मुँह की खिलाने वाले

Fourth Pocket

कमलनाथ ने गजब ढा दिया! कह बैठे कि एमपी में भ्रष्‍टाचार का जो नेटवर्क है वह सैण्ट्रल एड का ४० फ़ी-सदी तक डकार जाता है। गोया, बीजेपी को बेहतर रूलर होने का तमगा मिल गया। न कमलनाथ अकेले हैं और ना एमपी इकलौता सूबा। ऐसी लीडरी के होते कांग्रेस जीत चुकी जनरल इलेक्शन्स।

आज-कल के कुछ ज्यादा ही लीडिंग सैक्युलरिस्टों की बद-नामी है कि उनका सैक्युलरिज़्म इस पार वाला है। वैसी ही बद-नामी ‘फुरन्‍न-फुर्र’ अखबारी नुमाइन्दों की भी है। खास कर के उनकी जो पब्लिक में पोज़ तो यह करते हैं कि सौ-टका निर्गुटिये हैं, महज पब्लिक-इण्टरेस्ट के रखवारे। लेकिन, हुकूमत चाहे किसी की पॉलिटिकल गैंग की हो; सत्ता की कोटरी में शरीक होने वाले खासुल-खास लीडरान के पार्टी दर-बारों में राउण्ड द क्लॉक अन-डिस्टर्ब घुस-पैठ का परमानेण्ट पास बिला नागा कबाड़ लेते हैं। इन्हीं में से एक ने, कुछ-कुछ वैसा ही हक़ जताते हुए, गरमा-गरम चाय विथ ब्रैड-पकौडे की फ़रमाइश कर दी। क्योंकि इनके पास शिगूफ़ों का खजाना जो होता है, कॉफ़ी-हाउस में ऐसी दिलेरी इनकी खास अदा बन चुकी थी। और, इसी लोभ ने मेरी जुबान पर भी मंजूरी का ताला जड़े रखा।

आधा प्लेट पकौड़ा और आधी कप ही चाय उदरस्थ कर लेने के बाद उन्होंने अपनी चोंच खोली। लेकिन बोले महज एक डायलॉग ही, “यह भी कोई तैयारी है?” इसके बाद चाय-पकौड़े के सैकेण्ड इंस्टाल-मेण्ट की बारी थी। हिसाब नक्की करके अपनी बात को दार्शनिक अन्दाज में समेटा, “अब की बार मुँह की खायेंगे।” अब तक धीरज की चुप्पी साधे-साधे मेरा पेट गुड़-गुड़ाने लगा था। पब्लिक प्लेस पर किसी एम्ब्रास-मेण्ट से बचने के लिए, बिना कोई देर किये, मैंने उनकी ओर सवालिया निगाहों से ताका। और जब निगाहों ही निगाहों में उन्होंने खुलासे की तसल्ली दी तो ठीक वैसी राहत महसूस हुई जैसी बद-हजमी में थोड़ी-बहुत गैस के पास होने से एक आम इन्सान को होती है।

और, दिमाग़ जब रिलैक्स होता है तो चलने भी लगता है। देखिये ना, यूपी के सूबाई इलेक्शन में हम-उमर अखिलेश से अच्छा-खासा ठुक जाने से अमूल बेबी भी कितने टैंस हो गये थे — न दिग्गी से पूछा और ना जायसवाल या बेनी से। बिना सोचे-समझे दुनिया के सामने कुबूल लिया कि कांग्रेस के सबसे बड़े फेल्योर वे ही हैं। लेकिन, समय की धूल ने चिन्ता को कुछ कण्डेन्स किया तो इलेक्शन की मारा-मारी से बचा-खुचा दिमाग़ रिलैक्स हुआ। रिलैक्स हुआ तो चला भी। समझ में आया कि ऐसी बे-बाकी से तो पीएम की कुर्सी हाथ धर के और दूर सरका दी है। फौरन अबाउट-टर्न मारा। हार के असली दोषी को आइडेण्टिफाई करने अपनी खास एसआईटी लगा दी! लहजा बिल्कुल दो टूक है — ‘फलस्वरूप खाम-खाँ बदनाम हो रहा है, रामस्वरूप को तुरन्त ही धरा जाये!’

खैर, अपनी पर आता हूँ। दिमाग़ चला तो ध्यान आया कि वह बन्दा ओरछा होकर लौटा है। सूबा-ए-एमपी की बीजेपी वर्किंग कमेटी मीट को ‘कवर’ करने गया था। वहाँ पार्टी लीडर्स के रंग-ढंग से रू-ब-रू होकर ताजा-ताजा लौटा है। खुद देख कर आया है कि बीजेपी के हर औक़ात-दार ने ओरछा में मंसूबा बाँधा है कि अगले कैलेण्डर इयर में होने वाले असेम्बली इलेक्शन्स में वल्लभ भवन में फिर से कब्जा गाँठेंगे। ख़याल आया कि हो न हो, अपनी तिगड़मों से कुछ खास सूँघ-साँघ कर लौटे होंगे। उसी की बखिया उधेडेंगे। सच सुनने को लालयित हुआ कलेजा मुँह की ओर उछला तो जरूर लेकिन उससे पहले ही शुरू हो चुके दिमाग़ ने इमर्जेन्‍सी ब्रेक लगा दिये। ध्यान आ गया कि बन्दा खुद भी तो ‘पण्डित’ बिरादरी का है। अयोध्या जा कर राम जी के मन्दिर में मत्था न टेक पाने की बीजेपी वर्किंग कमेटी की मजबूरी समझता है। ओरछा जाने का असली मक़सद जानता है — हाजिरी देने के लिहाज से राम-राजा के दरबार को राम-लला के मन्दिर से बैटर पॉलिटिकल ऑप्शन के रूप में प्रोजेक्‍ट करना एक तीर से दो निशाने साधने जितना ही गुण-कारी होगा। सोचा, उसी की सैक्युलर मीन-मेख निकालेगा।

सड़ी-सड़ी सी बातों में ऐसी कम्युनल चीर-फाड़ की आदत के ख़याल से मुँह में बचा पकौड़ों का स्वाद कसैला हो गया। लगा, पैसे बे-कार गये। लेकिन जैसे ही पैसों की बर-बादी के लिए जी कलपा, एक-दम से सूझ गया कि पैसे तो वसूल हो गये हैं। बिना समझाये समझ गया कि उसका दिव्य-दर्शन कितना तात्विक था। फिर भी, जस्ट टु कन्फ़र्म, उससे मुखातिब होकर सवाल करने की गलती कर डाली — अच्छा-अच्छा, तो आपका मतलब यह है कि इसलिए कि बीजेपी ने राम-राजा की टैरीटोरी में बैठ कर एमपी इलेक्शन जीतने का मंसूबा बाँधा है, वह मुँह की खायेगी? रिएक्शन में अपने सिले हुए ओंठों के बीच हल्का सा चीरा लगाते हुए उसने उतने ही हल्के भाव से मेरा कन्धा थप-थपाया और बोला, “चलो, इतनी समझ तो दिखायी कि ओरछा के राम-राजा महज न्याय के कायल हैं। जस्टिस के मुद्‍दों पर वे चिरौरियों को बिल्कुल भी तरजीह नहीं देते हैं।” लेकिन, उसकी इस ‘इतनी समझ तो’ वाली मुद्रा ने साफ भी कर दिया कि वह किसी और उधेड़-बुन में था।

लिहाजा, दिमाग़ में सवाल उठना ही उठना था — तो क्या कांग्रेस एमपी में भी पिटेगी? बन्दे ने तैयारी पर सवाल उठाया था। और, पार्टी की एमपी ब्रांच में हो रही आपसी लत-भंजन उसके सवाल के जायज होने का परचम लहरा रही थी। लेकिन चोंच खोलने से पहले एक ताजा-ताजा पॉलिटिकल काण्ट्राडिक्शन याद आ गया। ध्यान आ गया कि कैसे खुली लत-भंजन के बाद भी उत्तराखण्ड में एक कांग्रेसी सीएम की कुर्सी पर काबिज हो गया था? तभी काण्ट्राडिक्शन के एक दूसरे वाक़ये ने मेमोरी की कोठी ठक-ठका दी। सूझ गया कि कांग्रेस तो काण्ट्राडिक्शन्स की अपार भण्डार है। क्या पार्टी लीडर-शिप और क्या पार्टी-मिनिस्टर्स। तुम डाल-डाल तो हम पात-पात! अब देखिये ना! गुजर गये कांग्रेसी आला-कमान कम पीएम ज्यादा ने सरकारी मदद की लूट-खसोट का नेशनल एवरेज ८५ फ़ी-सदी ठहराया था। उनके साहब-जादे इसके ताजे आँकड़े के ९५ फ़ी-सदी तक प्रोजेक्‍ट हो जाने को घोषित कर चुके हैं। ऐसे में कमलनाथ ने गजब ढा दिया। कह बैठे कि एमपी में भ्रष्‍टाचार का जो नेटवर्क है वह सैण्ट्रल एड का ४० फ़ी-सदी तक डकार जाता है! गोया, हो गया ना बण्टाढार? बीजेपी को बेहतर रूलर होने का तमगा मिल गया। न कमलनाथ अकेले हैं और ना एमपी इकलौता सूबा। ऐसी लीडरी के होते कांग्रेस जीत चुकी १३ और १४ के जनरल इलेक्शन्स। लेकिन, मैं कुछ बोलूँ उससे पहले ही वह वहाँ से सटक लिए।

(१५ अप्रैल २०१२)