होमिअपैथी का अनन्त आकाश

Ateet Ka Jharokha

समुचित होमिअपैथी औषधि-उपचार से रोग-मुक्‍ति तो होती ही है, व्यक्‍ति की दबी-छिपी मानसिक और बौद्धिक योग्यताओं के निखार में भी मदद मिलती है। और तब वह अपनी शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक क्षमता के शिखर को छू सकता है। राष्‍ट्र के विकास का यह ऐसा महत्वपूर्ण पहलू है जिसकी भूमिका अभी तक आँकी ही नहीं गयी है।

होमिअपैथी चिकित्सा-दर्शन का ज्ञान यह भान कराता है कि व्यक्‍ति की बहुतेरी ऐसी समस्याएँ जो, तथाकथित आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान द्वारा, उसके ‘मनो-भ्रम’ या कोरे ‘काल्पनिक भय’ बतलाकर ‘उपचार से परे’ घोषित कर दी जाती हैं। जबकि, यथार्थ में, वे उसके शरीर और सामाजिक परिवेश के दोषों की मिली-जुली परिणति होती हैं और, इस कारण से, इलाज की उतनी ही हकदार हैं जितनी कि उसकी दूसरी शारीरिक व्याधियाँ। सीधे-सीधे शब्दों में, उचित औषधीय चिकित्सा से मन के उन तथाकथित भ्रमों और काल्पनिक भयों से भी मुक्‍ति मिल सकती है जो कमजोर चिकित्सा-प्रणालियों द्वारा (केवल उनकी अपनी निहित कमजोरियों के चलते) चिकित्सा के दायरे से ‘बाहर’ घोषित कर दी गयी हैं। कम से कम, होमिअपैथी तो ऐसा ही मानती है।

मेरे परामर्श-कक्ष के निम्न दो संक्षिप्‍त उदाहरणों से बात अधिक साफ होगी :

लगभग साठ वर्षीय एक महिला की शिकायत थी कि ‘डर’ उसके शरीर में ‘घुस’ गया है। वैसे तो, इस डर का उसके पास कोई स्पष्‍ट स्वरूप नहीं था; लेकिन, अपने शरीर में उसके भौतिक रूप में होने-न-होने के प्रति उसकी धारणा बिल्कुल द्विविधा-रहित थी। उसके लिये, इस डर का अस्तित्व उतना ही वास्तविक था जितने कि उसके हाथ, पैर या फिर आँख, नाक और कान! जबकि, ‘आधुनिक’ चिकित्सा-विज्ञान की दृष्‍टि में यह ‘मति-भ्रम’ के अलावा और कुछ भी नहीं था।

अन्यथा पूर्णत: स्वस्थ यह मरीजा, लगभग चार माहों से इसी स्थिति में थी और एक चिकित्सा-परामर्शदाता की अपनी भूमिका में मेरे लिए औषधि की उसकी आवश्यकता को नकारने का मतलब था कि मरीज को, शेष जीवन भर के लिए, उसके ही हाल पर छोड़ दिया जाए। मेरे मत में ऐसा करना अनुचित ही नहीं, बहुत भरोसा रखकर परामर्श-उपचार के लिए आई उस बुजुर्ग के, और उसके परिवार के भी, प्रति किया गया मेरा गम्भीर सामाजिक अपराध भी होता।

एक लाख शक्‍ति की थुजा ऑक्सिडेण्टिलिस की एकमात्र खुराक के अड़तालीस घण्टों के भीतर अपनी उपरोक्‍त समस्या से पूरी तरह मुक्‍त होने के बाद, उस बुजुर्ग ने लगभग छह साल एकदम सामान्य-स्वस्थ जीवन बिताया। इसके बाद जब उन्होंने बवासीर के मस्सों के बढ़ने और उनके बड़े तकलीफ-दायक होने का सन्‍देश भिजवाकर औषधि की माँग की तो मैंने बिना एक पल गँवाये उन्हें एक बार फिर से थुजा ऑक्सिडेण्टिलिस ही एक लाख शक्‍ति में खाने को दी। अचरज नहीं कि, एक बार फिर से उनकी तकलीफ में त्वरित सुधार हुआ — वे बवासीर की अपनी समस्या बिल्‍कुल ही भूल गयीं। क्योंकि, थुजा और केवल थुजा ही उनकी प्रधान औषधि थी। होमिअपैथी में थुजा को मनो-विक्षेप की राज-औषधि का दर्जा मिला हुआ है। हालाँकि, यहाँ वह अपने शाब्दिक अर्थ (मानसिक उन्माद अथवा विक्षिप्‍तता) पर्याप्‍त हटकर परिभाषित है।

इस मरीज से जुड़ी एक अन्य घटना बताये बिना होमिअपैथी का यह पक्ष सामने लाना अधूरा ही छूट जायेगा। थुजा की इस दूसरी खुराक के लगभग आठ-दस महीनों के बाद (मई २००२ में) उनकी खबर आई कि चेहरे (और कुछ सीमा तक गरदन पर भी) पहले से मौजूद काले-नरम मस्से, आकार और गिनती दोनों ही में, एकदम से बहुत बढ़ गये हैं। यह मस्से धीरे-धीरे बढ़ते ही जा रहे थे और वे इससे परेशान थीं। इस बार मैंने उन्हें मेडोरिनम की दस हजार शक्‍ति की एक खुराक खाने को दी। लगभग सात सप्‍ताह के बाद, जुलाई के पहले सप्‍ताह में, पता चला कि उनके मस्से तो कम ही छोटे हुए थे लेकिन उनके बायें कन्धे पर बरसों से मौजूद एक दर्द भरी गठान बहुत कुछ बैठ गई थी। यद्यपि उन्होंने, मुझसे मिलने से पहले, इसके इलाज के लिए एण्टीबायोटिक्स सहित बहुतेरी औषधियाँ लम्‍बे समय तक (बिना कोई लाभ मिले) खायी थीं लेकिन उन्होंने इस गठान का मुझसे कभी उल्लेख तक नहीं किया था। मेडोरिनम इन स्थितियों में, थुजा की सहज और प्रबल अनुगामी औषधि है!

दूसरा उदाहरण एक ऐसे व्यक्‍ति का है जिसे आम खाना बेहद प्रिय था। अचानक, न जाने क्या हुआ कि उसे लगने लगा कि आम खाते ही उसके तलुओं में जलन होने लगती है। ‘आधुनिक’ चिकित्सा-पद्धति के सामान्य मानदण्ड पर तो यह ‘मन का भ्रम’ ही था जो, समय पाकर, स्वयं ही दूर हो जाने वाला था। इसलिए, ऐलोपैथी चिकित्सा-परामर्श दाताओं की राय पर उसने समय बीतने की प्रतीक्षा मे धीरज रखा भी। लेकिन पर्याप्‍त समय के बाद भी, जब ऐसा नहीं हुआ और नौबत आम खाने के शौक को छोड़ने पर आने लगी तो, मेरी सलाह पर, उसने ऑक्ज़ेलिक एसिड की २०० शक्‍ति की दो ख़ुराकें लीं और मित्रों-परिजनों के बीच पुराना आम-प्रेमी फिर वापस आ गया!

स्पष्‍ट है कि, होमिअपैथी उपचार से उन मनो-रोगों से भी बड़ी सहजता से मुक्‍ति मिल जाती है जो अन्य चिकित्सा-विधाओं के विशेषज्ञों द्वारा औषधि-प्रयोग के दायरे से बाहर घोषित कर दिये जाते हैं।

अनुभव बतलाता है कि उचित उपचार न होने पर, तथाकथित रूप से, मानसिक भ्रान्‍तियों से प्रभावित व्यक्‍ति (विशेष प्रेरक परिस्थितियों में) आपराधिक गतिविधियों तक में उतर जाता है। जबकि, इन लक्षणों के आधार पर निर्धारित होने वाले समुचित होमिअपैथी औषधि-उपचार से रोग-मुक्‍ति तो होती ही है, व्यक्‍ति की दबी-छिपी योग्यताओं के निखार में भी मदद मिलती है। और तब, वह व्यक्‍ति अपनी शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक क्षमता के शिखर को छू सकता है।

राष्‍ट्र के विकास का यह ऐसा महत्वपूर्ण पहलू है जिसकी भूमिका अभी तक आँकी ही नहीं गयी है। मेरी दृढ़ मान्यता रही है कि, क्योंकि, बच्चे हमारे समाज-देश के भविष्य हैं; उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से सबल बनाना जितना उनके माता-पिता और शिक्षक का दायित्व है, चिकित्सक का दायित्व उससे रत्ती भर भी कम नहीं है।

उदाहरण के लिए, शील-आचरण हमारे समाज का एक महत्वपूर्ण मूल्य है। जबकि, अतिरेक पूर्ण यौन उत्तेजना और/ अथवा चेष्‍टा एक ऐसा मानव व्यवहार है जो प्रत्येक सभ्य समाज में दूषित माना गया है। पुलिस अभिलेखागारों में मौजूद दस्तावेजों की सतर्क छानबीन करें तो पता चलेगा कि हमारे समाज में बढ़ती ही जा रही आपराधिक घटनाओं के एक बड़े हिस्से के मूल में यही दोष रहता है। होमिअपैथी इसे केवल मनो-दोष ही नहीं, शरीर-दोष की श्रेणी में भी रखकर देखती है। और, इस आधार पर, बड़ी सहजता से उसका उपचार भी करती है। यदि एक योग्य होमिअपैथी चिकित्सक को शैशव काल में ही किसी शिशु में अतिरेकपूर्ण यौन उत्तेजना अथवा चेष्‍टा (और, केवल इसी कारण से, भविष्य में उसके अपराधों की ओर प्रवृत्त होने) के लक्षण दिख जाएँ तो, इसमें अचरज की कोई बात नहीं है।

जाहिर है, उचित औषधि-उपचार से इस दोष का यथा-शीघ्र निवारण करने से बहुतेरे अपराधों पर प्रभावी नियन्त्रण पाया जा सकता है।

मेरी एक मान्यता और भी है। मैं पूरे भरोसे के साथ मानता हूँ कि दुनिया भर में फैल रही (और फैलायी जा रही) तथाकथित रूप से लाइलाज और घातक बीमारियों की नित नई खबरों के बीच, विद्यमान पीढ़ियों को भले ही कोई खास राहत न दिलायी जा पा रही हो, किन्तु अगली पीढ़ियों को इनसे मुक्‍त करा पाने की चिकित्सा-जगत की सफलता के प्रति आशा की किरण हमेशा ही मौजूद रहेगी। लेकिन, इस कथन का यह अर्थ कतई नहीं है कि मैं, भविष्य में सफल होने वाली, किसी विशेष औषधि की आस लगाये बैठा हूँ। इसके विपरीत, एक होमिअपैथी चिकित्सा-परामर्शदाता की अपनी योग्यता और अनुभव के आधार पर, मुझे पूरा भरोसा है कि वर्तमान में ज्ञात होमिअपैथी औषधियों में ही इतनी क्षमता है। आवश्यकता केवल उनकी समझ, उचित चयन और उपयोग की है।

इसी तरह, बहुतों को मेरी यह बात भी अटपटी लग सकती है (लेकिन होमिअपैथी चिकित्सा-शैली यह मानती है) कि माता-पिता से हस्तान्तरित होने वाले समस्त आनुवांशिक दोषों से सन्‍तान की मुक्‍ति का सर्वोत्तम समय उसका गर्भस्थ-काल है। चिकित्सा-दर्शन के धरातल पर, इसके दो कारण हैं :

प्रथमत:, अब यह स्थापित हो चुका तथ्य है कि, यों, अधिकतर किसी न किसी व्याधि से घिरी रहने वाली स्‍त्री को उसके गर्भ-काल में उनमें से अनेक से आश्‍चर्यजनक रूप से राहत मिलती है। शर्त केवल यही है कि, वह गर्भणी के लिये निर्धारित आहार-विहार के नियम-धर्म का पालन करे। इस स्थिति में, जहाँ सामान्य तौर पर गर्भणी के शरीर में (शिशु-विकास की प्राकृतिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए) स्वाभाविक रूप से बढ़ने वाले विभिन्न हार्मोन-स्रावों को इसका श्रेय दिया जा सकता है, वहीं पुनर्जनन और अस्तित्व-रक्षा की सहज जैविक इच्छा में भी इसका आधार देखा जा सकता है।

संक्षेप में, जिस तरह माता के गर्भ-काल के मानसिक सन्ताप अथवा उसके विचार-व्यवहार के अपाचार, गर्भस्थ शिशु को शारीरिक-मानसिक विकृतियों का अनचाहा उपहार, सहज ही, दे जाते हैं उसी तरह गर्भणी के शरीर की वे सुप्‍त प्राकृतिक चेष्‍टाएँ, जो उसके अन्यथा नियमित रहने वाले दोषों में राहत दिलाने में सक्षम तो होती हैं लेकिन गर्भेतर-काल में किन्हीं कारणों से  सक्रिय नहीं हो पाती हैं; गर्भ-काल में गर्भस्थ शिशु को आनुवांशिक दोषों से मुक्‍त करने का, कम से कम, भरसक प्रयास तो अवश्य ही करती हैं।

दूसरे, होमिअपैथी में इसका एक नियत विधान है। गर्भस्थ शिशु और गर्भणी दोनों का एक साथ उपचार करने की होमिअपैथी की यह क्षमता यथार्थ में, उसकी अपनी विशिष्‍ट धारणाओं के अलावा गर्भ के विकास-क्रम के दर्शन से भी जुड़ी है।

इस उपचार का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह न तो किसी भी प्रकार की जटिल जाँच की आवश्यकता रखता है और न ही, अन्य विधाओं की तरह, यह किसी खास दोष के प्रति लक्षित है। यह तो व्यापक है। और, इस कारण किसी भी ज्ञात-अज्ञात शरीर-दोष को पनाह देने वाले आनुवांशिक हस्तान्तरण पर इतने सक्षम रूप से प्रभावी है कि होमिअपैथी के अतिरिक्‍त अन्य सभी चिकित्सा प्रणालियों के लिये यह लगभग अविश्‍वसनीय और चमत्कार जैसा ही है। होमिअपैथी की दृष्‍टि में, यह इसलिए सम्‍भव है कि अपने अस्तित्व की रक्षा के प्रति अतिरिक्‍त रूप से सजग धारिणी की अचेतन चेष्‍टाएँ, गर्भ-काल में, अपने गर्भस्थ शिशु को उन बाह्य प्रभावों से मुक्‍त करने का सहज किन्तु जी-तोड़ प्रयास करती हैं जिनसे (एक स्वतन्त्र जीव के) अपने अस्तित्व पर मण्डराते खतरों का उसने हमेशा ही अनुभव किया है।

ऐसे समय में दी जाने वाली चुनिन्दा होमिअपैथी औषधियाँ बस, इन प्रयासों की राह में बाधा डालने वाले प्रभावों से पार पाने में गर्भणी की अपनी ही चेष्‍टाओं की मददगार भर होती हैं। इन औषधियों का सहारा पाकर धारिणी का अचेतन वह कुछ तक कर डालता है जिसे आज का आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अन्यथा असम्‍भव करार कर चुका होता है।

दरअसल, जीवनी शक्‍ति को बस, सहारा भर देती है, होमिअपैथी। शेष दायित्व जीव की उत्कट जिजीविषा का है। अपने अस्तित्व और पहचान दोनों ही के प्रति सजग जीव की यह जिजीविषा, पहले तो, अपनी पहचान बनाये रखने का प्रयास करती है। लेकिन, यदि उसे लगता है कि इसकी कीमत उसे अपने अस्तित्व के जोखिम के रूप में चुकानी पड़ सकती है तब वह इन दोनों में एक, सामञ्जस्य बनाए रखने के प्रयास, में निरन्तर और भरसक लगी रहती है।

यहीं एक (विशुद्ध) मददगार की भूमिका अदा करता है होमिअपैथी उपचार!

जन्म के बाद शिशु की सबसे प्रधान आवश्यकता उसका पोषण है और इसके लिये प्राथमिक रूप से वह अपनी माता पर निर्भर है। एक तरह से, यह निर्भरता उसके लिये वरदान भी है। क्योंकि, जीवन की कठिनाइयों से पार पाने की उसकी आत्म-निर्भरता बहुत कुछ इसी पोषण में निर्धारित होती है। चिकित्सा-जगत्‌ एकमत है कि माता का दूध अपने नैसर्गिक गुणों से जितना अधिक परिपूर्ण होगा शिशु के (आजीवन) रोग-दोष से मुक्‍त रहने की सम्‍भावनाएँ उतनी ही अधिक रहेंगी। मात्रा और गुण दोनों में ही माँ के दूध की कमियों को दूर करने की होमिअपैथी औषधियों की क्षमता का दूसरा कोई सानी नहीं है।

मजेदार तो यह है कि, अनुभव के सहारे इस सबको स्वीकार कर लेना जितना आसान है; अनुभव से गुजरे बिना (केवल उसकी प्रशंसा में काढ़े गए कसीदों को पढ़कर) होमिअपैथी के इन दावों पर भरोसे का विचार भी उससे कठिन है। सम्‍भवत: इसका सबसे बड़ा कारण है, होमिअपैथी में निहित विज्ञान की समझ का अभाव।

हठ, चिड़-चिड़ापन, शर्म, ईर्ष्या, छल-कपट, दर्प, हीन-भाव, झूठ और मन्द-बुद्धि जैसे आम देखे जाने वाले शिशु-दोष, उसके भविष्य को हमारी सामान्य कल्पना से कहीं अधिक प्रभावित करते हैं। अन्य विधाएँ इनमें से बहुत कम मामलों में शरीर-दोष देखती हैं। और, इसका खामियाजा व्यक्‍ति आजीवन भरता है। जबकि होमिअपैथी, ऐसी हर समस्या के मूल में कोई न कोई शरीर-दोष (आम भाषा में कहें तो, रोग) ही देखती है। इसी कारण, आश्‍चर्य नहीं कि उसके पास इनमें से प्रत्येक का एक न एक अचूक उपचार भी है।

उचित होमिअपैथी उपचार करने पर उपर्युक्‍त दोषों से प्रभावित व्यक्‍ति में इतना सकारात्मक सुधार लाया जा सकता है कि, फिर, समाज का गुणात्मक विकास रोके नहीं रुके।

प्रस्तुत है, मेरे परामर्श-कक्ष से एक और उदाहरण :

प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में जुटा लगभग सत्रह वर्षीय तनाव-ग्रस्त एक मरीज मेरे परामर्श में था। अभी वह निरन्तर प्रगति दिखा ही रहा था कि एक दिन अचानक, उसके अभिभावकों ने फोन पर मुझे बतलाया कि उसने एक बार फिर से हथियार डाल दिए हैं। उनका कहना था कि अपनी पुस्तकें, नोट्स आदि एक तरफ पटक कर पिछले दो दिनों से वह निपट निराशा में लेटा हुआ था। यों, विद्यार्थी कुशाग्र-बुद्धि था और, मेरे परामर्श में आने के बाद से तब तक, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की जाँच के लिए हुए विभिन्न पर्चों में लगातार औसतन ९० प्रतिशत अंक निकाल रहा था। लेकिन (अभिभावकों के बताए अनुसार), विगत दो दिनों से वह ऐसा निराशाजनक व्यवहार कर रहा था कि आगे से उससे न तो प्रतियोगी परीक्षा की पढ़ाई होगी और न ही वह अपनी नियमित परीक्षा में बैठ पायेगा।

चूँकि, उसकी प्रतियोगी परीक्षा को केवल दस दिन ही बचे थे इसलिए, अभिभावक (जिनमें से एक स्थानीय शासकीय महाविद्यालय में वरिष्‍ठ प्राध्यापक था) ‘परीक्षा-भय’ को ही इसका कारण मान रहे थे। वे चाह रहे थे कि जिन होमिअपैथी औषधियों से उसे परीक्षा-भय, हीन भावना, और भय-जनित अवसाद-चिड़चिड़ेपन की उसकी पिछली शिकायतों में लाभ मिलता आ रहा था, उनमें से ही कोई एक देकर मैं उसे, फिर से, पटरी पर ले आऊँ।

लेकिन, इस मरीज के पारिवारिक परिवेश से एक सीमा तक परिचित होने के संयोग से मुझे एक अतिरिक्‍त जानकारी यह भी थी कि उसके परिवार का एक सदस्य बसने के लिए कुछ दिनों पहले ही विदेश गया था। और, उसके वहाँ धीरे-धीरे व्यवस्थित होते जाने की खबरें विगत पाँच-छह दिनों से, इस परिवार में चर्चा का प्रमुख विषय रही थीं। मुझे लगा कि, सम्‍भवत:, यह ईर्ष्या है जो इस रूप में अपना प्रभाव दिखा रही है। ईर्ष्य़ालु नक्स वॉमिका की छह शक्‍ति की दो खुराकों ने (मरीज के अभिभावक के शब्दों में), “जैसे चमत्कार ही कर दिया!”

यही होमिअपैथी है।

मेरा तो यहाँ तक मानना है कि विशुद्ध राष्‍ट्रीय विकास के नजरिये से भी, बिना किसी भेद-भाव के और अब से एक लम्‍बे समय तक, हमारे देश की आने वाली प्रत्येक पीढ़ी का उपचार उसके गर्भस्थ काल से ही हाथ में लिया जाए। अन्य विधाओं के लिये यह भले ही परी-लोक के किसी कथानक जैसी बात हो, एक योग्य होमिअपैथी चिकित्सक के लिए यह जमीनी सचाई है।

अपने सामने आये ऐसे हर अवसर को मैंने सुयोग माना है और अपने तईं, छिटपुट ही सही, ऐसे प्रयोग किये हैं। उनकी सफलता के अपने अनुभव के आधार पर मैं यहाँ दृढ़तापूर्वक कह सकता हूँ कि इस दिशा में पूरी ईमानदारी से प्रयास करने पर आज ऐसी कोई भी व्याधि नहीं है जो दुर्जय रहे। यही नहीं, भारत वर्ष जैसे तीसरी दुनिया के देशों में किसी न किसी रूप में मौजूद न केवल प्रौढ़-शिक्षा, जन-स्वास्थ्य, वर्गोन्नति बल्कि आरक्षण और शिक्षण-प्रशिक्षण की तथाकथित प्रोत्साहन योजनाओं जैसे धन-बहाऊ मदों में भारी कटौती की जा सकेगी।

केवल सावधानी के नाते यहाँ यह कहना बहुत जरूरी है कि मेरे इस कथन का आधार, किसी भी रूप में, अनैतिक जैविक छेड़-छाड़ में नहीं बल्कि, विशुद्धत: होमिअपैथी के उन आधारभूत सिद्धान्तों के कठोर परिपालन में है जिनका प्रतिपादन ही प्रकृति से की जाने वाली हर अनुचित छेड़-छाड़ के विरोध में हुआ है।

(०५ नवम्बर २००७; www.rediscoverhomoeopathy.com से साभार)