तिनका-दर्शन!

“तिनके की असली महत्ता डूबते का सहारा बनने में नहीं, चोर की दाढ़ी में अटक जाने में है।” आगे न उन्होंने कुछ कहा और न मैंने। बस, एज़ आलवेज़, कॉम्प्रोमाइज़ का एक मासूम सा फ़ार्मूला लिखा गया दोनों पार्टियों के बीच।

Fourth Pocketहफ़्ते का समापन खासे एक्सप्लोसिव नोड में हुआ। सडन एण्ड अन-एक्सपेक्‍टेड! आपको बताऊँ, पीएच डी झटक चुके यारों के एक यार ने, साँझ होते-न होते, आज मेरा गिरह-बान जकड़ लिया। चाइना अटैक की तर्ज पर दोस्ती की सौगात में मिली उसकी यह बे-मौसम पकड़ इतनी जबर-दस्त थी कि लगा जैसे उसने इसे मिस्टर फ़िक्स इट को पूरी-पूरी फीस देकर हासिल किया था। वह भी, अपनी जनम कुण्डली को लात मारते हुए। मेरा मतलब है, कन्सेशन की डिमाण्ड की आड़ में कोई मोल-तोल किये बिना ही।

वैसे भी, तिल का ताड़ बना देना इनकी खास काबलियत है। सुन रखा है कि जिस किसी नादान ने इनकी इस काबलियत को चुनौती दी है, मुँह की खाने से हट कर उसे कुछ और हासिल नहीं हुआ। बड़ा घमण्ड है इन्हें अपनी इस काबलियत पर। हो भी क्यों नहीं? यारों के बीच से झटकी हुई इनकी पीएचडी की पहली और आखिरी शर्त भी यही है — किसी से भी मुँह की खाते ही उसे गँवा बैठेंगे। बरसों का रिकॉर्ड है कि इनका सितारा बुलन्दी पर है। और, इस बुलन्दी ने इन्हें इतना घमण्डी बना दिया है कि मेरे जैसा सँकरी गली का फुट-पाथिया भी इनके चंगुल की प्रताड़ना से कभी बच नहीं पाया।

खैर, खुद को घिरा पाने के सदमे से उबरूँ उससे पेश्‍तर ही उन्होंने अपना सबसे फ्रैश सूत्र कानों में उँड़ेल दिया, “अद्‍भुत साख है इसकी — गिर जाये तो खा़क़ का, अटक जाये तो लाख का।” आधी बेहोशी की हालत में भी बच निकलने की जुगत ढूँढ़ निकालने की हड़-बड़ी का होश मुझमें बदस्तूर बाकी था। उसने सुझाया कि गेंद और बल्ले के गेम की ‘सम्भ्रान्त’ साख की डुग-डुगी बज जाने का सदमा दिल की गहराई तक उतर कर उन्हें चोटिल कर गया होगा। लेकिन जैसे ‘नीम हकीम खतरा-ए-जान’ ठीक वैसे ही हाफ़ कॉन्शियस-नेस में हाथ लगे क्लूज़ भी जोखिमों से अप टु द ब्रिम भरे होते हैं। सो, बचने की हड़-बड़ी मँहगी पड़ी। उनके बिछाये जाल में फँस गया।

लेकिन, इस डर को पहले भी भुगत चुका था। इसलिए बच निकलने की पॉसिबिलिटी की छट-पटाहट मरी नहीं। इस हौसले ने एक नये खयाल का झुन-झुना थमाया। बीते दिनों की वह याद ताजी हो गयी जिसमें यह दर्ज हुआ था कि एमपी के एनुअल बजट में केबिल ऑपरेटरों पर एण्टरटेन-मेण्ट फीस बढ़ाये जाने के प्रोटेस्ट में स्टेट-कैपिटल भोपाल के ऑपरेटर्स ने सारे सैटेलाइट न्यूज चैनलों को एक दिन के लिए ठप्प कर दिया था। हाँ, एण्टरटेन-मेण्ट के चैनल्स बदस्तूर चालू रखे थे!

मेरी इस युक्‍ति का भी उन पर कोई असर नहीं पड़ा और उनकी अकड़ जस की तस रही। मेरा मतलब है, जकड़ थोड़ी सी भी ढीली नहीं पड़ी। तब, घबरा कर, मैंने विरोधी दलों की आम विरोधी फ़ितरतों का पल्लू थामा। उनसे पूछा कि कहीं वे एमपी के सीएम के उस नये शिगूफ़े पर अपने उच्च विचार लेकर तो नहीं धमके हैं जो उन्होंने पीडीएस को लेकर छोड़ा है? लेकिन जब उनकी भौंहें तनीं तो बेवकूफ़ी में मुझे लगा कि मैं अपनी बात को ठीक से कह नहीं पाया था। आव देखा न ताव, डिटेल में समझाया कि कैसे भाजपा के इस सूबे-दार ने पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम के तहत हित-ग्राहियों को अनाज और घासलेट सस्ती दरों पर बेचे जाने की जगह सब्सिडी को नगद में बाँट देने की फ़रमाइश सैण्ट्रल गवर्नमेण्ट के सामने रखी थी?

लेकिन, इस मूर्खता से जब मेरी बाँह पर उनकी पकड़ का दबाव बढ़ गया तो मैं समझ गया कि वे अपोजीशन की उन चुटकियों से इम्प्रैस्ड थे जिनके हिसाब से रूलिंग पार्टी स्कूली बच्चे-बच्चियों के बीच साइकिल और यूनिफ़ॉर्म बाँटने की एवज में निर्धारित रकम को नगद ट्रान्सफ़र करने की प्रॉफिटेबिल एप्रोच को आगे बढ़ा रही थी। जबकि, मैंने अपोजीशन के उस आरोप को कभी एनालाइज़ ही नहीं किया था कि साइकिलें और यूनिफ़ॉर्म खरीदे बिना बाँटा हुआ दिखला देने के मुकाबले नगदी को बाँटने में हेरा-फेरी करना घपले की सेफ़ेस्ट तकनीक है। दरअसल, इस तरह के आर्गुमेण्ट्स ने मुझे कुछ खास इम्प्रैस नहीं किया कि कुछ हिस्सा नगदी खिला कर यूनिफ़ॉर्म या साइकिल उठाने वाले कम ही मिलते हैं लेकिन उतनी ही नगदी देकर पूरी वैल्यू का चैक लेने तो सभी आ जाते हैं। जाहिर है, ख़रीद-फ़रोख़्त के घोटालों में जोखिम बढ़ जाता है जबकि कैश की बाँट-बिड़ार के घपलों में यह जोखिम लोकायुक्‍त या आईटी जैसे छापों तक सिमट जाता है।

सूझने को तो मुझे यह भी सूझा था कि वह शायद गोधरा की कानूनी लड़ाई के सबसे ताजे फैसले में मोदी के कुछ पिट जाने को राग ‘मोदी के बिखरने की शुरूआत’ में अलापने से इम्प्रैस हुए होंगे। मन ही मन इस खुशी के लड्‍डू फोड़ रहे होंगे कि गवाही में हाजिरी देनी होगी और तब, एक के बाद एक, बन्दे के सारे पखरचे उड़ने शुरू होंगे। लेकिन, और कोई जोखिम उठाने से मैंने यही बेहतर माना कि उन्हीं का श्री-मुख खुलवाया जाए। इसलिए मैंने ‘शरणम्‌ गच्छामि’ मुद्रा में हाथ उठा दिये और वे पिघल गये। बोले, “मैं तो महज तिनके की महत्ता का बखान करने की कोशिश कर रहा था।”

नपे-तुले से इस बोल-वचन में क्लाइमेक्स का धोबी-पाट जरूर था लेकिन जरा इन-कम्प्लीट सा। यों, फिल-अप द ब्लैंक उन्हें ही शोभा देता लेकिन मैंने एक बार फिर से अपनी टाँग घुसेड़ने की गलती कर ही डाली — बिल्कुल ठीक कहा आपने, “डूबते को तिनके का सहारा” जैसा रुतबा कोई ऐसे ही थोड़े ना दिया गया है!”

इतना सुनना था कि वे गरज उठे, “कर गये ना मिस्टेक?” घबरा कर मैंने दोनों कान पकड़ अभय-दान की याचना कर डाली। एब्सुलूटली अन-कन्डीशण्ड! इसका उन पर जो असर पड़ना था, बरोबर से पड़ा। सो, बिना बात को और बढ़ाये उन्होंने अपना पत्ता खोल दिया। बोले, “तिनके की असली महत्ता डूबते का सहारा बनने में नहीं, चोर की दाढ़ी में अटक जाने में है।” आगे न उन्होंने कुछ कहा और न मैंने। बस, एज़ आलवेज़, कॉम्प्रोमाइज़ का एक मासूम सा फ़ार्मूला लिखा गया दोनों पार्टियों के बीच।

(२५ मार्च २०१२)