दोहरे मान-दण्ड

Ateet Ka Jharokha

दीवार पर लिखी स्पष्‍ट इबारत के बावजूद, स्वास्थ्य सम्‍बन्धी व्यापक नीति को लागू करते समय, होमिअपैथी की उपेक्षा करना कितना न्याय-संगत है इसका निर्णय अब, निर्णय लेने वालों को नहीं, निर्णय से प्रभावित होने वालों को ही करना है। क्योंकि आज के ‘स्थापित’ वैज्ञानिक तो बस, सुविधा-पूर्ण तरीके से, दोहरे मान-दण्डों पर ही चलेंगे।

वैसे तो कुछ पुरानी है लेकिन, हैनिमेन और उनकी चिकित्सा-धारणा को अपना आदर्श मानने वाले भारतीयों के लिए एक भयावह सूचना — एक दवा-उत्पादक कम्पनी की औरंगाबाद स्थित हैपिटाइटिस-बी टीका-उत्पादक इकाई को विश्‍व स्वास्थ्य संगठन का उत्तम गुण-वत्ता प्रमाण-पत्र मिल गया है। और, इस आधार पर, अब वह इस टीके की बच्चों को लगाने योग्य लगभग दस करोड़ खुराकें बनाने की योजना बना रही है।

यह चिन्ता अधिक गहरी इसलिए हो जाती है कि छन कर आ रही खबरों के अनुसार केन्द्रीय सरकार जल्दी ही हैपिटाइटिस-बी टीकाकरण को भी अपने अनिवार्य प्रति-रक्षण कार्य-क्रम में शामिल करने वाली है। उल्लेखनीय है कि बीते सालों में यह देश, हैपिटाइटिस का हौआ खड़ा करके टीकों को खपाने की, चिकित्सकों की वैयक्‍तिक क्षमता के अनुसार उन्हें फ्रिज अथवा कार, या, उतनी ही कीमत की राशि नगद अथवा सोने की शक्ल में देने के, दवा कम्पनियों की खुली पहल के, एक विशुद्ध व्यावसायिक दौर का मूक गवाह रह चुका है। उसके दुर्भाग्य-पूर्ण नतीजों का भी।

भारत वर्ष में, पूरे ढोल-ढमाकों के साथ चल रहा, विशेष सामूहिक पोलियो-प्रतिरक्षण कार्यक्रम, अतीत में, जब प्रारम्भ किया गया था तब कहा गया था कि देश भर के नौ-निहालों को एक साथ पोलियो-प्रति-रक्षण दवा पिलाने से, भविष्य में, समूचे देश को पोलियो के खतरे से अभय मिल जायेगा। इसके ठीक अगले साल, इस कार्य-क्रम को दुहराये जाने की दलील देते हुए ‘विशेषज्ञों’ ने समझाया था कि मात्र संयोग से (उनका परोक्ष भाव तो यह था कि, पचहत्तर फीसदी, अन-पढ़ आबादी के गँवारू-पन से) यदि सारे लक्षित शिशुओं को यह दवा नहीं पिलायी जा सकी हो तो, उस ‘त्रुटि’ की भरपाई करने के लिए, पूरे देश में (एक बार फिर) सारे ही बच्चों को एक-एक महीने के अन्तराल से (एक साथ ही) प्रति-रक्षण दवा की दो-दो खुराकें पिलायी जाएँ! कहा गया कि, इस बात को बिल्कुल भी महत्व न दिया जाए कि किसी शिशु-विशेष को विगत वर्ष प्रति-रक्षण दवा की दोनों खुराकें, बा-कायदा, पिलायी ही जा चुकी थीं! यह भी कर लिया गया।

लेकिन द्रौपदी के चीर की तरह, आज इतने सालों के बाद भी, पोलियो-प्रतिरक्षण की वह प्रक्रिया सतत् रूप से जारी है। जैसे यही पर्याप्‍त न हो, बीच-बीच में, एक नियमित अन्तराल पर ‘बूस्टर’ खुराकों की ‘विशेषज्ञ’ सलाहें भी आ जाती हैं। और, सरकारों द्वारा ‘वैज्ञानिक’ फ़तवे की तरह इन्हें मान भी लिया जाता है। केवल उँगलियों पर गिने जाने लायक लोगों को छोड़कर इस देश में, सम्भवत:, और कोई नहीं जानता कि बोतल से बाहर निकले जिन्न का रूप ले चुका यह कार्यक्रम अब बन्द कब होगा? मुझे बहुत अचरज होगा यदि, इसे लागू करने का निर्णय लेने वाले राजनैतिक नेतृत्व से लेकर इसे कार्य-रूप देने वाले प्रशासन-तन्त्र तक में, आज एक भी व्यक्‍ति ऐसा मिल जाए जो अपने ज्ञान के आधार पर पूरे दावे से यह बता सके कि पोलियो-प्रतिरक्षण का यह कार्यक्रम कब पूरा होगा? कभी बन्द हो पायेगा भी या नहीं? या कि, यथार्थ में वह कितना लाभ-दायक होगा?

यह हमारे देश में तो क्या, शायद, पूरी दुनिया में भी यह कोई नहीं जानता। जानना चाहे, तब भी नहीं जान सकेगा। क्योंकि, इन कठ-पुतली कार्य-क्रमों और उनसे जुड़े प्रचार-प्रसार तन्त्र की डोर उन निहित स्वार्थों के हाथों में है जो स्वयं तो इस कार्य-क्रम की, तथा इस जैसे अन्य सभी कार्य-क्रमों की भी, निरर्थकता को भली भाँति जानते-समझते हैं; लेकिन दूसरों तक यह जानकारी पहुँचने नहीं देना चाहते। फिर भी, यदि कोई इस स्थिति में आ जाए तो वे उसे, अपना मुँह बन्द रखने की, मुँह-माँगी भर-पाई करते रहेंगे।

होश सम्हालने के दिनों से ही सड़क-किनारे बैठे, बातों की सफाई का खेल दिखला कर, मजमा जमाने और उससे रोजी-रोटी कमाने वालों को देखता रहा हूँ। साधारण सी समझ आने वाली, लेकिन बड़ी सफाई से रखी, एक निहायत असम्भव शर्त के पुछल्ले की छाया में वे कुछ भी कर गुजरने का दावा ठोंक देते थे। मजा यह कि, न शर्त पूरी होनी थी और न दावा। उदाहरण के तौर पर, आप उन्हें केवल दो ग्राम शेर का ताजा पित्त ला दें तो वे देखते ही देखते मुर्दे को भी श्मशान से वापस उसके घर तक दौड़ा देंगे!

कितने लोगों ने इस बात पर गौर किया है कि पोलियो के समूल उन्मूलन से भी ‘शेर के ताजे पित्त को उपलब्ध कराने’ जैसी ही एक शर्त चस्पा है — एक भी बच्चे में इसका विषाणु बच रहा तो सालों की सारी मेहनत, और राजस्व भी, व्यर्थ जायेगा। अर्थात्‌, उस स्थिति में, यह महा-व्याधि पलट कर दुबारा महा-मारी का आतंक फैला सकेगी। उसे कोई रोक नहीं पायेगा! अनेक देशों की भौगोलिक सीमाएँ परस्पर जुड़ी होने, और दुनिया के किसी भी कोने से किसी भी कोने तक व्याधियों के फैलाव की और भी दूसरी सहज तथा अनन्त सम्भावनाओं के सदा-सर्वदा उपस्थित रहने, के होते हुए क्या तब इस तरह हम सचमुच ही पोलियो-मुक्‍त हो पायेंगे?

सरकार के अनिवार्य प्रति-रक्षण कार्य-क्रम में पोलियो-उन्मूलन, फिर भी, कायम है। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह कि नमक के आयोडीनी-करण की शासकीय बाध्यता समाप्‍त हो जाने के बावजूद (इससे पहले बनाये गये माहौल को भुनाते हुए), आज भी, प्रायोजित कार्यक्रमों और प्रचार-प्रसार माध्यमों में (यहाँ तक कि सरकारी स्तर पर भी) आयोडीन और आयोडीन-युक्‍त नमक की अनिवार्यता स्थापित की जा रही है। दुर्भाग्य से, जहाँ एक ओर जिन्हें इसमें भागीदार नहीं होना चाहिए वे, तथाकथित वैज्ञानिक, भी इस दुष्प्रचार के बढ़-चढ़कर हिस्सेदार हैं वहीं दूसरी ओर, होमिअपैथी के दर्शन में इस तरह की ‘चिकित्सा-धारणाओं’ को सिरे से ही ठुकराये जाने के बाद भी, भारत वर्ष में होमिअपैथी की शिक्षा देने वाली और उन्हें मान्यता देने वाली संस्थाएँ तथा इस तन्त्र से जुड़े व्यक्‍ति भी (सम्भवत:, शासकीय प्रलोभनों और दबावों के चलते) ऐसे आयोजनों की केवल तरफ़-दारी भर नहीं करते, उनमें बढ़-चढ़कर भागी-दार भी होते हैं।

यह उनकी निजी अयोग्यता भी हो सकती है और निहित स्वार्थ भी। किन्तु, इसका ख़ामियाजा तो होमिअपैथी को ही भुगतना पड़ता है। क्योंकि, ऐसा करते हुए वे यह भूल जाते हैं कि इससे वे उस दर्शन की जड़ों में मट्‍ठा डाल रहे हैं जिसके संरक्षण-संवर्धन का स्वाँग रचते हुए ही वे अपनी वर्तमान हैसियत में पहुँचे हैं।

तथापि, महज एक छोटे से संयोग ने ऐसे कार्य-क्रमों की पोल, सार्वजनिक रूप से, खोल कर रख दी थी। प्रति-रक्षण कार्यक्रमों और रोग-उन्मूलन में मिली ‘सफलताओं’ और व्यक्‍ति की स्वास्थ्य-सुरक्षा की ‘गारण्टी’ के बढ़े-चढ़े दावों के बीच, तब, लादेन के फैलाये एक छोटे से शिगूफे ने सहज, लेकिन बड़ा ही आधार-भूत, सवाल खड़ा कर दिया था। अमेरिका जैसे ‘उन्नत’ देशों के नागरिक जहाँ एक ओर, एन्थ्रेक्स जैसे विषाणुओं से लड़ने की निजी रोग-प्रतिरोध क्षमता खो चुके हैं; वहीं दूसरी ओर, महज रोग-मुक्‍त हो जाने के भरोसे के चलते, इन देशों में इनके दुष्प्रभावों से लड़ने के पर्याप्‍त साधन भी अब उपलब्ध नहीं हैं। एक लादेन ही क्यों, रूस, ब्रिटेन और स्वयं अमेरिका जैसे ‘सुसभ्य’ देश भी वर्षों से (प्रयोग-शालाओं के नाम पर) अपने ‘रक्षा’-भण्डारों में इस तरह के तमाम जैविक शस्‍त्र न केवल सहेज कर रखे हुए हैं बल्कि, नित नयी विविधता के साथ उनकी संहार-क्षमता में निरन्तर नये आयाम जोड़ भी रहे हैं। फिर (कारण चाहे जो रहे हों), अफ़गानिस्तान में अपने उद्देश्यों में मन-चाही सफलता के लिये तरस रहे अमेरिका द्वारा तब अणु-बम सहित सभी उपलब्ध विकल्पों के उपयोग की दी गयी दादा-गिरी भरी धमकी की प्रति-गूँज हमारे मन-मस्तिष्क में अभी तक, जस की तस, कायम है।

सरल शब्दों में रोग-प्रतिरक्षण और रोग-उन्मूलन दोनों ही की नीयत और नियति पर अपनी पूरी सुर्खी के साथ चस्पा अनेक सवालिया निशानों की अन-देखी कतई नहीं की जा सकती है।

ऐसे में,, यहाँ-वहाँ से मिलने वाली छिट-पुट खबरों के तार जोड़ना बहुत जरूरी है। छन कर आने वाली, और असम्‍बद्ध सी, जान-कारियाँ भी कई बार कान खड़े कर देने वाली होती हैं। जैसे, जवाहर लाल नेहरू विश्‍व-विद्यालय नई दिल्ली के सेंटर फ़ॉर बायो-टेक्नॉलॉजी के डॉ० राकेश भटनागर और सीएसआईआर के सेण्‍टर फॉर बायो-कैमिकल टेक्नॉलॉजी के डॉ० योगेन्द्र सिंह को जब एक ‘बेहतर’ एन्थ्रैक्स वैक्सीन के विकास में सफलता मिली तो उससे जुड़ी खबर से देश को लगे हाथों, सम्भवत:, पहली बार यह सचाई ज्ञात हुई कि इससे पहले के इस तरह के टीके, एलोपैथी के अपने ही मान-दण्डों पर, अनेक गम्भीर जोखिमों से भर-पूर पाये गये थे। लेकिन इस नयी खबर से, परोक्ष रूप से, उतनी ही बड़ी यह दूसरी (मूक) सचाई भी स्वत: ही उजागर हुई कि इस खबर से पहले (यह खबर भी कितने सीमित माध्यमों से बाहर आयी? और आयी भी, तो कितनों का ध्यान इस पर गया?) उन जोखिमों से चेताने की बात तो दूर रही, उनकी खबर तक आम जन के लिए कभी जारी भी नहीं हुई थी!

खतरे यहीं तक सीमित नहीं हैं। ‘प्रयोग-धर्मी’ जब सम्भावनाओं के मद में इतना चूर हो जाते हैं कि अपनी एक ‘सफलता’-विशेष के आगे उसके दुष्परिणामों के (या, कम से कम, उनकी सम्भावनाओं के) तमाम संकेतों की जान-बूझकर अन-देखी करने लगते हैं तो जाने-अनजाने वृहत्तर समाज ही खतरे की सूली पर लटक जाता है।

साधारण नमक के माध्यम से आयोडीन खिलाने का कानून बनवा पाने की सफलता से उत्साहित ‘विज्ञानियों’ ने, बीते सालों, खाने के उसी नमक के माध्यम से लौह और कैल्शियम जैसे तत्वों की ‘भर-पाई’ करवाने की कोशिश में एड़ी-चोटी का पसीना बहाया था। सौभाग्य से, वे सफल नहीं हो पाये।

फिलहाल, एक ताजी खबर यह है कि अब सोयाबीन और टमाटर के कुछ खास (हारमोनल) रसायनों के तकनीकी घाल-मेल से बनने वाली एक विशेष ब्रेड के माध्यम से ‘कैंसर-रोधी’ औषधि उपलब्ध करायी जाने वाली है। अचरज नहीं कि ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी से निकली इस खबर के भारत वर्ष में आने के पीछे कुछ खास व्यावसायिक सोच भी हो। आखिरकार, इस तरह के प्रयोगों के लिए ‘तीसरी दुनिया’ के देश ही तो व्यवहारिक, और सुलभ भी, प्रयोग-शालाएँ होती हैं।

फिर आज तो, जीव-विज्ञानियों और ‘चिकित्सा-धर्मियों’ के सम्मुख उपलब्ध प्रलोभनों में, जीन प्रति-रोपण और प्रति-स्थापन ही सर्वोपरि हैं। बिल्कुल एक फैशन की तरह। हालाँकि, समझ-दार जानते हैं कि इस तरह की जैविक छेड़-छाड़ बौद्धिक दिवालिये-पन से हटकर और कुछ भी नहीं है।

उदाहरण के लिए, खबर है कि अमरीकी खाद्य और औषधि प्राधिकरण ने कुछ खास तरह से अपंग किये गये (लेकिन अन्यथा, उसे जीवित रखते हुए ही) एचआईवी-विषाणु को प्रयोग के तौर पर, शरीर में औषधि पहुँचाने के माध्यम के रूप में उपयोग करने की अनुमति दे दी है। यह रहस्य नहीं रहा है कि एचआईवी-विषाणु में शरीर में हर जगह पहुँचने, और वहाँ खुद को तेजी से द्वि-गुणित करने, की अद्‍भुत क्षमता है।

कहा जा रहा है कि एचआईवी के दुर्गुणों पर नकेल कस कर, उसके इन अद्‍भुत गुणों का उपयोग करने के लिए, ऐसा किया जा रहा है। लेकिन, स्वार्थ और दुराग्रह से मुक्‍त, सरसरी निगाह में ही कम से कम दो पैमानों पर यह एक ऐसा जुआ है जिसका दाँव उल्टा पड़ने पर (जो कि निश्‍चित रूप से होगा भी) पछताने को भी कुछ शेष नहीं रहेगा।

खेसारी दाल से जुड़े अपने निजी अनुभवों के आधार पर, मैं यह बात पूरे दावे के साथ कहने की स्थिति में हूँ कि जोर-जबरदस्ती (जीन-गत्‌ छेड़-छाड़) से किये गये आनुवांशिक बदलाव दीर्घ-जीवी नहीं होते हैं। समय आने पर, मूल जैविक गुण पुन: स्थापित होता ही है। हालाँकि, ऐसा क्यों होता है इसका कोई ठोस सिद्धान्त तब तक किसी ने प्रस्तुत नहीं किया था इसलिए, ‘तथ्य’ से आगे उसका कोई ‘स्पष्‍टीकरण’, अस्सी के दशक में, मेरे पास नहीं था। किन्तु आज, होमिअपैथी के दर्शन की अपनी धारणा का विकास कर लेने के उपरान्त, मैं यह सब समझा पाने में स्वयं को सक्षम मानता हूँ।

सम्पूर्ण जगत्, विकास के एक निरन्तर चक्र से जुड़ा है। और, हमारे सारे सवालों के जवाब विकास-वाद की, मेरी अपनी, इस एक त्रुटि-हीन अव-धारणा में मिल जाते हैं कि सारा कुछ कड़ियों में निबद्ध है। एक क्रम है, एक परिस्थिति है। एक कारण है, एक दबाव है। ‘करो या मरो’ की कुछ ऐसी घड़ियाँ हैं जो या तो श्रृंखला को आगे बढ़ाती हैं या फिर एक नई श्रृंखला को जन्मती हैं। अर्थात्, एक नितान्त नियम-बद्धता है जिसका अपना सहज-स्वाभाविक परिणाम है।

किसी आनुवांशिक परिवर्तन या दोष को, एक जीन-विशेष तक ही, सीमित करके देखना आधार-भूत भूल है। आनुवांशिकी में, हर अगली कड़ी पिछली कड़ियों के सम्मिश्रण की देन है। वह उनकी मोहताज भी है। जिस किसी भी कड़ी को हम काट रहे हैं वह, अतीत में कभी, वहाँ नहीं होती थी। परिस्थिति-विशेष में, पहले से उपस्थित कड़ियों और किसी सम-कालीन परिस्थिति के अटल सम्मिश्रण से, उसका वहाँ आविर्भाव हुआ। क्योंकि, तात्कालिक परिस्थितियों में पिछली कड़ियों का अगला तार्किक क्रम वही होना था। यही नहीं, उसके प्रादुर्भाव के बाद (कालान्तर से, इसी तरह) अस्तित्व में आयी शेष सभी कड़ियाँ भी इस, सर्वथा नयी, कड़ी के अपने आविर्भाव, और योगदान, से प्रादुर्भावित हुई हैं।

इसलिए, बीच की किसी एक कड़ी को काट देने से जहाँ एक ओर, उसके धारक-विशेष में उसके वहाँ बनाए रखने की प्रवृत्ति को नहीं मिटाया जा सकता है; वहीं दूसरी ओर, जितने अधिक समय तक ऐसी स्थिति को, बल-पूर्वक, बनाये रखा जायेगा उतना ही अधिक उस धारक-विशेष में मौजूद उससे अगली कड़ियों के (असन्‍तुलित हो जाने से) भर-भराने का खतरा बढ़ता जायेगा। सरल भाषा में कहें तो, एक अराजक स्थिति उत्पन्न होगी।

विज्ञान की भाषा में, इसे विकास-वाद की सहज प्राकृतिक गति को (जो कि सिद्धान्तत: स्थिर और सन्‍तुलित होती है क्योंकि, उसमें अतीत में उपस्थित हुई परिस्थितियों का स्वाभाविक तथा प्राकृतिक सामंजस्य भी होता है) कृत्रिम रूप से उद्वेलित करना भी कहा जा सकता है (जो सर्वथा एकांगी और इस कारण, अस्थिर परिणाम ही देगा)। और, इस तरह की इस सम्भावना से मना करना तथ्यों से ही नहीं, विज्ञान से भी, मुँह चुराना है।

खेसारी दाल के ही अपने अनुभव के आधार पर, मेरे सामने चिन्ता का दूसरा पैमाना यह है कि यह सम्भावना हमेशा रहेगी कि बलि चढ़ाए गये जीन के अलावा कुछ अन्य जीन भी ऐसे हों जो छिपे अपराधी हों लेकिन उनके दुष्प्रभावों का अभी तक हमें भान भी न हुआ हो। तब, केवल अपने सीमित ज्ञान के आधार पर, इस तरह बधिया किये गए (केवल इक्का-दुक्का जीन से वंचित किये गए) एचआईवी-विषाणु को सुरक्षित मानकर दवा की तरह (मानव शरीर में) उनका व्यापक प्रति-रोपण, वैक्सीन के अन्‍धा-धुन्‍ध प्रयोग से भी बड़ी, भयावह हरकत है

मजे-दार यह है कि अमेरिका, फ़्रांस और जर्मनी जैसे देश अतीत में मेडोरिनम, सोराइनम और सिफिलिनम जैसे होमिअपैथीय नोसोड ऊँची शक्‍तियों में भी (जिनके बारे में ‘विज्ञान’ का अपना मानना यह रहा है कि उनमें मूल औषधीय पदार्थ रहता ही नहीं है!) प्रति-बन्धित कर चुके हैं। क्योंकि, प्रतिबन्ध-कर्त्ताओं की निगाह में इनमें जैविक जोखिम भर-पूर होता है। लेकिन जब कभी भी, ऐसी ही कोई बात ऐलोपैथी के आर्थिक हितों पर केन्द्रित होती है, इस विधा के पैरो-कारों को ‘जोखिम’ का अपना यह ‘होमिअपैथीय नजरिया’ ध्यान नहीं रहता। वही, दोहरे मान-दण्ड!

एक बात और। ऐलोपैथी के मामलों में वैज्ञानिक जिसे ‘सुरक्षित’ मान लेते हैं, दोष-पूर्ण पदार्थ की वह मात्रा क्या सचमुच सुरक्षित होती है? लेकिन, कुछ भी कहने से पहले एक खबर और दे दूँ :

आण्विक ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ० अनिल काकोडकर का कहना है कि देश में खाद्य प्र-संस्करण में उपयोग में लायी जा रही रेडिएशन विधि पूर्णत: सुरक्षित है। कैसे? यदि डॉ० काकोडकर पर भरोसा रखें तो, केवल इसलिए कि इस विधि से प्र-संस्कृत खाद्य पदार्थ में रेडियो-धर्मिता का स्तर ‘इतना न्यून’ होता है कि उसे ‘नहीं के बराबर’ माना जाना चाहिए!

यद्यपि, कुछ तथ्यों के सामने आने पर अतीत में, अनेक बार, उपर्युक्‍त गारण्टी के सम-कक्ष किये गये अनेक दावे, स्वयं ऐलोपैथी के अपने ही मान-दण्डों पर, विशुद्ध छलावे सिद्ध हो चुके हैं। तथापि, होमिअपैथी के सिद्धान्त पर तो, यह सोच ही भरोसे लायक नहीं है। और, ऐसा दावा करने का कारण बिल्कुल सहज है। ‘विज्ञान’ के इस ‘काकोडकर’ मान-दण्ड पर कसें तो, क्योंकि होमिअपैथी की अधिकांश खुराकों में मूल औषधीय पदार्थ होता ही नहीं है, उनका कोई औषधीय प्रभाव भी नहीं होना चाहिए। किन्तु व्यापक व्यवहार में, हम इससे एकदम उलट अनुभव रखते हैं। जाहिर है, शरीर की ‘भाँपने’ की अपनी आन्तरिक क्षमता का काकोडकर जैसों का आँकलन सर्वथा दोष-पूर्ण है।

दीवार पर लिखी इतनी स्पष्‍ट इबारत के बावजूद, स्वास्थ्य सम्‍बन्धी व्यापक नीति को लागू करते समय, होमिअपैथी की उपेक्षा करना कितना न्याय-संगत है इसका निर्णय अब, निर्णय लेने वालों को नहीं, निर्णय से प्रभावित होने वालों को ही करना है। क्योंकि, आज के ‘स्थापित’ वैज्ञानिक तो बस, सुविधा-पूर्ण तरीके से, दोहरे मान-दण्डों पर ही चलेंगे। वे वैसा करने के लिए ही शिक्षित-संस्कारित हुए हैं। न्याय और तर्क उनकी फितरत में होते तो समूची दुनिया चिकित्सकीय अ-राजकता का जो ख़ामियाजा आज भर रही है, उसकी सम्भावना ही क्यों उत्पन्न होती?

(११ फरवरी २००६; www.sarokaar.com से साभार)