(ना) जियो जी भर के!

वह रुखसत हुआ और दिमाग ठण्डा हुआ तो ध्यान आया कि ‘जियो, जी भर के’ वाला फार्मूला यूनिवर्सल लॉ नहीं है। नहीं, त्रिवेदी के रेजिग्नेशन की खबर सुन कर नहीं कह रहा हूँ। दरअसल, मुझे एक कॉमर्शियल एड याद आ गया।

Column design_Fourth Pocketदरवाजे पर दस्तक हुई तो मेरी निगाह दीवार-घड़ी की ओर उठ गयी। नेचुरली, धुँधलके से जरा पहले का यह वक़्त अमूमन ऐसा होता है जब न तो मैं घर से बाहर कदम रखता हूँ और ना ही कोई मेरी कुटिया की ताक-झाँक में इण्टरेस्टेड होता है। मेरे लिए, यह ऐसा टाइम होता है जिसे मैं दिन भर की बातों की जुगाली करते हुए पास करता हूँ। लेकिन, उसकी आमद ने ऐसा फाल्स मैसेज दिया जैसे अँधियारा इतना तो घिर ही चुका था कि मय-खानों के रेगुलर कस्टमर्स अपने-अपने घरों से उनके दरों की दिशा में कूच करना शुरू कर दें।

नहीं, उसके मुँह से दारू नहीं महक रही थी। लेकिन, एक बुद-बुदाहट जरूर बार-बार फूट रही थी — जियो जी भर के! और हाँ, शायद धुँधलके के कारण ही मैं यह श्योर नहीं कर पाया कि वह पाले के इस पार था या उस पार? मेरा मतलब है, उसके एक्सप्रैशन्स में ऐसा कुछ पढ़ नहीं पाया जो सैण्ट-परसैण्ट कन्वे करता हो कि बन्दा किसी का मजाक उड़ा रहा था या, इसके उलट, उसकी मॉर्डर्न-मोस्ट फ़िलॉसफ़ी की सिफ़ारिश कर रहा था? यही मेरे कफ़्यूजन का कारण था।

पर शायद, वह पूरे होशो-हवास में था। इसीलिए, ताड़ गया कि उसकी उस टिपिकल एण्ट्री ने मुझे डरा दिया था। और, उसका इस तरह से ताड़ लेना मेरे लिए उसकी बे-बखत दस्तक से ज्यादा भारी साबित हुआ — वह, बिन-माँगी, सफ़ाई देने में जुट गया। प्वाइण्ट बाई प्वाइण्ट, एग्ज़ाम्पल ओवर एग्ज़ाम्पल।

टु स्टार्ट विथ, उसने इज्जत-दारों के बीच, दिन-दहाड़े बढ़ते जा रहे ‘ब्लू फ़िल्मी’ रुझान वाली नब्‍ज दिखायी। मेरा मतलब है, उसने मुझे याद दिलाया कि कैसे एक प्राइवेट टीवी चैनल ने एक दक्खिनी सूबे की रूलिंग बीजेपी के तीन एमएलएज़ को ‘बिजनेस अवर्स’ में ही ब्लू फ़िल्म देखते हुए रंगे हाथों पकड़ा था? सुना है, चैनल कर्नाटक असेम्बली की लाइव कवरेज कर रहा था! बाई द वे, केजरीवाल राहत महसूस कर रहे होंगे कि वे सिर्फ़ तीन ‘माननीय’ नहीं थे जो उस दिन असेम्बली सैशन के दौरान फ़्री फ़ॉर ऑल ‘प्राइवेट एण्टरटेनमेण्ट’ में मशगूल मिले थे। शायद, फ़्री ऑफ़ कास्ट। खबर है कि उस दिन रंगे हाथों पकड़े गयों की संख्या पन्द्रह से सोलह के बीच थी। खबर तो यह भी है कि इनमें कांग्रेसी और समाज-वादी भी बराबरी से शरीक थे।

भाजपा और कांग्रेस में बढ़ रही सिमलैरिटी का जिक्र उठते ही उनकी गाड़ी, थोड़ी देर के लिए, मेन लाइन से लूप लाइन पर चली गयी। यह जरूर है कि अपना डायरेक्शन उन्होंने मेन थीम पर ही फोकस्ड रखा। बोले, ताजे असेम्बली महा-भारत के ‘यूपी पर्व’ एपीसोड में इन दोनों पार्टियों में जीत का कॉन्फिडेन्स इतना लबा-लब था कि इनके लीडरान ने अपनी-अपनी औकात भर सारी मेहनत पार्टी को मेजॉरिटी दिलाने की जगह यह पक्का करने में खर्च की कि काउण्टिंग के बाद सबसे ज्यादा हाथ उनके दिखें जो उनको लीडर मानते हों। लेकिन लगता है कि ‘वोट देव’, सभी पर बराबरी से मेहर-बान हुए — सबके ही खातों में तीन-तीन या चार-चार एमएलएज़ दर्ज कर दिये। फुल-स्टॉप यहीं नहीं लगा — अब इन दोनों ही नेशनल पार्टियों में कॉम्पिटीशन इस इकलौते प्वाइण्ट पर फ़ोकस्ड है कि कौन, और कितनी वजन-दारी से, यह प्रूव कर सकता है कि इस सूबे में एसपी नाम की एक ‘लोकल’ पार्टी बीएसपी नाम की दूसरी ‘लोकल’ पार्टी पर क्यों इस क़दर प्रिफ़र की गयी कि वोटर्स ने उसकी अपनी ‘नेशनल’ पार्टी को इलेक्शन-रेस में शामिल हुआ तक नहीं माना?

अब, यह किसी से छिपा नहीं है कि ‘इलेक्शन-रेस’ की इति ‘लीडर ऑफ़ द हाउस’ के तख़्त को कब्जाने से होती है। इसीलिए, उस बन्दे को यूपी के ऑफ़-शूट उत्तराखण्ड की सूझना ही थी। सो, शुरू हो गया — ‘चुनाव आचार-संहिता’ के पूरे दौर में कांग्रेस की ओर से एक सैन्ट्रल मिनिस्टर खूब धूम मचाते फिरे। बिल्कुल ‘जियो, जी भर के’ वाले अन्दाज में। ले-देकर, एक सीट के अन्तर से बीजेपी से बढ़त भी दिला पाये। लेकिन, उस आला-कमान को जीने का उनका यह पॉलिटिकल अन्दाज शायद पुसाया नहीं जिसके बारे में जग-जाहिर धारणा है कि हुइहै वही जो उसने सोच राखा! स्टेट में कॉन्स्टिट्यूशन की देख-भाल करने वाले के अतीत का लब्बो-लुबाब भी यही बताया जाता था कि इस पोस्ट पर आने से पेश्‍तर वह ख़ुद भी इसी आला-कमान की ताबेदारी प्रॉयारिटी से करता था। बस, इलेक्‍टेड मेम्बर्स के बीच मेजॉरिटी के समर्थन का दावा ठोंक रहे रावत जी का पत्ता कट गया और बहुगुना जी का गुण-गान गाया जाने लगा। इस संवैधानिक बेसिक का भी ध्यान नहीं रखा गया कि, फ़ॉर्मेलिटी के लिए ही सही, पार्टी के इलेक्‍टेड एमएलएज़ की ओर से, बा-कायदा, एक रेजूलूशन ले लिया जाता।

इसके बाद, उन्होंने अपनी चिट से रेल्वे मिनिस्टर दिनेश त्रिवेदी का नाम उठाया। बोले, यह वह अन्दाज है जिसे असल में ‘जियो, जी भर के’ कहा जाना चाहिए। जो बोले, एक लिमिट तक ठीक ही बोले। आखिर यह सचाई है कि जीने की कला में पारंगत्‌ दिनेश भाई को, कमजोर ही सही, पी एम मनमोहन की उँगली थामने क्या मिली, अपनी पार्टी-सुप्रीमो ममता पर ही आँखे तरेर दीं!

अब तक मैं उबासी लेने लगा था इसलिए उस बन्दे ने ताड़ लिया कि स-कुशल वापसी दर्ज करना ही राइट च्वाइस होगी। वह रुखसत हुआ और दिमाग ठण्डा हुआ तो ध्यान आया कि ‘जियो, जी भर के’ वाला फार्मूला यूनिवर्सल लॉ नहीं है। नहीं, रेल्वे मिनिस्ट्री से त्रिवेदी के रेजिग्नेशन की खबर सुन कर नहीं कह रहा हूँ। दरअसल, मुझे एक कॉमर्शियल एड याद आ गया। एड क्या, उसके मॉडल की याद आ गयी — अपने खेल के कारण पॉपुलर हो गये इस बन्दे ने एक ‘ओवर द काउण्टर’ प्रोडक्‍ट की सिफ़ारिश की थी। एड में वह कहता है कि खुद को चुस्त और तन्दुरुस्त रखने के लिए उसका वाला वाइटल सप्लिमेण्ट रोजाना लो। लेकिन, समय के पहिये ने अब एक भारी सा रिबटल लगा दिया है — खिलाड़ी खेल से तो बाहर है ही, अपने तन की दुरुस्ती के लिए अमरीका में ‘कीमो’ भी करा रहा है। गोया, एडवर्स पब्लिसिटी — न जियो इतना जी भर के! जाहिर है, उसके वाला एड अब बॉलीवुड के एक ‘बल्ले-बाज’ ने हथिया लिया है!

(१८ मार्च २०१२)