सब कुछ फ़िक्स है, भारत!

बन्दा जब तोप से पिटा था तब तो फ़ेमिली के लिए कुछ-कुछ गुञ्जाइश बचा पाया था। लेकिन ट्रक का हमला, लगता है, लास्ट पंच साबित होगा। यों, फेमिली पुराने चावल की मानिन्द परफ़ैक्‍ट टंच है। रास्ते निकाल ही लेगी।

Column design_Fourth Pocketहफ़्ते की गुड-मॉर्निंग याद-गार के मेरे पर्सनल कोटे में अपनी जगह को पुख़्ता करने वाली थी। नहीं, इसलिए नहीं कि उस दिन मुझे अपनी सिंगल प्याली मॉर्निंग-चा भी उनके साथ शेयर करनी पड़ी थी। और, इसलिए भी नहीं कि सुबह की ठण्डी बयार ने आधा कप चाय को बे-हद ठण्डा कर बे-स्वाद कर दिया था। दरअसल, मेरे उस दो घूँट चाय का पहला सिप लेने से भी पहले उनके मुख से कुछ ऐसे बोल फूट चुके थे कि चाय सुड़कने के लिए खुला मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। वह तो तब भी बन्द नहीं हो पाया जब, अपनी बात पूरी कर देने के बाद, वे अपनी चोंच पर अलीगढ़ी ताला लटका चुके थे।

वैसे, उनकी भंगिमा ‘नो कमेण्ट्स’ की जरूर थी लेकिन भाव ‘भौंचक होने’ जैसे बिल्कुल नहीं थे। आज के इस भौतिकता-वादी बोल-बाले में थीज़्म का ऐसा गहरा ताल-मेल केवल मॉडर्न इण्डिया में ही मिल सकता है। कैसे? अरे भैये, यही वह देश है जहाँ पॉलिटिकल एचीव-मेण्ट्स के लिए वार तो हुए ही हैं, उसी के लिए, ठेठ मैदान-ए-जंग में भी, गीता जैसा मेड-इन दार्शनिक प्रवचन तक हो चुका है। ऐसा, ऑन द स्पॉट, प्रि-वार भाषण जिसकी इम्‍फैसिस इस पर थी कि ‘सब फ़िक्स’ है!

यों, इसे लेकर मैं सीरियस होने के मूड में नहीं था। एट दि फ़र्स्ट इन्सटान्स, मुझे लगा था कि वे क्रिकेट के मैचों के फ़िक्स होने को लेकर जब-तब मचते हो-हल्ले की कोई नयी धुन छेड़ने की मुद्रा में होंगे। आप लोगों की तरह ही मैं भी बॉलीवुड की किसी तन-दिखाऊ सुन्दरी के आसरे हुए ताजे ‘खुलासे’ के मीडिया-तूफान से अपने कानों को पकने से बचा नहीं पाया था। लेकिन, मैं कुछ बोलूँ इससे पहले ही उस बन्दे ने मेरी फ़ीलिंग्स ताड़ लीं और, अपने उच्च-विचार परोसना शुरू करने से पहले ही, मुझे टोक दिया। दो टूक वर्ड्स में कन्विन्स भी कर दिया कि उनकी स्टोरी का प्लॉट वह नहीं था। फिर, इतनी जल्दी हथियार डाल दे वो आपका दोस्त कैसा? सो, मैं भी मैदान में डटा रहा।

आपकी ही तर्ज पर तुक्के की एक बुलेट दागी, “तब जरूर पॉलिटिक्स के ओछे होते जा रहे होराइजन की पोटली लेकर आये होंगे?” उनके एक्सप्रैशन-लेस मुखड़े पर व्यंग की स्मित मुस्कुराहट तैरी और विलुप्‍त हो गयी। बिजली की कौंध जितनी घड़ी में घटी इस अलौकिक सी घटना में मेरे लिए, बैक टु बैक, दो क्वाइट डिस्टिंक्‍ट मैसेज थे। कॉण्ट्ररी टु ईच अदर। यानि, ‘हाँ’ वाला एप्रिशिएशन भी और ‘बताओ तो जानें’ वाली चुनौती भी। इतने से ही जाहिर हो गया कि उन्हें मनी-शंकर के बहाने उछले इस शिगूफ़े ने रत्ती भर भी हलाकान नहीं किया था कि अपर हाउस, मेरा मतलब है राज्य-सभा, में नॉमिनेशन के बहाने राज-नीति में पिट चुके अपने मोहरों को बैठा देने भर से आला-कमान का ईगो सैटिस्फ़ाई नहीं होता है। इस सैटिस्फ़ैक्शन के लिए ऐसे मोहरों को पार्टी-व्हिप की जद में जकड़ा हुआ साबित करना भी जरूरी होता है। गोया, ‘डेमोक्रेटिक वैल्यूज़ जाएँ भाड़ में’ वाला एक डेफ़िनैट तुर्रा हर हाल में एस्टेबलिश हो!

अब क्योंकि, अपनी इस हाफ़ सक्सैस से मेरा डेस्परेट हो जाना कोई अन-होना वाक़या नहीं था मैंने गैस करना ब-दस्तूर जारी रखा। वैसे भी, डेमोक्रैसी में यही तो सिटीजन का ऐसा इकलौता बर्थ-राइट है जिसे बड़ा से बड़ा डेमोक्रैटिक डिक्‍टेटर भी छीन नहीं सकता है। कोशिश करके भी।

सो, मैंने पब्लिक के बीच उछाले जा रहे मैम्बरानों के ‘चित्त भी मेरा और पट्‍ट भी मेरा’ जैसे, पार्लियामेण्ट के अन्दर और उसके बाहर वाले, दो-मुँहे व्यवहार के बर्निंग इश्यू पर उँगली उठायी। समझौते की अपनी मजबूरी को समझते हुए यह भी सजैस्ट किया कि आम पब्लिक की तरह मुझे भी प्रो और एण्टी गवर्नमेण्ट पार्टीज़ में परफ़ैक्‍ट सिमिलैरिटी नजर आती है। पर, जब उनकी फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी वाली मुद्रा आधे परसैण्ट भी इधर से उधर नहीं हुई तो मुझे लगा कि वे उत्तराखण्ड की ‘रावती’ निराशा से घिरे होंगे। मेरा मतलब है, हरीश रावत में भरोसा रख कर कुछ भारी इन्वैस्टमेण्ट कर दिया होगा पर बहुगुणा के मेजॉरिटी-टेस्ट को पास कर लेने से डिप्रैस हो गये होंगे। और इसीलिए, खिसियाते हुए घूम रहे होंगे — सब कुछ फ़िक्स था। मिल-बाँट लिया। आगे भी मिल-बाँट खायेंगे! क्योंकि, आउट ऑफ़ शियर एक्साइटमेण्ट, मैं थोड़ा पर्सनल हो गया था; फ़ॉर ए चेञ्‍ज, मेरी ऐसी ना-गवार अन-पार्लियामेण्टरी जुर्रत के लिए, मनाही के साथ-साथ इस बार उन्होंने अपनी आँखें तरेर दीं और बिना कोई खास खुलासा किये मेरे घर से रुखसत हो गये। हाँ, जाते-जाते आगे से मेरी पीठ पर अपने दोनों हाथों का वजन डाल कर जिस लहजे में मुझे एक किनारे किया उसमें तल्ख़ी तो बिला-शक थी लेकिन कन्फ़्यूजन का यह पुट भी था कि बेटा, समन्दर की गहराई नापने के लिए कुछ और मेहनत जरुरी है!

जहिर है, उनके जाने के बाद भी मेरी अकल उनके ‘सब कुछ फ़िक्स है’ वाली पज़ल में उलझी रही। सामने पहाड़ सा दिन था और, दिल था कि पज़ल से डिगने को तैयार नहीं था। इस उलझन में, कुछ सूझा नहीं तो बीते कुछ दिनों की हैड-लाइन्स अपने ‘मेमोरी-बॉक्स’ से रि-कॉल कीं। और, सही रहा या गलत, मैं ‘गंगा नहाने’ के सन्तोष से भर गया। मेरा मतलब है, अपने पर्सनल लेवेल पर तो सौ टञ्च सेटिस्फाई हो गया —

तोप के बाद अब ट्रक का अटैक हुआ था। नहीं, देश पर तो नहीं लेकिन देश की पर्याय बनी बैठी एक प्योर पॉलिटिकल पर्सनालिटी के सबसे काबिल बेटे पर! बन्दा जब तोप से पिटा था तब तो फ़ेमिली के लिए कुछ-कुछ गुञ्जाइश बचा गया था। लेकिन ट्रक का हमला, लगता है, लास्ट पंच साबित होगा। यों, फेमिली पुराने चावल की मानिन्द परफ़ैक्‍ट टंच है। रास्ते निकाल ही लेगी। फौजी और राज-नैतिक चीफ़्स के बीच छिड़ी खतो-किताबती जंग में सियासत के हाथ ही ज्यादा लम्बे साबित होते हैं। गोया, जाँच के हो-हल्ले चाहे जितने किये जाएँ, सब कुछ पहले भी फ़िक्स था। अब भी फ़िक्स ही है!

(०१ अप्रैल २०१२)