एड्स : निशाने पर कुछ और

Ateet Ka Jharokha

तथ्यों की खोज-बीन बतलाती है कि एड्स यौन-व्यभिचार से कहीं अधिक चिकित्सा-व्यभिचार का दुष्परिणाम है। विशुद्ध वैज्ञानिक यथार्थ तो यह भी है कि मातृत्व भरा स्नेहिल स्पर्श भी, कुछ खास स्थितियों में, किसी-किसी को संक्रमित कर सकता है। विश्‍व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रायोजित लेख अथवा विज्ञापन चाहे जितना दावा करें, रोग-विज्ञान की इस सचाई को झुठलाया नहीं जा सकता है।

विश्‍व एड्स दिवस के पाखण्ड की आड़ में संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ और विश्‍व स्वास्थ्य संगठन, और उसके लगुओं-भगुओं द्वारा भी, गरीब देशों में एड्स-पीड़ितों के उपचार के लिए सस्ती दरों पर दवाएँ उपलब्ध कराने की घोषणा करना, अब, एक फ़ैशन सी बन चुका है। बीते सालों में इस पर अरबों डॉलर खर्चे जा चुके हैं।

दवाएँ, जाहिर है, ऐलोपैथी की ही होती हैं और उनमें से कुछ, निश्‍चित तौर पर, घोषित अथवा गुप-चुप रूप से प्रायोगिक भी होती होंगी। ऐसी दवाएँ, भविष्य में कभी, मानव के समक्ष उसके वर्तमान स्वरूप अथवा अस्तित्व का ही संकट खड़ा कर दें तो किसी को अचरज नहीं करना चाहिए।

हम ने ही दर्द दिया है, दवा हम से ही लेना! राजनीतिज्ञों से शुरू हुआ यह जुमला ‘विज्ञानियों’ तक गहरी पैठ बनाने के बाद, अब, दोनों के गठ-जोड़ का एक मजबूत पाया बनता नजर आ रहा है। बढ़ता बाजार-वाद इनका मध्यस्थ हो गया है। बीस सालों के एक छोटे से अन्तराल में लिखी गयी एड्स की कहानी, जो सम्भवत: अभी पूरी नहीं हुई है, यही सन्‍देश दे रही है। भारी ताम-झाम और तूफानी हल्ले-गुल्ले के बीच आज यह समझना मुश्किल है कि मुद्दा कितना वृहद् सामाजिक चिन्ता का है और कितना सहज निजी हित-साधन का?

वर्षों से पुरुष-कण्डोम की ‘जन-जन को आवश्यकता है’ का बिगुल बजा रहे एक खास तबके द्वारा पिछले दिनों, भारी प्रचार-प्रसार के साथ, खास तौर पर महिलाओं के लिए एक कण्डोम के भारत में उपलब्ध होने की जानकारी दी गयी। विदेशी ब्राण्डेड उत्पाद्‌ है सो, जाहिर है, यह भी गर्व के साथ कहा गया कि मँहगा होगा। खबर देते समय इस बात पर विशेष बल दिया गया महिलाओं के खास सन्‍दर्भ में यह कण्डोम अ-सुरक्षित रति-सुख की बढ़ रही ‘भारतीय’ समस्या का भी सहज हल होगा!

फरवरी २००३ के आखिरी सप्‍ताह में, नई दिल्ली में एक संगठन ने एक गोष्‍ठी आयोजित की थी। विषय था, ‘एचआईवी के सन्‍दर्भ में महिलाओं के समक्ष विकल्प’। तमाम चिन्ताओं और सुझाओं के बीच निकला निष्कर्ष यह था कि महिलाओं के बीच इस विषाणु के फैलाव के मुख्य कारण हैं शिक्षा तथा जान-कारियों तक उनकी अपर्याप्‍त पहुँच, रोक-थाम के उपायों के प्रति शर्मीला-पन, हिंसा, खरीद-फरोख्त का गैर कानूनी व्यवसाय और बढ़ती वैश्यावृत्ति। सामान्यत:, उपरोक्‍त कारण ‘अनेक’ होने का बोध कराते प्रतीत होते हैं किन्तु, इनकी परस्पर सम्‍बद्धता को केन्द्र में रखकर इन पर दो-बारा गौर करने से, यह ‘एक’ ही बिन्दु पर केन्द्री-भूत होते साफ-साफ समझ पड़ेंगे। यही नहीं, यदि इस समझ में कोई कसर रह गयी हो तो, इस खबर के साथ जारी हुई एएफपी की एक ‘सैक्स-वर्कर’ की खास फोटो उसे बड़ी सहजता से दूर कर देती है। अर्थात्, इस देश केअन-पढ़ोंको यह पाठ झकझोर-झकझोर कर पढ़ाया जा रहा है कि यदि एड्स से बचना है तो रति-सुख को सुरक्षित करने के बाजारों में सुझाये जा रहे उपायों पर चलो!

एड्स महज कण्डोम और रति-सुख नहीं है। ठीक उसी तरह जैसे, अतीत में चाहे जैसे भी रहा हो, मानव अब मद-मस्त जानवर नहीं है। एड्स की पहली सचाई तो यह है कि यह यौन-व्यभिचार से कहीं अधिक चिकित्सा-व्यभिचार का दुष्परिणाम है। दूसरी सचाई यह है कि शरीर में बहने वाले खून से एड्स के विषाणु के किसी भी तरह के सीधे संसर्ग से संक्रमण होने का खतरा तत्काल सामने आ खड़ा होता है। फिर, इस संसर्ग का निमित्त चाहे वासना में डूबा चुम्बन हो या संक्रमित के शरीर से रिसी एक रक्‍त-बूँद। यहाँ तक कि, एड्स-संक्रमित की पसीने की एक बूँद भी। भारी ताम-झाम और तूफानी हल्ले-गुल्ले के बीच आज यह समझना मुश्किल है कि मुद्दा कितना वृहद् सामाजिक चिन्ता का है और कितना सहज निजी हित-साधन का?

विशुद्ध वैज्ञानिक यथार्थ तो यह है कि मातृत्व भरा स्नेहिल स्पर्श भी, कुछ खास स्थितियों में, किसी-किसी को संक्रमित कर सकता है। विश्‍व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रायोजित लेख अथवा विज्ञापन चाहे जितना दावा करें, रोग-विज्ञान की इस सचाई को झुठलाया नहीं जा सकता है। यही नहीं, कुछ विशेष स्थितियों में, डिब्बा-बन्द अथवा प्रसंस्कृत भोज्य पदार्थों में भी इसे फैलाने की उतनी ही क्षमता है जितनी कि जैव-यान्त्रिकी के बढ़ते अन्‍धाधुन्ध प्रयोगों के चलते आने वाले नये-नये खाद्य-उत्पादों में।

जान-बूझकर धूमिल किया गया यह सत्य आज और भी महत्वपूर्ण हो गया है कि अन्तर्राष्‍ट्रीय आर्थिक सहायता को हासिल करने के लालच में, प्रचार-प्रसार तन्त्र का हर-सम्भव उपयोग कर उपर्युक्‍त सारे, और ऐसे ही दूसरे, तथ्यों को ढाँकने-मूँदने में गरीब और पिछड़े देशों के राज-कोषों को जितना चूना लगा है उतने भर को पीढ़ी दर पीढ़ी फैलते ही जा रहे अक्षर-अज्ञान को दूर करने में पूरी ईमान-दारी से, और व्यवस्थित तौर पर, खर्चने भर से इन देशों से एड्स की कहानी का सुखद अन्त, उसकी शुरूआत से भी पहले, जाने कब का हो गया होता!

इस परि-प्रेक्ष्य में, एड्स के प्रति जागरूकता के नाम पर युवा-वर्ग को अपने शिकंजे में कसने की आज की हर-चन्द कोशिश को, तीसरी दुनिया के अर्थ-तन्त्र को दोनों हाथों लूटने की, विदेशी संस्थागत्‌ नीयत से बेहतर कैसे माना जाए? एड्स के खिलाफ जन-जागरण के ‘महाभियान’ से जुड़े देशस्थ राजनैतिक-प्रशासनिक-स्वयंसेवी महा-प्रभुओं में से कितनों के बारे में, उनकी ठीक-ठीक वैयक्‍तिक जान-कारी रखने वाले, शपथ-पूर्वक कह सकते हैं कि उनके ऐसा करने के मूल में अपने लिए सुरक्षित और उन्मुक्‍त यौन-शोषण का मौका हथियाने की लालसा नहीं है? मलेरिया-उन्मूलन के नाम पर खून की जाँच के लिए स्थापित विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के अधिक-तर केन्द्रों में एक ही सुई से एक के बाद एक, लगातार, लोगों की उँगलियाँ छेदे जाते देखें, और फिर इसी संगठन के एड्स सम्‍बन्धी साहित्य पर एक नजर डालें, तो यह बात एकदम साफ हो जाएगी। ‘अपने’ कर्मचारियों और ‘दीगर’ व्यक्‍तियों के लिए अलग-अलग प्रकाशित सुरक्षा-सावधानी के निर्देशों वाले साहित्य में तो इस संगठन का दो-मुँहापन लगभग नंगा होकर सामने आ जाता है।

नब्बे के दशक की शुरूआत का मेरा अपना अनुभव दर्शाता है कि एड्स के सच को खँगालने की हर ईमान दार कोशिश को दवा-माफिया और विश्‍व स्वास्थ्य संगठन एक-जुट होकर रौंद रहे हैं। तब, अपने मन में एड्स के बारे में कुछ उत्सुकता, कुछ सवाल और कुछ होमिअपैथीय समाधानों की पोटली समेटे, मैं इस संगठन के दिल्ली मुख्यालय गया था। सम्‍बद्ध विदेशी प्रमुख (एड्स) उस दिन भवन में मौजूद थे लेकिन, मेरी पूरे दिन की कोशिश के बाद भी, जहाँ वे आमने-सामने की बातचीत को टालते रहे वहीं उनके देशी तनखैये खुद अपने बारे में दिन भर, एक ही जवाब देते रहे कि क्योंकि वे नहीं चाहते कि मुझे कोई ‘गलत’ जानकारी मिले, वे मुझसे नहीं मिलेंगे!

महज तथ्यों की जानकारी लेने के बीच, विश्‍व-स्तर के इस कार्यालय में कोई जानकारी ‘गलत’ भी हो सकती है, इस पर मुझे कभी भी कोई अचरज नहीं हुआ। क्योंकि, मेरे मानस पर मध्य प्रदेश की राजधानी में स्थित शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय के परिसर में स्थित शासकीय हमीदिया चिकित्सालय में अपने इलाज के लिए आया एड्स का वह मरीज घूमता रहा है जो बिना इलाज किये वापस अपने शहर भगा दिया गया था। इटारसी का यह मरीज कुछ समय बाद ही संवेदन-शून्यता के कारण होने वाली एड्स-जनित गुम-नाम मौतों में शामिल हो गया था। अचरज तो विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के उस विदेशी विशेषज्ञ-प्रमुख की मुझसे आँखें चुराने पर भी नहीं हुआ था क्योंकि मैं जानता था कि उस भवन के मानस पर मेरा नाम उनकी छद्म नीयतों की नकाब उतारने वाले ऐसे व्यक्‍ति की तरह, पहले से ही, दर्ज था जिसे खरीदने की कोशिश में, अतीत में, उन्हें उल्टी मुँह की खानी पड़ी थी।

हाँ, उस भवन के जनसम्‍पर्क-प्रमुख के सम्मुख बैठे हुए मुझे एक-बारगी तब जरूर अचरज हुआ था जब उस दिन उसने एक समाचार-पत्र उठाकर उसके मुख-पृष्‍ठ पर छपी, वस्‍त्रों से सर्वथा वि-मुख, एक युवती की तस्वीर विशेष रूप से दिखायी थी। एक क्रिकेट मैच के दौरान, कहने को खेल से रोमांचित, यह युवती अपने तन का आखिरी तार भी उतार फेक कर मैदान का एक चक्कर लगा बैठी थी। एड्स पर चल रही बात-चीत के बीच अचानक ही वह तस्वीर मेरे सामने लहराते हुए तब उन्होंने सवाल किया था, “यह क्या है?” मेरे टके से इस जवाब पर कि, ‘‘यह क्रिकेट है”, वे मेरी बुद्धि पर तरस खाते नजर आये थे। शायद इसलिए कि, एड्स की जान-कारी इकट्‍ठा करने के मेरे कठोर आग्रह से उकता कर (या शायद घबरा कर) वे मुझसे कहना चाह रहे थे, “क्यों बे-मतलब का सिर-दर्द लिये परेशान बैठे हैं? असली एड्स तो यही है। आप तो बस, इसी का मजा लीजिए!

(०७ जुलाई २००४; www.sarokaar.com से साभार)