मरोड़ना कान गधैया के

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लीकेज की एन्क्वायरियों ने ममला हॉच-पॉच कर दिया है। गोया, हिन्दी के उस उलाहने ने उनकी नींद उड़ाई थी जिसने बरसों पहले ही गठ-बन्धन की बे-चारगी को बड़ी नफ़ासत से पेश कर दिया था — गधे से नहीं जीते तो गधैया के कान मरोड़ डाले!

आज की मेरी सुबह तनिक देर से हुई। होती भी क्यों ना? मोटा-मोटी, सारी रात देश की चिन्ता में करवटें बदलना ही नसीब में था। इसलिए इधर पलकें झपकीं, उधर कमबख़्त मुर्गे ने मेरे ही टपरे पर कब्जा कर बाँग देनी शुरू कर दी। और, मैंने ढिठाई दिखायी तो काला धन-पतियों के लिए सद्‍-बुद्धि की डिमाण्ड करती प्रभात-फेरियों ने चारपाई पर जैसे रोड़े बगरा दिये। इसके बाद तो सुबह की जरूरतों के लिये गली के फेरे लगाने वालों ने जैसे ठान लिया कि या तो मैं अलसाऊँगा या फिर वे ही कर्मठता की मिसाल कायम करके रहेंगे। बस, एक अदद भला मानुष आखिर कितने चैलेञ्जेज़ विन-ओवर कर सकता था? हार कर उठ बैठा और बुझे दिल से चाय की तलब में मॉर्निंग-वॉक पर निकल पड़ा।

गली की नुक्कड़ से आगे बढ़ा भी नहीं था कि मेन रोड से आती दु:ख-लहरी की एक टेर कानों में पड़ी — ‘करूँ क्या, आस निरास भयी…।’ लगा, सहगल पा के बीते युग में फेमस हुए गाने को कोई अलाप रहा था। शायद आत्म-कथा की तर्ज पर। या शायद, आँखों ही आँखों में कटी बीती रात का सदमा मुझ पर इस कदर सवार हो चुका था कि भर्राये गले से निकली हर आवाज मुझे गाने वाले के हम-राही होने का भरम देने लगी थी। खैर, मैंने आगे बढ़ कर उसका ग़म बाँटने की ठानी और लपक कर उसका बगल-गीर हो गया। तिरछी निगाहों से देखा तो पाया कि बन्दा, गाहे-बगाहे पब्लिक इण्टरेस्ट में पसीज उठने वाला, दूर का परिचित है। कॉमन-नेस के नाम पर, बहुतायत से पायी जाने वाली, जो दो इण्डियन खासियतें हम दोनों के खातों में मौजूद मिलीं वे थीं — बे-बसी और सदा-बहार खुश-फ़हमी।

इन कॉमन-नेसों का ही तकाजा था कि बतियाने का जी हो आया। हम दोनों का ही। बुजुर्ग कह गये हैं कि यह बतियाने का प्लेट-फ़ॉर्म ही है जो हम जैसे बे-बसों की खुश-फ़हमियों को नेस्‍तनाबूद होने से बचाये रखता है। तमाम एडवर्सिटीज़ के बाद भी, इम्मॉर्टली, ब-दस्‍तूर जिन्दा रखता है। सो, मैंने अपनी सवालिया निगाह उस पर उछाली और बदले में उसने भी ‘बतलाता हूँ, जरा धीरज रखो’ वाला पुराना एश्योरेन्सी झुन-झुना मुझे थमा दिया। फिर क्या था, हम दोनों ने सड़क पर इस नीयत की खोजी निगाह दौड़ायी कि सबसे नजदीकी ‘टपरा’ कहाँ है? यों, दिमाग़ की गर्मी को ठण्डक पहुँचाने के लिए कुछ ठण्डा ही मोस्ट-वाण्टेड था लेकिन हमारा नसीब इतना ही खूब-सूरत होता तो सुबह-सुबह दिमाग़ के भुर्ते से इस कदर गरम भाप क्यों उठ रही होती? सो, बतौर काम्प्रोमाइज़, सुबह के सुन-सान ने बिना किसी भेद-भाव के हम दोनों की बराबरी से मदद की और दोनों बिना कोई शाब्दिक आदान-प्रदान किये, काला-पीला-हरा सा धुँआ उगलते, सबसे नजदीकी टपरे पर चाय के साथ दर्दे-जिगर शेयर करने को एग्री कर गये।

सड़क पर वो आगे निकल चुके थे और पीछे से अपने कदम बढ़ा कर मैंने ही उन्हें लपका था। लिहाजा, पूछ-गच्छ और कन्सोलेशन वगैरह की शुरूआत भी मुझे ही करनी थी। एक औपचारिक सवाल दागते हुए वह मैंने कर भी दी, “कोई ऐसा-वैसा बे-हद जाती मामला…?” और, जवाब जब उनकी जुबान से नहीं, तरेरी हुई आँखों से आया तो साफ हो गया कि दिल की उनकी टूटन-गाथा ‘लैला-मजनू’ नहीं बल्कि ‘तोता-मैना’ वाली तर्ज पर लिखी गयी थी। ‘करूँ क्या’ वाला कन्फ़्यूजन भले हुआ हो लेकिन ‘अब जी कर क्या करेंगे’ वाली नौबत नहीं थी। मेरा मतलब है, उनका इन्सोम्निया उनके अपने प्राइवेट इण्टरेस्ट से नहीं बल्कि लार्जर पब्लिक इण्टरेस्ट से जुड़ा था। ठीक मेरी तरह।

इस खयाल से चाय का स्वाद जरा और मीठा हो गया तो जीभ से ओंठों की मिठास का चटकारा लिया और खबरों की हॉतेस्ट-केक पर इशारे की अपनी उँगली टिकाने की हिमाक़त कर दी। बे-तक़ल्लुफ़ी से पूछ लिया कि कहीं उनकी निन्दिया ‘नेता ब-नाम फौज’ वाले मिलिटरी-मार्च ने तो नहीं छीन ली थी? जैसे आँच से सुर्ख हुए तवे पर पानी की चार बूँदें देखने वाले की आँखों को अपना अस्तित्व-बोध कराये बिना ही छनक कर लुप्‍त हो जाती हैं, उनका स्नेहिल रूप भी काफूर हो गया। ‘बकवास’ वाली उस मनमोहनी मुद्रा में, जिसके बारे में बीजेपी के वरिष्‍ठ प्रवक्‍ता ने टिप्पणी की थी कि भले ही एक लफ़्ज में किया हो, लेकिन पीएम साहिब ने बड़े दिनों बाद अपना मुख खोला था। लगा, मेरा बरसों पुराना लिहाज पे-बैक कर गया था वरना अपन तो गये थे काम से।

इस खयाल ने एक नयी प्रॉबलम खड़ी कर दी। सोचने का पर्सपेक्‍टिव बदल डाला। लगा, जनरल साहिब के ‘पे-बैक’ वाले आरोप की औचकता से घबरा उठे होंगे। लेकिन, कुछ पूछूँ इससे पहले ही ध्यान आ गया कि पॉलिटिकल हो या कॉमर्शियल, दुनिया की किसी भी लॉबी से इनका कोई वास्ता जब कभी रहा ही नहीं तब ऐसी हजारों-हजार करोड़ की डीलों के पर्दा-फ़ाश से इनके जैसा अदना आदमी क्यों घबरायेगा? अक्ल ठिकाने आयी तो सूझा कि उनकी असली घबराहट तो देश के हालातों की सीरियस-नेस के, अब तक के उस इकलौते, खुलासे से जुड़ी होगी जिसने मिलिटरी चीफ़ की पीएम को लिखी चिट्‍ठी का ‘खुल गया सिम-सिम’ बवाल खड़ा कर दिया है।

इतना सूझना था कि मेरे सामने सुबह का सबसे बड़ा दायित्व साफ हो गया। उन्हें समझाया कि जैसे जब तक ढोल साबुत रहती है, उसकी पोल को लेकर साइण्टिफिक बहसें चाहे जितनी हों फैक्चुअल मेजर-मेण्ट्स केवल स्पैकुलेशनों तक ही लिमिटेड रहते हैं; ठीक वैसी ही वार-स्ट्रैटिजीज़ होती हैं। जितनी होती है उतनी पोल दिखायी नहीं जाती और पोल जितनी दिखायी जाती है उतनी होती नहीं। भरोसे के लिए कांग्रेस की तरफ से बढ़-चढ़ कर चीखने वाले शकील मियाँ का वह लेटेस्ट टीवी कोटेशन भी सुनाया जिसमें देश-घातियों को लानत भेजते हुए उन्होंने फरमाया था, “कहीं कोई यह तो नहीं चाहता है कि कमी का कन्फ़्यूजन क्रियेट किया जाए जिससे ‘पैनिक बाइंग’ शुरू हो जाए?” लेकिन जब वे कतई इम्प्रैस नहीं हुए, मेरा मतलब है कि चाय ने उन्हें तरो-ताजा नहीं किया, तो मुझे लगा कि लीकेज की सीबीआई और आईबी एन्क्वायरियों के ऐलानों ने मामला कुछ ज्यादा ही हॉच-पॉच कर दिया है। गोया, हिन्दी के उस उलाहने ने उनकी नींद उड़ाई थी जिसने बरसों पहले ही गठ-बन्धन की बे-चारगी को बड़ी नफ़ासत से पेश कर दिया था — गधे से नहीं जीते तो गधैया के कान मरोड़ डाले!

(०८ अप्रैल २०१२)