकरी पटरी पर दौड़ रहा है कि एकल पीठ के मध्यम से एक सन्तोष-जनक निष्‍कर्ष को निकाल पाना एक सिक्के की उछाल जितना ही संवेदन-शील था।

एकल पीठ के निर्णय का एक सार यह है कि न्यायालय को प्रतीत हुआ है कि राज्य का मुख्य मन्त्री गुजरात लोकायुक्‍त अधिनियम की धारा ३ के अन्तर्गत्‌ एक स्वतन्त्र लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति को लेकर गम्भीर नहीं था। यह निर्णय इस सहज-स्वाभविक लोक-तान्त्रिक उत्‍कण्ठा को जीवित रखता है कि परामर्श-दात्री समिति में मुख्य न्यायाधीश की भूमिका क्या न्यायिक अधिकारों से मण्डित असीम विस्तार वाली है? या फिर वह एक न्याय-निष्‍ठ व्यक्‍ति-मात्र में सिमटी हुई है? मुख्य न्यायाधीश की सलाह को बन्धन-कारी ठहराते हुए, एकल पीठ ने अपना जो मत प्रकट किया है उसका सार यह है कि मुख्य मन्त्री इस भ्रम के शिकार हुए थे कि वह मुख्य न्यायाधीश के मत की प्राथमिकता और श्रेष्‍ठता को नकार सकते हैं। मुख्य मन्त्री का ऐसा अपमान-कारी और चुनौती-भरा कृत्य अपराजेयता के उनके त्रुटि-पूर्ण बोध को दर्शाने वाला है। निर्णय में, मुख्य मन्त्री और मुख्य न्यायाधीश के बीच चल रहे परामर्श के अधूरे-पन के सरकारी दावे को इस आधार पर सिरे से ठुकरा दिया गया कि मुख्य न्यायाधीश द्वारा मुख्य मन्त्री को दिया गया परामर्श न्यायिक विचारण के लिए नहीं खुला है।

स्पष्‍ट है, न्याय-मूर्ति वी एम सहाय द्वारा १८ जनवरी २०१२ को पारित एकल पीठ के इस निर्णय का गुजरात सरकार के विरोध में होना एक ऐसी सहज न्यायिक अवस्था मात्र है जिसमें न्यायालय पहुँचे परस्पर विरोधी पक्षों में से एक हारता और दूसरा जीतता है। और, जैसा कि अधिकांश अवसरों पर होता आया है, हारे हुए पक्ष ने अपने समक्ष उपलब्ध अगले न्यायिक द्वार के सामने, यथा-सम्भव क्षमता के साथ, न्याय की गुहार भी लगा दी है। किन्तु, अधिक व्यापक लोक-तान्त्रिक उत्सुकता यह है कि जिन न्यायिक उद्धरणों और उनकी न्यायालयीन समीक्षा ने फैसले को इस स्थिति तक पहुँचाया है उनमें स्थापित की गयी मुख्य न्यायाधीश के विनिश्‍चय की न्यायिक निष्‍ठा और श्रेष्‍ठता की महत्ता क्या सर्व व्यापी है? या फिर, उसके दायरे को व्यक्‍ति-विशेष के परिप्रेक्ष्य में इस तरह से सीमित भी किया जा सकता है जिससे एक समूच घटना-क्रम अत्यन्त संक्षिप्‍त, सुविधा-जनक, काल-विशेष में इस तरह से सिमट जाये कि कोई एकांगी तीखी न्यायिक टिप्पणी की जा सके? टिप्पणी भी ऐसी जो कदमों के न्यायिक लक्ष्मण-रेखा से बाहर भी बढ़ जाने का आभास देती हो! यह उत्सुकता तब गहरा जाती है जब कोई यह पाता है कि निर्विवाद रूप से प्रतिष्‍ठित ऐसे संवैधानिक पदों पर सुशोभित चेहरों में आये किसी बदलाव-विशेष की स्थिति में, अतीत में दर्शाये गये भरोसे का पात्र, यदा-कदा ही सही, स्वयं पीठ के भरोसे से ही वंचित हो गया है! विशेष रूप से तब जब भरोसे के खो देने का आधार सुस्पष्‍ट न्यायिक अथवा चारित्रिक ह्रास न रहा हो।

इसमें दो राय नहीं कि यह निर्विवाद सचाई है कि इस न्यायिक मत पर किसी तरह की कोई टिप्पणी करने का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय की दहलीज में सुरक्षित है। इसके बाद भी एक सहज उत्सुकता जागरूक भारतीय मन को लगातार कुरेद रही है। वह समझने में जुटा हुआ है कि वे कौन से तथ्य थे जिनके प्रकाश में, लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति के इतने अवांछित विलम्ब के लिए, केवल राज्य का मुख्य मन्त्री ही ऐसे अकेले व्यक्‍ति की तरह रेखांकित हुआ जिसने मुख्य न्यायाधीश के परामर्श की प्राथमिकता व श्रेष्‍ठता को सर्वथा अस्वीकार्य और निन्दनीय, अवांछित सी, चुनौती दी थी?

ऐसा मानने वालों की संख्या पर्याप्‍त है कि सर्वोच्च न्यायालय की दहलीज से बाहर आने वाला निर्णय भारतीय लोक-तन्त्र के संघीय ढाँचे को ‘अहं ब्रह्मामि’ के थोथे दर्प से मुक्‍त एक नयी, अधिक उज्जवल, न्यायिक पहचान देगा।

(१३ फरवरी २०१२)