दिल के अरमां बह गये

गली-गली में एक ही गाना गूँज रहा है — दिल के अरमां आँसुओं में बह गये। होली के हुड़-दंगिए ने बड़ी दिलचस्प चुटकी कसी। बोला, जीतने वाला हारे हुओं को चिढ़ा रहा है तो हारा हुआ अपना ग़म ग़लत करने में जुटा है।

होली तो हो ली लेकिन उसके नशे की तरंग सब दूर ब-दस्तूर कायम थी। इसी डर से घर से बाहर पैर नहीं धरा। लेकिन वह जो कहते हैं न कि ‘बकरे की अम्मा कब तक खैर मनायेगी, अखिर एक न एक दिन तो ईद फिर आयेगी’ जैसे हमेशा से साबित होता आया है आज भी साबित हो गया। दरअसल, घर से बाहर नहीं निकलना तो मेरे अधिकार-क्षेत्र में था लेकिन किसी और पर यह अनुशासन लाद पाना तो अब मार्शल-लॉ कमाण्डरों के हाथों में भी नहीं रह गया है। यदि होता तो इतने सारे मुल्कों में तख़्ते पलटने से बच नहीं गये होते?

खैर, हुआ यह कि होली के रंग और भंग की तरंग में डूबा एक हितैषी मेरी सलामती की ख़्वाहिश लेकर घर आ धमका। जानता था कि रंगों के अलावा मैं होली की ट्रेडीशनल प्रसादी से भी छरकता हूँ। इसलिए, सैकेण्ड ऑप्शन के रूप में, नये जमाने वाली प्रसादी की पोटली भी अपने साथ लेते आया था। नहीं, महुआ-महारानी वाली नहीं बल्कि चुटकीले बत-कहाव से लिपटी पहेलियों वाली। बोला — बँधी मुट्‍ठी आखिर खुल ही गयी। यों, बात थी तो सेण्ट-परसेण्ट कहावत के ही दायरे में लेकिन फिर भी कहनौत के इस इम्प्रैशन से हण्डरेड परसेण्ट जुदा थी। अब आप कहेंगे ही कहेंगे कि यह क्या बात हुई? तो, आगे मैं यह अर्ज करना चाहता हूँ बात इतनी आम थी कि बिल्कुल खास हो गयी।

नहीं जी, पाण्डुचेरी के शिक्षा मन्त्री कल्याण सुन्दरम की एजुकेशनल क्वालिफ़िकेशन की पोल खुलने की खबरों में होली का मजा कहाँ? क्या कहा, दारू का मजा नहीं तो क्या, होली के जायके के लिए आप मुनक्का-बटी वाले ऑफ़र को भी कुबूल लेंगे? चलिए, बता देता हूँ — सुना है कि मिनिस्टर हुजूर का जिया किया कि एजूकेशन मिनिस्टरी की तर्ज पर कोई डिग्री-सर्टिफिकेट वगैरह पर भी हाथ साफ किया जाए। लेकिन एक प्रैक्‍टिकल प्रॉब्लम थी — परीक्षा-कॉपी में लिखने के नाम से हथेलियाँ पसीने से चुह-चुहा उठती थीं। सो अपनी जगह किसी दूसरे को ‘पास करा देने’ का ठेका देकर परीक्षा हॉल में बैठा दिया। लेकिन, अब बगलें झाँकते फिर रहे हैं। ‘तेरा क्या होगा कालिया’ वाले लहजे में सारी पोल खुल गयी है।

वैसे तो, मेरे दोस्‍त ने न तो मोहतरमा शेहला मसूद के मर्डर मामले में हिरासत में लिये गये किसी जिला-बदर को भोपाल की कांग्रेस, बीजेपी और मस्जिद-कमेटी द्वारा ‘कैरेक्‍टर-वान’ होने के अलग-अलग सर्टीफ़िकेट देने वाले मामले में कोई चुटकी ली और न ही स्वच्छ सरकार के एमपी गवर्नमेण्ट की बखिया उधेड़ देने वाली उस खबर का कोई जिक्र किया जिसके अनुसार उज्जैन के म्युनिसिपल कार्पोरेशन के अदना से चपरासी के घर से लोकायुक्‍त को करोड़ों की काली कमाई के प्रूफ मिले थे।

अब आप कहेंगे कि तब तो सैण्ट्रल मिनिस्टर वीरप्पा मोइली के ताजे बयान की ही खाल उतारी होगी। वैसे, यह ठीक है कि मोइली ने कहा था कि १९९१ में लिबरलाइजेशन की शुरूआत जितनी आपा-धापी में की गयी थी वह ठीक नहीं था। और, यह भी ठीक ही है कि कांग्रेस-यूपीए की अन्दरूनी पॉलिटिक्स में ‘ठस्से-दार मिनिस्टर’ से महज ‘ना-खुश नेता’ के रोल में तब्दील हो चुके इस नेता के मुँह से निकल गया था कि तब फाइनेन्स मिनिस्टर रहे आज के प्राइम मिनिस्टर ने १९९१ में देश में उदारी-करण की जो शुरूआत की थी वह उनके द्वारा ‘हड़बड़ी में की गयी’ गलती थी। मोइली का खुला इशारा यह था कि लिबरलाइजेशन की ऐसी शुरूआत से पहले कांग्रेस लीडर-शिप ने यदि उससे जुड़े सारे आस्पेक्‍ट्स भी कैलकुलेट कर लिये होते तो जरूरी रेगुलेशनरी कदम भी साथ-साथ उठा लिये गये होते। और, इतनी छोटी सी प्रिकॉशन से देश आज की दुर्दशा में पहुँचने से रोक लिया जाता! लेकिन, ऐसी समझ-दारी से इस बन्दे की दूर-दराज की भी कोई पॉलिटिकल रिश्‍तेदारी नहीं थी जो उससे इस खबर के बहाने कांग्रेसी नीयत की होली-नुमा टाँग-खिचाई करवाती।

दरअसल, यह मुट्‍ठी थी तो किसी और की लेकिन इसे दिखा-दिखा कर सब कोई अपनी होने का क्लेम करते घूम रहे थे। ‘सब कोई’ से मेरा मतलब उस हर टॉम, डिकन और हैरी से है, बिना नाप-तौल के क्लेम पर क्लेम करते जाना ही जिसकी फितरत में है।

अब भी नहीं समझे? जाहिर है, या तो आप इसी फितरती जमात से हैं या फिर सचमुच बड़े भोले हैं। वोटिंग के माहौल के बाद डेमोक्रेसी में महज यही दो क्लासेज़ दिखती हैं — एक ‘भोली’ और एक फितरती। मजा यह जो ‘भोली और भली’ समझ में आती है वह बड़ी समझ-दार और चतुर होती है। जबकि, जो खुद को ‘अक़्ल और चतुराई का ठेकेदार’ साबित करती फिर रही होती है वह निरी वैसी होती है जिसे न जाने क्या-क्या तो कहते हैं? जी हाँ, एक क्लास ‘आम पब्लिक’ की है तो दूसरी ‘ग्रेट पॉलिटिकल लीडरान’ की।

चलिए, समझ ही गये होंगे कि मैं काउण्टिंग की उस बँधी मुट्‍ठी की बात कर रहा हूँ जिसे समाज-शास्‍त्रियों की जमात तो ‘रियल पब्लिक रिस्पॉन्स’ कहते नहीं थकती है लेकिन जिसके सच में खुलने से एक पल पहले तक, हर वह खास शख़्स जिसका लेना भी और देना भी सीधे तौर पर इससे जुड़े हैं, अपनी-अपनी मुट्‍ठी दिख कर क्लेम यही करता है कि लाख तो उसकी मुट्‍ठी में हैं, बाकी की मुट्‍ठी में बस खाक ही है! बन्द मुट्‍ठी का यही पिटारा, मेरा मतलब है, ईवीएम की काउण्टिंग के रिजल्ट्स खुल गये हैं। और, ऑनेस्टी से देखें तो एकाध को छोड़ कर हर मुट्‍ठी में महज खाक मिली है। लेकिन इसे कबूल ले वह पॉलिटीशियन कैसा? सो, हर पिटा हुआ मोहरा गोयबल्स का तर्पण करते हुए या तो यह बुद-बुदा रहा है कि ‘उसकी टोपी राजा की टोपी से अच्छी है’ या फिर यह कि आम पब्लिक ने उससे मुँह मोड़ कर अच्छी खासी मूर्खता कर डाली है!

यों, पंच लाइन तो वह चुटकी थी जो मेरा घर छोड़कर जाते हुए होली के उस हुड़-दंगिए दोस्त ने कसी। बोला, सिचुएशन बहुत दिलचस्प भी है। गली-गली में एक ही फिल्मी सुर गूँज रहा है — दिल के अरमां आँसुओं में बह गये। मैं कोई सवाल खड़ा करूँ उससे पहले ही उसने एक्सप्लेन भी कर दिया — जीतने वाला हारे हुओं को चिढ़ा रहा है तो हारा हुआ अपना ग़म ग़लत करने में जुटा है।

(११ मार्च २०१२)