तेल और तेल की धार!

वह ऊँट के किसी दूसरी करवट बैठने का जोखिम उठाने को लेकर डरा हुआ है। ख़ौफ़ इतना कि बिरादरी के किसी उत्साही लाल ने कोई साइड लेने के यदि संकेत भी दिये तो बुजुर्गों ने उस बन्दे को ही डिस-ओन कर दिया।

दो दिन बाद काउण्टिंग होगी। जी हाँ, पाँच विधान सभाओं में नये नुमाइन्दों को भेजने के लिए हो चुकी वोटिंग की काउण्टिंग। उसके दो दिन बाद होगी होली। इनमें से एक की इम्पॉर्टेन्स महज पौराणिक प्रतीक में सिमटती जा रही है तो दूसरे की महत्ता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।

हमारे मुल्क का एक बड़ा पॉपुलर फ़िकरा है। यह कहता है कि लोग ऊगते सूरज को ही पूजते हैं। इसीलिए होली के माहौल में भी मुझे इलेक्‍शन रिजल्ट्स का भूत सता रहा है। और, इसमें ग़लत क्या है? यह काउण्टिंग ऐसी इह-लौकिक हक़ीकत में तब्दील हो चुकी है जिसका मतलब जम्हूरियाई दुनिया के सारे पायदानों के शीर्ष पर विराजित ‘सत्ता की दहलीज’ है। लेकिन दोनों प्रतीकों में आसानी से समझी जा सकने वाली एक सिमिलरिटी भी है। वह यह कि दोनों ही, अपनी-अपनी तरह की अलग-अलग, दो धुरियों की ऐसी हार-जीत को रिप्रजेण्ट करते हैं जिनमें हारने वाले का कलेजा तो जल-भुन जाता है लेकिन जीतने वाले का कलेजा उल्लास के रंगों की उछल-कूद करने लगता है। और, अबकी बार गजब का संयोग है — धुरेड़ी के रंगों की बौछार और इलेक्शन-रिजल्ट्स की हुड़दंग लगभग ओवर-लैप करेंगी।

इस गड्‍ड-मड्‍ड से घबराया एक बन्दा अभी-अभी गया है। सुबह से ही मेरे दिमाग़ की चूलें हिला रहा था। जब तक रहा, मेरी बोलती बिल्कुल बन्द की बन्द किये रहा। उसका वन वे ट्रैक इलेक्शन-रिजल्ट्स के इकलौते सूत्र पर अटका हुआ था — तेल तो तेल, तेल की धार भी देखो!

जैसे आप मुझे बीच में ही टोक कर यह बतलाने की कोशिश कर रहे हैं कि आप समझ गये हैं, मैंने भी उसे रोकना चाहा था। एग्ज़ाम्पल्स पर एग्ज़ाम्पल्स दिये कि मुझे अच्छी तरह से समझ आ गया है कि वह किस बात की वार्निंग देना चाहता है? मैंने यह याद दिलाने की कोशिश भी की कि इलेक्शन रिजल्ट्स का पिटारा खुल जाने के बाद हार की खुन्नस और जीत की दबंगई अब देश के लिए अनहोनी नहीं रह गयी है। मौका मिलने की देर है, दोनों धुरियाँ अत्‍त तो मूतेंगी ही। हाँ अपार्चुनिटी और डिग्री की कमी-बेसी हो सकती है — इसमें तेल की धार देखने जैसा कुछ नया-पन नहीं है। पर वह बन्दा इसी प्वाइण्ट पर अड़ा रहा कि अपनी बात प्रूव करके रहेगा, नहीं तो जायेगा ही नहीं। शुक्र-गुजार हूँ ऊपर वाले का, वह जा पाया!

जाहिर है, आप उत्सुक होंगे कि मैं उसने ऐसा कौन सा तुरुप का इक्का फेका कि मैंने अपने सारे हथियार डाल दिये? बतलाता हूँ। लेकिन पहले यह बतलाऊँगा कि उसकी बोलती बन्द करने के फ़्यूटाइल अटैम्प्‍ट में उसके सामने ख़ुद मैंने कितनी वेरायटी के पापड़ बेले थे? अब, इतना तो आप भी कबूलेंगे कि मेरी जैसी स्थिति में फँसे हुओं के सारे अन्दाजिया तीर उन अति-उत्‍साहियों के तरकश से उधार लिये हुए होते हैं जो वोट-बैंक और वोट-बैंक के क्लैव्हर एन-कैशमेण्ट के ताने-बाने से बना होता है। इसीलिए, उनका मुँह बन्द करने की कोशिश में मेरी जुबान पर सबसे पहले नरिन्दर बिरादर वाला वाक़या आया। दरअसल, बीजेपी के भोंपुओं की ऊँची आवाजों से लगने लगा है कि इन असेम्बली इलेक्शन्स में ही बीजेपी २०१४ की पालियामेण्ट पर भी काबिज हो जायेगी! सब दूर बड़-बोला पन टपक रहा है। मुझे लगा कि मोदी ने ‘गुजरात को बद-नाम करने वालों को वहाँ की जेल के पकौड़े खाते जाना’ वाला जो ऑफ़र फेका है, असलियत में, उसमें ऑफ़र-फ़ैक्‍टर सिरे से नदारत है। उसमें तो अगली सरकार बनाने के बाद ‘देख लेने’ जैसी सीधी-सीधी धमकी झलकती है।

लेकिन वह नहीं पसीजा। तब यूपी चुनावों में दारुल उलूम द्वारा चुप्पी साधे रखने वाली बात मेरे ओठों पर आयी। लगा था, मेरी तरह वह भी यही मान रहा हैं कि यह महजबी सेण्टर इस बार ख़ुद को सियासी सेण्टर बना हुआ दिखाने से इसलिए बाज आ रहा है कि विनिंग हॉर्स को लेकर उसकी चार-दीवारी में कन्फ्यूजन फैला है। यानि, वह ऊँट के किसी दूसरी करवट बैठने का जोखिम उठाने को लेकर डरा हुआ है। ख़ौफ़ इतना कि बिरादरी के किसी उत्साही लाल ने कोई साइड लेने के यदि संकेत भी दिये तो बुजुर्गों ने उस बन्दे को ही डिस-ओन कर दिया। लेकिन उसने मेरे इस क्लू को अन-सुना ही छोड़ दिया।

मैंने पेंतरा बदला और बुन्देल खण्ड कांग्रेस के अध्यक्ष राजा बुन्देला के बचकाने बयानों पर उँगली रखी। बुन्देला ने अपनी बॉलीवुडी बीबी को भी इलैक्शन कैम्पेन में झोंका हुआ है। अन-फार्चुनेटली, जब सुस्मिता मुखर्जी के आगे-पीछे ‘बुन्देल खण्ड की बहू’ वाला ‘खासियत’ प्ले-कार्ड लटकाया गया तो उनके भी पॉलिटिक्स में उतरने की चुटकियाँ ली जाने लगीं। सुनने में आया है कि ‘देश की बहू-रानी’ की ऐसी भोंडी नक़ल से पार्टी की आला-कमान हत्थे से उखड़ गयी। घबरा कर, बुन्देला ने बीबी के लिए ‘फ़ैमिली के इकलौते कमाऊ मेम्बर’ का फ्रैश प्ले-कार्ड बनवाया। लेकिन फिल्मी परम्परा वाले डायलॉग के ऐसे बेजा इस्तेमाल से अब सारी की सारी पॉलिटिकल बिरादरी ही नाराज है। वजह? केवल यह कि कहीं लोग पॉलिटिकल बिरादरी को ‘निठल्ले पन’ का सिम्बल न मान बैठें।

उसने इसे भी रिजेक्‍ट कर दिया तो मुझे लगा कि ‘गुड का बाप कोल्हू’ की तर्ज पर उनका सारा गुस्सा केजरीवाल के उस गोल-मोल बयान पर है जिसकी आड़ में उसने पार्लियामेण्ट को चोरों, बलात्‍कारियों, और न जाने किन-किन का ठिया सा ही डिक्लेयर कर दिया था। लेकिन जब उसे मेरी यह बात भी मंजूर नहीं हुई तो मैंने, पिण्ड छुड़ाने वाले लहजे में, असली बात कहने की बिनती की। वह पसीजा और मुस्कुरा कर चुटकी ली — रिजल्‍ट आ जाने दो, फिर देखना तेल के दामों का हाल क्या होता है!

(०४ मार्च २०१२)