घेंघा : असली बीमारी तो लूट की है

Ateet Ka Jharokha

‘आधुनिक’ विज्ञान कहता है कि, आम तौर पर, आयोडीन की यह जरूरत सहज-सामान्य खान-पान से पूरी हो जाती है। जबकि, इसी के समानान्तर समाज-विज्ञानी तथ्य बतलाता है कि घेंघा-मुक्‍त क्षेत्रों की तुलना में घेंघा-पीड़ित क्षेत्रों में शोषण बहुत अधिक है।

बीसवीं सदी के आखिरी दशक में भारत के नमक-आयुक्‍त ने घोषणा की कि सन् १९९० तक देश में बनने-बिकने वाले सारे नमक को आयोडीन-युक्‍त कर दिया जायेगा। कहा गया कि यह कदम आयोडीन की कमी से होने वाले घेंघा (goiter) नामक रोग से लड़ने के लिए उठाया जा रहा था।

घेंघा से लड़ने की यह कोई पहली कोशिश नहीं थी। पिछले २० साल से ‘राष्‍ट्रीय घेंघा-नियन्त्रण कार्यक्रम’ इसी उद्देश्य से चलाया जा रहा था। परन्तु असंवेदनशील प्रशासन, लोभ-दबाव से घिरे तथाकथित विज्ञानी और जायज-नाजायज हर सम्भव तरीके से पैसा बनाने को आतुर बाजार की अ-मर्यादित तथा अ-पवित्र युति के प्रभावी रहते यह प्रयास भी समस्या से मुक्‍ति दिलाने की बात तो दूर, महज दिखावे के लिए ही सही, उसे कुरेद तक नहीं पाया था। शोषण की शिकार, और कई सामाजिक कारणों से आयोडीन की कमी झेल रही, गरीब आबादी को तब तक आयोडीन वाला नमक नहीं दे पाने वाले जिम्मेदार नेताओं और अधिकारियों की कम आलोचना नहीं हुई थी। अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मंचों और सम्मेलनों में हुई इसी खिंचाई से घबरा कर तब यह एक नया निर्णय हुआ था।

भरोसा जमाये बैठे पोषण-विज्ञानियों की नजर में, आयोडीन की कमी भारतीय उप-महाद्वीप में जड़ जमाये बैठी पोषण की गम्भीर बीमारियों में से एक है। इनकी बातों का भरोसा करें तो, घेंघा इस कमी का एकदम सामान्य और सहज ही नजर आ जाने वाला एक दुष्परिणाम भर है जो (केवल और केवल) जरूरत भर आयोडीन न मिलने से उभरता है। इस सर्वथा एकांगी दृष्‍टिकोण के उलट, एकदम समानान्तर ‘वैज्ञानिक’ तथ्य यह भी है कि, आम तौर पर, आयोडीन की यह जरूरत सहज-सामान्य खान-पान से पूरी हो जाती है। अर्थात्‌, घेंघा कु-पोषण का नतीजा है! लेकिन क्योंकि सरकार, इस दूसरे तथ्य को स्वीकार कर, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने से रही इसलिए वह, अपनी नौकरी बजा रहे, हर सम्‍बन्धित अधिकारी से यह कहलवा रही है कि क्षेत्र-विशेष में बहने वाली तेज बहाव की नदियाँ अपने पानी के साथ वहाँ की सारी आयोडीन बहा ले जा रही हैं और इस कारण वहाँ खेतों की मिट्टी की बात कौन करे, कुँओं के पानी तक में आयोडीन की गम्‍भीर कमी हो रही है!

बीसवीं सदी के नवें दशक के आते-आते तो पर्यावरण की रक्षा के लिए उठने वालों ने भी इन्हें एक अतिरिक्‍त ढाल भी थमा दी थी। सदी के आखिरी दशक में तो मध्य प्रदेश के जन-स्वास्थ्य और परिवार-कल्याण मन्‍त्रालय से सम्‍बद्ध और अतिरिक्‍त मुख्य सचिव स्तर के डॉ० ईश्‍वरदास जैसे आईएएस अधिकारी तक कहने लगे थे कि तेजी से कट रहे वनों से भी आयोडीन की कमी को बढ़ावा मिल रहा था! अगर इस तर्क में कोई दम था तो इसका अर्थ था कि उन सारे क्षेत्रों में जहाँ सालों से वन नदारत रहे थे, घेंघे का भयंकर प्रकोप रहना चाहिए था। जबकि, सचाई तो यह है कि तब तक भारतीय उपमहाद्वीप में घेंघे का सबसे अधिक प्रकोप आदिवासियों-वनवासियों के बीच ही पाया गया था! और, इस बात से कोई कैसे मना कर सकता है कि वन-वासी जीवन घने वनों की छाया में पला-बढ़ा है। आज से कोई दो हजार साल पहले अथर्व-वेद में जिस गल-गण्ड की चर्चा है, वह दरअसल घेंघा ही है।

एक मोटे अनुमान से देश की कोई पन्‍द्रह करोड़ से ऊपर की आबादी आयोडीन की कमी के घेरे में है। और, इनमें से पाँच करोड़ से अधिक घेंघा से पीड़ित हैं। एक समय, केवल हिमालय की तराई और उससे जुड़े मैदानी इलाकों में पूर्व से पश्‍चिम तक फैली देश की लगभग २४०० किलोमीटर लम्‍बी पट्‍टी ही इस बीमारी का ‘घर’ मानी जाती थी। लेकिन, इक्कीसवीं सदी के आते तक अब यह निश्‍चित हो गया है कि देश के २८ राज्यों और ७ केन्द्र-शासित क्षेत्रों में घेंघे का खतरा आज हर समय मौजूद है। कई जिलों में तो कुछ खास क्षेत्रों की आबादी का पचास फीसदी से भी अधिक इस बीमारी से परेशान है।

हालाँकि, मध्य प्रदेश तथा छत्तीस गढ़ में कुल चार जिलों — रायगढ़, सरगुजा, सीधी और शहडोल को ही ‘घेंघा-क्षेत्र’ घोषित किया गया है लेकिन छत्तीस गढ़ के पृथक राज्य बनने से पहले तक मध्य प्रदेश के तत्कालीन जन स्वास्थ्य संचालक का मानना था कि गम्‍भीरता से जाँच-पड़ताल करने पर यह क्षेत्र पूरे देश में सबसे अधिक घेंघा-प्रभावित क्षेत्र निकलेगा। विंध्याचल और सतपुड़ा के दोनों ओर के ढलानों में आयोडीन की कमी के कई क्षेत्र हैं जिनमें खण्डवा, बड़वानी, बिलासपुर, बैतूल, मण्डला और होशंगाबाद जैसे जिलों में सर्वेक्षण का काम तो तब तक शुरू भी नहीं हो पाया था। आबादी के हिसाब से, तब प्रदेश के लगभग डेढ़ करोड़ व्यक्‍तियों पर, जिनमें स्‍त्री-पुरुष-बच्चे सभी शामिल थे, यह तलवार झूल रही थी। उनके अनुसार ग्यारह जिलों में कुल जन-संख्या के लगभग पैंतीस प्रतिशत् निवासी घेंघा के मरीज थे। और, इसमें आदिवासियों का प्रतिशत् लगभग चालीस था। उप संचालक ने इस तथ्य की तरफ तब अलग से ध्यान दिलाया था कि घेंघा-मुक्‍त क्षेत्रों की तुलना में घेंघा-पीड़ित क्षेत्रों में शोषण बहुत अधिक है।

बीते लगभग चालीस सालों से भी अधिक समय से देश में नियमित रूप से यह कहा जा रहा है कि नमक के माध्यम से आयोडीन की कमी दूर करके स्थिति को सुधारा जा सकता है। परन्‍तु खुद राष्‍ट्रीय घेंघा-नियन्त्रण कार्य-क्रम के स्रोतों से इस चौंकाने वाले तथ्य का पता चलता है कि सन् १९८२ की अनुमानित जरूरत ७ लाख ६७ हजार मैट्रिक टन के मुकाबले में, तब, देश में कुल २ लाख २४ हजार मैट्रिक टन आयोडीन वाला नमक ही तैयार किया गया था। इसमें से भी, लगभग एक लाख मैट्रिक टन का निर्यात कर दिया गया! अर्थात्‌ तब कुल सोची गयी जरूरत का लगभग १५ प्रतिशत् ही देश में उपलब्ध कराया गया था।

वास्तव में आयोडीन वाला नमक दिलाने की कहानी तो और भी दु:खद है।

बिहार के पूर्वी और पश्‍चिमी चम्‍पारन जिलों को घेंघा-क्षेत्र घोषित करके, विज्ञानियों की सलाह पर, वहाँ केवल आयोडीन-युक्‍त नमक ही उपलब्ध कराने का निर्णय १९६० में लिया गया था। तब, इन दोनों जिलों में किये गये सर्वेक्षण से अनुमान लगाया गया था कि इन जिलों की कुल जन-संख्या का ४०.३ प्रतिशत् घेंघा की तकलीफ भोग रहा था। १९६४ से इन दोनों जिलों में केवल आयोडीन मिला नमक ही उपलब्ध कराया जा रहा है। पन्‍द्रह साल बाद, १९७९ में, जब यहाँ दूसरी बार सर्वेक्षण किया गया तो पता चला कि बीमारी घटने की जगह बढ़ गयी थी — पूर्वी और पश्‍चिमी चम्‍पारन क्षेत्रों में मरीजों की अनुमानित संख्या बढ़कर कुल आबादी का क्रमश: ६४.५ और ५७.२ प्रतिशत् हो गयी थी!

देश में नमक आयुक्‍त से लेकर पोषण विज्ञानियों तक, जिम्मेदार सरकारी ओहदों पर बैठा हर व्यक्‍ति इस दुर्गति के लिए स्पष्‍ट रूप से, वितरण और नियन्त्रण के लिए जिम्मे-दार प्रादेशिक और जिला स्तर के अधिकारियों को दोषी ठहरा रहा है। वे कह रहे हैं कि इन १५ सालों में आयोडीन मिले नमक की इन दोनों जिलों में की गयी आपूर्ति केवल कागजों तक ही सीमित रही थी। साफ है कि बीते समय के इतने गम्‍भीर आरोप की सचाई जान पाना आज एक असम्‍भव कार्य है। खास कर तब, जब आरोप सरकारी दस्तावेजों में दर्ज जान-कारियों में हेरा-फेरी का ही हो। लेकिन, पूरे मामले के इस सम्भावित तथ्य से भी कोई अपनी आँखें कैसे फेर सकता है कि, हो सकता है, आरोप लगाने वाले केवल अपने तथा-कथित वैज्ञानिक दावों के दोषों को ढाँकने-मूँदने के लिए सुविधा की तलाश में ही यह आरोप लगा रहे हों। क्योंकि, ऐसा नहीं कहने-करने की स्थिति में स्वयं आयोडीन की कमी की धारणा ही झूठी ठहरने वाली है।

बीसवीं सदी के नवें दशक तक मध्य प्रदेश के चार जिलों — रायगढ़, सरगुजा, सीधी और शहडोल में सादे नमक की बिक्री पर कानूनी रोक लगा दी गयी। प्रदेश के तत्कालीन जन-स्वास्थ्य संचालक मानते थे कि इस क्षेत्र में प्रति व्यक्‍ति आयोडीन मिले २५ ग्राम नमक की जरूरत थी। देश में नमक की हर प्रकार की आवक-जावक पर सीधा नियन्त्रण रखने वाले नमक-आयुक्‍त ने तब इन जिलों की कुल आबादी का हिसाब-किताब लगा कर आयोडीन वाले नमक का जो कोटा निश्‍चित किया था, तत्कालीन प्रदेश सरकार इस उपलब्धता का भी पूरा उपयोग नहीं कर पायी। इसे उदाहरण के रूप में सामने रखकर नमक-आयुक्‍त की ओर से दावा किया गया कि इन जिलों में सादा नमक भी गैर कानूनी तरीके से आ रहा था और मानव-उपयोग के लिए बिक रहा था।

डॉ० ईश्‍वरदास ने नमक-आयुक्‍त के इस दावे की हाँ में हाँ मिलाई थी। उनका कहना था कि इन चार जिलों में सादा नमक पशु-आहार के नाम पर लाया जा रहा था। डॉ० दास के अनुसार, इस प्रकार लाये जाने वाले सादे नमक को कम मूल्य और सस्ते रेल-भाड़े के कारण यहाँ के बाजारों में आयोडीन मिले नमक के मुकाबले सस्ते दाम पर बेचा जा रहा था जिससे कानूनी मान्यता वाले आयोडीन मिले नमक की बिक्री पर विपरीत प्रभाव पड़ा था। डॉ० ईश्‍वरदास यह भी मानते थे कि एकाध (जैसे टाटा) को छोड़कर किसी भी निजी व्यापारिक संस्थान को आयोडीन वाला नमक बनाने की अनुमति नहीं मिली होने से भी, प्रतियोगिता के अभाव में, या कि उत्पादन पर एकाधिकार के कारण, सार्वजनिक उपक्रम के सरकारी कारखानों में बनाए जाने वाले आयोडीन-युक्‍त नमक की कीमत बहुत अधिक थी।

कुल मिलाकर, आयोडीन-रहित नमक को मानव-खाद्य के रूप में बेचने से प्रति-बन्धित कर देने और मानव-उपयोग के लिए आयोडीन मिले नमक की ही उपलब्धता को बन्धन-कारी बना देना भी कोई व्यवहारिक हल नहीं है। अर्थात्‌, सरकारी दृष्‍टि-कोण पर परखें तो घेंघे से मुक्‍ति की कोई सम्भावना नहीं है! जबकि, तथ्यों को यथार्थ की तराजू पर तौलें तो इस देश की असली बीमारी तो लूट की है। घेंघे के अनियन्त्रित रूप से बढ़ते जाने की जड़ में भी लूट और शोषण ही हैं।

खाते-पीते व्यक्‍ति तो इससे किसी तरह बच निकलते हैं परन्तु गरीब-बेसहारा इसके एक न एक स्वरूप की चपेट में बने रहते हैं। लेकिन, इतनी साफ तस्वीर के बाद भी बीमारियों को एकदम अलग-थलग करके देखने, और हल करने, की नीति अपनायी जाती है! नतीजा यह है कि इनके बारे में ऐसे कठिन, मँहगे और अ-व्यवहारिक उपाय सुझाये जाते रहे हैं जो गरीब आदमी में भरी हुई टूटन को तो बढ़ाते ही हैं, उन्हें इस स्थिति तक लाने वाले जिम्मे-दार स्वार्थों को इससे भी लाभ कमाने का मौका देते रहते हैं।

प्राकृतिक-सामाजिक कारणों से घेंघा से घिरी आबादी पर जो बीतती है सो तो है ही, अब तो सरकार द्वारा तय की जाने वाली नयी नीतियाँ भी इस बारे में पूरे देश के लिए खतरनाक हो रही हैं। आज-कल डेयरी के दूध में प्रिजर्वेटिव के रूप में थायोसायनेट के अन्धा-धुन्ध बढ़ते, खुले तथा वैध, उपयोग से घेंघा का नया एक नया अ-प्राकृतिक आयाम खड़ा हो गया है। वैसे भी, साधारण दूध में प्रति लीटर १० से २० मिलीग्राम थायोसायनेट प्राकृतिक रूप से मौजूद रहता है।

विज्ञान बतलाता है कि दूध में ऊपर से मिलाया गया थायोसायनेट उबालने से भी समाप्‍त नहीं हो पाता है। माना जा रहा है कि दिल्ली जैसे शहरों में घेंघे के मामले अचानक ही बढ़ने के पीछे थायोसायनेट और इसी श्रेणी के दूसरे घेंघा-कारक प्रिजर्वेटिव्स की बड़ी भूमिका है। इसे नियति का व्यंग्य नहीं तो और क्या समझा जाये कि बीते समय में समाज का एक बड़ा भाग अपना सब कुछ लुट जाने के कारण घेंघा का शिकार होता आया था लेकिन अब एक दूसरा (फिलहाल छोटा सा) नया हिस्सा, पश्‍चिम की जीवन-शैली के आगे अपने को खुशी-खुशी लुटाते हुए, इस रोग को जैसे न्यौता देने में जुट गया दिख रहा है? सन् १९८७ में दिल्ली के स्कूली बच्चों के एक सर्वेक्षण से पता चला था कि साधारण स्कूलों की अपेक्षा अमीर स्कूलों के बच्चों में घेंघा के प्राथमिक लक्षण अधिक तेजी से उभर रहे हैं। अर्थात्‌, सम्पन्‍नता के प्रताप में, अब जो ज्यादा दूध पीयेंगे वे ही घेंघा के ज्यादा शिकार होंगे। स्पष्‍ट है, जो रोग अब तक ठेठ वन-वासी और गरीब क्षेत्रों का माना जाता था, अब देश की राजधानी के सम्पन्न क्षेत्रों में भी अपनी गरदन उठाने लगा है।

खान-पान, रहन-सहन और तथा-कथित चिकित्सा-सलाहों की गलतियों से घेंघा फैल रहा है तो इसके व्यवसाइयों की बाँछें खिल रही हैं। पिछले थोड़े से समय में ही देश में ‘बुद्धि-वर्धक’ नमक के विज्ञापनों की भरमार हो गयी है। और, आँखों में धूल झौंकने के इस दिन-दहाड़े खेल में आम जन को कोई भी जिम्मे-दार व्यक्‍ति यह समझाने को तैयार नहीं है कि केवल विज्ञापनों से प्रभावित होकर, गैर जरूरी रूप से, आयोडीन का इतना अन्‍धा-धुन्ध उपयोग मानव की आने वाली पीढ़ियों में गम्‍भीर दुष्प्रभाव के बीज बोने शुरू कर चुका है।

एक होमिअपैथी चिकित्सा-परामर्शदाता के अपने अनुभव के आधार पर, मुझे यह कहने में थोड़ी सी भी हिचक नहीं है कि भारत में थायराइड ग्रन्थि के अ-सन्‍तुलित व्यवहार, और उससे जुड़ी तमाम तरह की बीमारियों के मरीजों का लगातार बढ़ता जा रहा अनुपात, आयोडीन मिले नमक को खाने की अ-व्यवहारिक रूप से थोपी गयी कानूनी विवशता से सीधे-सीधे जुड़ा है।

उदाहरण के लिए, जिन व्यक्‍तियों में थायराइड ग्रन्थि की क्रिया-शीलता अतिरेक में बढ़ी होने की बीमारी होती है उनके लिए तो यह आयोडीन-मिश्रित नमक मृत्यु-कारक तक हो सकता है। स्पष्‍ट है, विज्ञापनों के सहारे स्वास्थ्य बेचने का दावा कर रहे तत्वों के लिए आदमी को लूटने के आगे-पीछे, दोनों ओर के, दरवाजे खुल गये हैं। इसके बावजूद कि, वे जो दावे कर रहे हैं उनका विज्ञान की सचाइयों से उतना और उस तरह से लेना-देना बिल्कुल भी नहीं है जितना कि प्रचारित-प्रसारित करने पर वे तुले हुए हैं। इसमें यदि यह एक तथ्य और जोड़ दिया जाये कि भोजन की थाली में पहुँचने तक आयोडीन की निर्धारित न्यूनतम्‌ मात्रा हर स्थिति में सुनिश्‍चित करने के लिए, मानव-खाद्य के रूप में उत्पादित किये जा रहे नमक में आयोडीन की अतिरेक-पूर्ण मात्रा मिलायी जा रही है तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है।

(२९ सितम्बर २००५; www.rediscoverhomoeopathy.com से साभार)