तैयारी अपनी-अपनी

Fourth Pocket

भारत में पहले कहा जाता था ‘जहाँ न जाये रवि, वहाँ जाये कवि’। लेकिन, सूरज की रोशनी और शायर की काबलियत का यह ईक्वेशन इण्डिया में अब खारिज हो गया है। अब प्रसिद्ध है कि ‘जहाँ न मिलती हो परमीशन, पाओ उसको करके ऑफ़र कमीशन’।

सण्डे का दिन, चढ़ती गर्मी का मौसम और क्रिकेट के चक्कर में असली खबरों का बण्टा-ढार। ले-दे कर कुछ खबरें आ भी रही थीं तो कुछ ऐसी कि एक तरफ एक सूबे की बेगम साहिबा खबरों पर एण्टरटेन-मेण्ट को तरजीह देने का भाषण दे रही थीं तो दूसरी तरफ एक नेशनल पार्टी के स्पोक्स-पर्सन की बोलती बन्द हो रही थी क्योंकि उनसे जुड़ा कोई विडियो सोशल मीडिया के कई ठिकानों पर  एक साथ दिखाया जा रहा था। वैसे, इन दोनों इन्सानों में पॉलिटिकल गठ-बन्धन की मजबूरी के अलावा एक कॉमन-नेस और भी दिखती है। सुना है, जहाँ एक कार्टूनिस्ट ने मैडम का ऐसा मजाक बनाया था कि जल-भुन उनकी गयी पूरी सरकार ने कानून को भाड़ में झौंक डाला था वहीं पेशे से पॉलिटीशियन लेकिन वक़ालात में माहिर भाई जी पूछते फिर रहे हैं कि देश की अदालत का रुतबा ऊपर है या इण्टरनेट का?

जाहिर है, ऐसे में दुपहरिया इसी गुड़क-तान में बिगड़ी कि ‘देश में यह हो क्या रहा है?’ यों, ऐसे में जो ख़याल आते हैं वे अपनी मर्जी के मालिक ख़ुद होते हैं। लेकिन, खुद ही चिंउटी काट कर अपना होश वापस न लाया जाये तो ख़यालों की इस रेल की बोगियाँ आपस में बड़ी तर-तीब से जुड़ी मिलती हैं। एक-दम लॉजिकल। जैसे, जब इस चिन्ता ने सताना शुरू किया कि ‘हो क्या रहा है’ तो तुरन्त ही याद आ गया कि सुबह के सैर-सपाटे वाले बत-कहाव में ग़रीब क्लास के एक बुजुर्ग को चिन्ता सता रही थी कि बेटे की शादी में नेग-दस्तूर के लिए दस के थोड़े से नये-करारे नोटों का जुगाड़ भी आखिर कैसे होगा? मेरे पूछने पर उन्होंने बतलाया कि दस के नये नोट की गड्‍डी के लिए बैंक के बाबू नौ हजार का ब्लैक माँग रहे थे। भेंट-भलाई का यह ईक्वेशन पल्ले नहीं पड़ा तो किसी जान-कार ने समझाया था कि ‘किरपा’ बरसाने वाले एक निहायत दुनिया-दार बाबा धन के दीवाने लोगों को समझा रहे हैं कि दस की करारी गड्‍डी को तिजोरी में रख कर रोज-रोज निहारने से अकूत धन की आमद होगी। क्या पता, ना चलने वाले किसी बैंक के बाबू ने कुछ कमीशन-वमीशन खिला कर यह पट्‍टी पढ़ायी हो?

वैसे, जहाँ तक धन की आमद की बात है तो सरकारी महकमों का नजरिया इस बाबा से कतई इत्तेफ़ाक नहीं रखता। ठीक भी है, नोट की गड्डियाँ सरकारी तिजोरियों में ही कैद रहें, हाथों-हाथ उसके फेरे न लगें, तो मेहनत-कश सरकारी करिन्दे क्या भाड़ झौंकने के लिए दफ़्तर जाते और फ़ील्ड में पसीने बहाते फिरेंगे? और फिर, यह जरूरी भी नहीं कि जहाँ सरकारी धन खरचा जाये वहाँ खरचने वाले की चुंगी कटे ही कटे। कई बार तो बात का बतंगड़ केवल इसलिए खड़ा किया जाता है क्योंकि टाइम के उस स्लॉट में, या फिर एलॉट हुई प्रिण्ट-स्पेस में, खपाने के लिए कोई और मसाला जुगड़ ही नहीं पाता है। जैसे, एमपी के संस्कृति विभाग के हिसाब-किताब को लेकर मचाया जा रहा हो-हल्ला। शोर है कि कोई आधा करोड़ खरच कर किये गये प्रोग्राम्स में से पार्टिसिपेण्ट्स के हाथों तक दस लाख भी नहीं पहुँचे। आँकड़े सौ टंच ठीक भी हों तब भी विभागीय कारिन्दों ने शोर मचाने वालों की समझ पर एक सवाल खड़ा किया है — ऐसे आयोजनों के पीछे जो आइडिया होता है उसके पीछे सोच पार्टिसिपेण्ट्स के लिए बेनीफिट ईवेण्ट का नहीं होता। रियल आइडिया तो संस्कृति के विकास की कोशिश का होता है — हुआ भी है या नहीं इससे बहुत ऊपर उठ कर। बिल्कुल, ‘करत-करत अभ्यास के’ वाली एज-ओल्ड इण्डियन फ़िलॉसफ़ी को फ़ॉलो करते हुए। अब, थोड़ा-बहुत कमीशन तो हर कहीं बँटता ही है। अपनी ओथ सैरेमनी पर तो खुद विभीषण ने भी बाँटा था। इसमें भी बँटा हो सकता है!

कमीशन की बाँट-बिड़ार के किस्से कभी-कभी इण्टरेस्टिंग चुटकुले गढ़ देते हैं। जैसे, सत्तर के दशक में इस पर बहस छिड़ गयी थी कि जबलपुर मुनिसपाल्टी के एक कार्पोरेटर कई ट्रॉली गोबर खा गया। हुआ यह था कि उन्होंने अपने वार्ड में इकट्‍ठा हुए गोबर की खाद बेच खायी थी। यों, ये किस्से सीरियस शिगूफ़े-बाजी के मौके भी दे देते हैं। जैसे, जनरल सिंह से जुड़े मामले में हुआ। पूरी कांग्रेस पार्टी और सरकार में उसके हिस्से-पुर्जे एक ही रट लगाते रहे कि जनरल ने लिख कर शिकायत नहीं की थी इसलिए डिफेन्स मिनिस्टर ने मामले को संजीदगी से नहीं लिया, कोई जाँच कराना जरूरी नहीं माना! फिर, अचानक चक्कर ऐसा उलझा कि मन्त्री, सरकार और कुछ खास पॉलिटीशियन्स कमीशन-खोरी के सन्देह में गहरे डूबे दिखने लगे। इसने हालात बदल डाले और सरकार ने मामला खुफ़िया जाँच के पाले में डाल दिया, बिना जनरल की रिटिन कम्प्लेण्ट के ही। अब जनरल से पूछा जा रहा है कि शिकायत करने में इतनी देर क्यों की?

कमीशन से ही ध्यान आया, एक समय के सांस्कृतिक भारत में कहा जाता था ‘जहाँ न जाये रवि, वहाँ जाये कवि’। लेकिन, अब के प्रोग्रेसिव इण्डिया में सूरज की रोशनी और शायर की काबलियत का यह ईक्वेशन खारिज हो गया है। अब प्रसिद्ध है कि ‘जहाँ न मिलती हो परमीशन, पाओ उसको करके ऑफ़र कमीशन’। देश के नये लीडर, जी हाँ वही मियां हजारे, और उनकी पल्टन इसी ग़म की ही तो छाती पीटती फिर रही है। बाज-दफ़े असर भी होता दिखता है। लेकिन, इनकी अपनी टोली की कोई न कोई खोट हर कोशिश को ठण्डे बस्ते में ले जा कर अटका जाती है। इस बार तो, खुद चौधरी ही भटक गये दिख रहे हैं। और, इस डाइग्रेशन ने सिरियस नसल के फाइनेन्स मिनिस्टर मोशाय तक को मुस्कुराने की गोल्डन अपार्चुनिटी दे दी है। मुस्कुरायें भी क्यों नहीं? काला-पीला करके चाँदी काटने को मुद्‍दा बना कर देश में नयी हवा बहाने वाले को सोने पर टैक्स बढ़ाने के विरोध में सड़क पर उतर आये सराफ़ा कारो-बारियों की तरफ़-दारी करते देखना एण्टरटेन-मेण्ट चैनल के किसी एपीसोड की लाइव शूटिंग देखने जितना एक्साइटिंग जो होता है। खास कर तब, जब आम आदमी की बिरादरी से एक बन्दे ने भी आगे आ कर इस टैक्स की खिलाफ़त नहीं की थी। खाम-खाँ, इस शिगूफ़े को हवा मिली कि लोकपाल आन्दोलन की जनता के बीच कमजोर होती पकड़ को काउण्टर करने की तैयारी में अन्ना यहाँ-वहाँ हाथ-पैर मारने को मजबूर हो गये हैं।

(२२ अप्रैल २०१२)