नारी.नारी..नारी…!

Ateet Ka Jharokha

बोफोर्स पर सफाई देना या तो भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस का दल-गत्‌ या फिर सोनिया गांधी का अपना निहायत वैयक्‍तिक-पारिवारिक दायित्व है। उस सोनिया का, संयोग-वशात् ही जिसके उप-नाम से जुड़ गये ‘गांधी’ परिचय का (वंश-वृक्षावलि के हिसाब से) राष्‍ट्र-पिता मोहनदास करमचन्द गांधी से कुछ भी लेना-देना नहीं है। ना ही, भले ही संयोग-वशात् वह एक नारी हों, बोफोर्स की सफाई किसी ‘नारी’ को देनी है।

जब से चुनावों का माहौल गरम हुआ है, देश के एक न एक कोने से ‘नारी बचाओ अभियान’ की तर्ज पर एक न एक वक्‍तव्य जरूर आ रहा है। फलाने जी क्षमा माँगिये, ‘नारी’ का अप-मान हो गया! जैसे, एक व्यक्‍ति संयोग से ‘नारी’ क्या हो गया, संयोग की इस नियामत से देश की आत्मा हो गया!

नहीं, यह ‘भारत वर्ष’ नाम-धारी इस राष्‍ट्र की प्रति-निधि मन:स्थिति नहीं है। यह तो इसे ‘इण्डिया’ बनाने-बताने पर तुले निहित स्वार्थों की सोच और उससे जुड़ी उनकी चाल-बाजी हो सकती है। यह, नाम की कानूनी विरासत अपनी-अपनी जेबों में ठूँसे घूम रहे, कांग्रेस के समय-सिद्ध चापलूसों और स्वतन्‍त्रता संग्राम के बलिदान-कर्त्ताओं की गौरव-शाली परम्‍परा को अप-मान के गर्त में डुबो देने वाले स्वार्थियों की भीड़ के ठेके-दारों की भी मानसिकता हो सकती है। लेकिन, इतिहास गवाह है कि उस जमात में भी मत-भिन्नता के सुर उठते रहे हैं। गोखले-तिलक-गांधी की त्याग, सेवा और देश के स्वाभि-मान की रक्षा के जोश से ओत-प्रोत कांग्रेस और उस कांग्रेस के नाम की दुहाई देती आज की सत्ता-लोलुप कांग्रेस में स्वर्ग तथा नर्क का अन्‍तर है। लेकिन क्षुद्र चापलूसों की अपनी तथा अपने जैसों की इस भीड़ में, देश में बाकी सबको समझ में आ रहे, इस अन्‍तर को देखने की कोशिश करने लायक मनो-बल रहने ही नहीं दिया है; इसके ‘सक्षम’ नेतृत्व ने। किसी में बच पाया हो तो उसे समझ में आयेगा कि राज-नेताओं के तमाम ओछे-पन के बा-वजूद देश अभी भी इतना छोटा नहीं हुआ है।

यह तो तब भी नहीं हुआ था जब ऐसे ही एक दूसरे ‘व्यक्‍ति’ को ‘समूचा राष्‍ट्र’ सिद्ध करने के चाटु-कारों के नित नये स्वाँग उसके दरबार में चल रहे थे। उससे पहले भी नहीं, जब देश के पहले प्रधान मन्‍त्री बने इसी परिवार के बुजुर्ग के (काल्पनिक) उत्तराधिकार की प्रायोजित बहस कुछ इस अन्‍दाज में चलायी जा रही थी कि नेहरू के बाद देश को नेतृत्व दे सके ऐसा एक भी माई का लाल देश में पैदा नहीं हो पाया था। जाहिर है, इस तरह की सारी बातें व्यक्‍ति-विशेष के हितों को देखकर तो की ही जाती हैं, अपने मूल में, देश को तुच्छ सिद्ध करने की व्यक्‍तियों की दबी-उजागर भावनाओं को पूरे देश पर थोपने के प्रयासों से भी सराबोर होती हैं।

और नारी?

वह तो आम आदमी के लिए दुर्गम, हिमालय के इलाकों में, पेड़ों को कटने से बचाने की कोशिश में उनसे लिपटे हुए ही कांग्रेसी सरकारों के अफसरों और वृक्ष-माफिया के हाथों आबरू लुटने से बचाने को भी प्रयास-रत थी।

वह तो, भोपाल गैस के जहर और पार्टी की छत्र-छाया में तत्‍कालीन इतिहास के कांग्रेस के भ्रष्‍ट-तम्‌ नेताओं की क्रूर कानूनी बे-शर्मियों के घुप्प अंधेरे में घिरी एक-एक श्‍वाँस को मोहताज हो रही थी।

तब नारी के सम्मान के इन छुट-भैये कांग्रेसी पैरो-कारों की कौन कहे, खुद (लगभग निश्‍चित दिख रहे अपने आसन्न पराभाव से डरी हुई) आज की यह ‘नारी’ और उसके सगे (भारतीय) नाते-रिश्तेदार उपर्युक्‍त और उन जैसे असंख्य प्रायोजित हादसों के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष हिस्से-दार बने अपनी दोनों आँखें और कान खोले, असीम शान्‍ति से, सब कुछ घटता हुआ कुछ इस अन्दाज में देख रहे थे जैसे किसी टीवी या कि थिएटर में कोई मनो-रंजक फिल्म देख रहे हों।

ताजे परि-प्रेक्ष्य में, बोफोर्स की सफाई किसी नारी को नहीं देनी है। भले ही संयोग-वशात् वह एक नारी हों, बोफोर्स पर सफाई देना सोनिया गांधी का अपना निहायत वैयक्‍तिक दायित्व है। उस सोनिया का, संयोग-वशात् ही, जिसके उप-नाम से जुड़ गये गांधीपरिचय का (मातृ अथवा पितृ वंशावलि के हिसाब से) राष्‍ट्र-पिता मोहनदास करमचन्द गांधी से कुछ भी लेना-देना नहीं है। चाटु-कार चाहे जो छपा लें, फ़ीरोज़ गांधी और महात्मा गांधी भिन्न परिवेशों, योग्यताओं और सोचों वाले दो अलग-अलग व्यक्‍तित्व रहे हैं। और, इसकी निजी तस्दीक करने वाले कुछ लोग सौभाग्य से आज भी मिल जायेंगे।

विदेशी मूल के मुद्दे को ऊल-जलूल उदाहरणों से न तो झुठलाया जा सकता है और न ही उनके सहारे सोनिया को, या कहें कि किसी को भी, प्रतिष्‍ठित किया जा सकता है। सोनिया नहीं तो कौन? यह कांग्रेस की दल-गत्‌ और अन्दरूनी समस्या है। इस देश की तो कतई नहीं। पूरे देश को याद दिलाने की जरूरत भले न हो, सोनिया को तो बताया ही जाना चाहिए कि अपनी पार्टी की समस्याओं को जबरदस्ती पूरे देश पर थोपने का एक खामियाजा सोनिया की सास, अतीत में, देश के खाते में डाल चुकी हैं। आपात्-काल के काले दिनों के रूप में। ऐसा कोई दूसरा प्रयास अब यह देश बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करेगा।

फिर, अपनी पार्टी की समस्याओं को देश पर थोपने के प्रयासों में कांग्रेसी यह भूलते जा रहे हैं कि इस तरह तो वे देश के लिए अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्‍बन्धों की क्लिष्‍टताएँ आमन्‍त्रित कर रहे हैं। साथ ही, अपनी इन निहायत गैर-जिम्मेदाराना हरकतों से वे, पीढ़ियों पहले भारत छोड़ कर गये (या जबरिया छुड़ा कर भेजे गये) और बाहर बस गये (या बसा दिये गये) भारतीय मूल के व्यक्‍तियों के लिए विदेशों में बड़ा संकट भी खड़ा करते जा रहे हैं।

सोनिया को अपने समक्ष मौजूद इन तमाम सचाइयों को स्वीकारना ही होगा। ऐसा करके ही वह अपने नेतृत्व के संकट से खुद भी उबर पायेंगी और अपनी पार्टी को भी उबार पायेंगी। और तब, उस देश को भी बचा पायेंगी जिसे ‘अपना’ कहते आजकल वे थक नहीं रही हैं।

सोनिया में यदि सचमुच नेतृत्व क्षमता है, फिर चाहे वह पार्टी का हो, अपने चुनाव-क्षेत्र रायबरेली का हो या राष्‍ट्र का; तो उन्हें अपने आप को ‘देश के लिए पति की कुर्बानी देने वाली’ थोथी छवि से ऊपर उठने की कोशिश करनी चाहिए। कारण चाहे जो हों; पार्टी पर प्रभुत्व जमाने के लिए माँ की ‘कुर्बानी’ का उसके बेटे द्वारा, या पति की कुर्बानीका उसकी विधवा द्वारा, किया गया भर-पूर भावात्मक भया-दोहन उसकी अपनी ही पार्टी की अन्दरूनी कमजोरियों से जुड़ा मुद्दा है। राष्‍ट्र को इससे उतना ही लेना-देना है जो इस देश की, इससे मिलती-जुलती परिस्थितियों में विधवा होने वाली, किसी भी अन्य विधवा के मामले में सनातन रूप से होता आया है। बल्कि, अपनी इटालियन नागरिकता बर-करार रखने और इटली में अपनी (पैतृक) सम्‍पत्ति होने की खुले आम घोषणा करने के कारण, सोनिया का यह अधिकार भी अन्य भारतीय नारियों की तुलना में उन्नीसा ठहरेगा।

इसी तरह, राजनैतिक नेतृत्व के लिए ‘राजीव को न्यायालय ने निर्दोष सिद्ध कर दिया है’ जैसे झूठों का औचित्य की सीमा से आगे उपयोग, जैसे-तैसे बचाई गयी इज्जत को दुबारा दाँव पर लगाने के जोखिम के सम-तुल्य है। बल्कि, उससे एक कदम आगे ही। क्योंकि इस अति संवेदन-शील मुद्दे की परतें उघड़ने से रण-नीति पूर्वक कमाई गयी कानूनी सफलता को खो देने की सम्‍भावनाएँ ही प्रबल हैं। शायद, यह तथ्य उन्हें जेठमलानी-संघवी-सिब्बल की योग्य सलाह-कार मण्डली ने ठीक से समझाई नहीं है।

सोनिया को, कम से कम खुद के लिए तो, यह जानना जरूरी है कि राजीव गांधी तमाम सन्‍देहों से परे, बेदाग बरी नहीं हुए हैं। राजीव का ‘बरी’ होना महज एक तकनीकी जीत है, जिसमें उन परिस्थितियों का बहुत अधिक योगदान है जो स्वयं उन्होंने, और उनके उत्तराधिकारी कांग्रेसी नेतृत्व ने भी, ‘भारत सरकार’ के कार्य-शील राज-नैतिक नेतृत्व की हैसियत से जान-बूझकर निर्मित की थीं। ऐसी कानूनी परिस्थितियाँ जो आपराधिक मामलों में, नामजद आरोपियों को सन्‍देह का भर-पूर लाभ प्रदान करती हैं। दिल्ली से प्रकाशित एक अखबार ने हाल ही में एक महत्व-पूर्ण विदेशी जाँच-कर्त्ता के हवाले से रहस्योद्‌घाटन किया था कि भारत सरकार के दबाव के कारण ही समुचित जानकारियाँ भारत नहीं भेजी गयी थीं। इस खबर का कोई अधिकृत खण्डन न तो उस देश से आया और न इस देश से।

हाँ, पूरी कांग्रेसी बे-शर्मी से, पार्टी के प्रवक्‍ता और कानूनी लटकों-झटकों के महा-रथी कपिल सिब्बल ने प्रिंट और टीवी मीडिया के भीड़ भरे संवाद-दाता सम्मेलन में एक-दम साफ-साफ शब्दों में यह कह कर सफाई देने की कोशिश जरूर की कि यह खबर तो १९८८ में ही छप चुकी थी! दरअसल, यह एक ऐसी सफाई थी जिस पर देश की न्याय-प्रणाली के सारे तारों को एक-दम से झन-झना जाना था। लेकिन, वहाँ तो एक जूँ भी नहीं रेंगी। तो क्या अब इसी हथ-कण्डे का लाभ सोनिया जनता के बीच भी लूट सकेंगी? वे इतनी समझ-दार तो हैं कि जानती हैं कि ऐसा कर पाना आसान बिल्कुल भी नहीं है। खास कर तब जब उनका परिवार इस एक खोटे सिक्के को कई बार चला चुका हो। शायद इसीलिए, वह अब भावात्मक भया-दोहन की नई रण-नीति पर चल रही हैं।

ठीक इसी तरह, सोनिया को यह भी ध्यान में रखना होगा कि ‘गोधरा’ और ‘बेस्ट बेकरी’ उनके अमोघ अस्‍त्र नहीं हैं। ‘गुजरात के दंगों से जो राज-नैतिक फसल वे काट सकती थीं, काट चुकी हैं’ यह समझने का इससे बेहतर समय और कोई नहीं होगा। इस मुद्दे पर आज नहीं तो कल, इसके सिर-मौर मुँह की खायेंगे जरूर। फिर चाहे वे कितने ही बड़े कानून-विद् क्यों न हों। प्रजा-तन्‍त्र के उन बड़े कलंकित दिनों को देश के सबसे कलंकित दिन ठहराये जाने के प्रयास, इसमें जुटे व्यक्‍तियों पर, स्वाभविक पलटवार करेंगे। और तब खुद कांग्रेसी नेतृत्व को अपने चेहरों को साफ-सुथरा दिखाने के लिए बड़े यत्‍न करने होंगे। ये यत्‍न अधिक-तर अ-सफल सिद्ध होते हैं, इसका ज्ञान इतिहास की उन्हीं किताबों में मिल जायेगा जिनको लेकर कांग्रेसी बड़ा बबाल माचाते रहते हैं।

इन्दिरा गांधी की दुर्भाग्य-जनक हत्या के बाद हुए दंगों से जुड़ी सिखों की हत्या के कांग्रेसी हुड़-दंगियों के बचाव में आगे आये उनके बेटे राजीव का यह कथन कि ‘एक बड़े पेड़ के गिरने से थोड़ा-बहुत भूचाल तो आता ही है’ निश्‍चित रूप से बेस्ट बेकरी हादसे से बहुत बड़ी प्रतिक्रिया थी। निष्पक्ष रूप से गौर करें तो प्रधान मन्‍त्री के पद पर रहते हुए भी राजीव द्वारा किया गया वह गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार दरअसल, ‘बेस्ट बेकरीकाण्ड में निहित मानसिकता की ही उपज था। कहने को तो, यहाँ तक कहा जा सकता है कि बेस्ट बेकरी काण्ड दरअसल राजीव के कर्मों की नींव पर खड़ा हुआ था। देश राजीव के अपने निहायत ओछे चारित्रिक प्रदर्शन की उस घटना को भूला नहीं है, भूलेगा भी नहीं — यह याद रखना जितना कांग्रेस के लिए जरूरी है उससे कहीं कई गुना सोनिया और उनके परिवार के लिए जरूरी रहेगा।

एक राष्‍ट्रीय दल के नेतृत्व को अपने स्‍त्री या पुरुष होने के भाव से ऊपर उठना होगा। साथ ही, उसे बिल्कुल साफ तौर पर देश को यह सन्‍देश भी देना होगा कि सोते-उठते, अपनी ससुराल की कुछ पीढ़ियों के नाम पर कृपा अथवा भावना की पुर-जोर याचना करने से बेहतर है देश को यह भरोसा दिलाना कि उन पीढ़ियों ने दर्प या स्वार्थ में चूर होकर, या कि महज भूल-वश ही सही, जो अ-क्षम्य सामाजिक अप-कार किये हैं, वह भविष्य में उन्हें अब कभी भी दुहराये नहीं जाने की तमाम सावधानियाँ रखेगा। लेकिन इसके लिए योग्यताएँ चाहिए। इन योग्यताओं को प्रयोग में लाने लायक आत्म-विश्‍वास चाहिए। और चाहिए आत्म-संयम भी।

इन जमीनी सचाइयों के बीच वह ‘नारी’ कहाँ से आ गयी, केवल जिसकी दुहाई उनकी पार्टी और, उसकी सलाहकार मण्डली के बूते, वे स्वयं भी देती फिर रही हैं इन चुनावों में?

(२३ अप्रैल २००४; www.sarokaar.com से साभार)