सवालों से घिरे हैं ‘सरकार’ के सरोकार

Ateet Ka Jharokha

नियमों को बनाने की छूट का लाभ उठाकर ‘सरकार’ आईसीआईसीआई होम फाइनेंस कम्‍पनी लिमिटेड जैसे उन खास प्रतिष्‍ठानों को गैर-कानूनी लाभ देने में जुट गयी है जो इसके बिल्कुल भी अधिकारी नहीं हैं। इस विशुद्ध व्यावसायिक कम्‍पनी का विशेषाधिकार केवल इतना है कि वह एक अन्य निजी व्यावसायिक संस्थान आईसीआईसी बैंक की शत्-प्रतिशत् मिल्कियत में है।

एक समय था जब व्यवसाइयों के वेश में आये मुट्‍ठी भर लुटेरे अंग्रेज ‘हुकूमत’ बन कर भारत की आम जनता से धन-उगाही के लिए देशी लेकिन उच्च-वर्गीय धन-बल वीरों को अपनी चौथ-वसूली का ठेका दिया करते थे। इसे तब ‘माल-गुजारी’ का नाम दिया गया था। इनसे स्वतन्त्रता मिलने के बाद समय ने करवट खायी और, एक बार फिर, सूद-खोरों की वसूली के लिए ठेठ गुण्डों की दर-कार बढ़ गयी। लेकिन, ऐसा लगता है कि विकास के साथ ही वसूली के प्रति दृष्‍टि-कोण के साथ ही साधनों में भी पर्याप्‍त विकास हुआ है। इसी ‘विकास’ के चलते सूद-खोरी अब सभ्य-जनों के, बल्कि कहें तो, ‘राज-रक्षित’ व्यवसाय के रूप में अधि-मान्य हो गयी है। और इस कारण, अब ‘सरकार’ स्वयं भी कमीशन खाकर निजी सूद-खोरों का पैसा उगाह रही है। आश्‍चर्य की बात यह है कि यह सब उस ‘राजस्व’ की वसूली के नाम पर हो रहा है जिसका सूद-खोरी के इस स्पष्‍ट व्यवसाय से कुछ भी लेना-देना नहीं है। इस तरह, गैर-कानूनी ढंग से हड़का कर, वसूली जा रही रकम पर दण्ड तथा ब्याज की ऊँची दरें उसकी अपनी ही मर्जी से निर्धारित हो रही हैं।

यही नहीं, यह सब इस एक ऐसे बड़े घाल-मेल में हो रहा है कि न्याय-भीरु समाज की तो बात कौन करे, खुद न्याय-विज्ञों तक को कोई शक न हो और इसे कानून का गैर-कानूनी संरक्षण भी मिलता रहे। जैसा कि समझ पड़ रहा है इस बन्‍दर-बाँट में छल और दबाव के लगभग वही हथ-कण्डे काम में लाये जा रहे हैं जो अतीत में (बल्कि आज भी) गुण्डे-मवालियों के मजबूत हथियार हुआ करते थे। आश्‍चर्य है तो बस यह कि, ऐसा करते हुए ‘सरकार’ इस बात का ध्यान भी नहीं रख रही है कि इस देश का एक स्थापित संविधान है और उस संविधान की संरक्षा करता एक भरा-पूरा न्याय-तन्त्र भी है जो, देर से ही सही, हस्तक्षेप करने की ताकत रखता है। यदि अनुमान की चूक नहीं है तो, लिखे जाने तक यह वसूली अरबों तक पहुँच चुकी होगी जिसमें से अच्छा खासा हिस्सा चुनिन्‍दा सरकारी अधिकारियों के निजी खातों में स्थानान्तरित हो चुका होगा। वह भी, बा-कायदा एक नम्‍बर में! और हाँ, दो नम्‍बर का क्या कोई हिसाब रहता है?

नूतन हो या कि पुरातन, समाज में ‘सरकार’ की अव-धारणा यों तो बड़ी सरल रही है लेकिन भारतीय किस्म के प्रजा-तन्त्र में यह बड़ी घाल-मेल भरी सिद्ध हुई है। शायद, अपने उस पुरातन अर्थ में पगी हुई सी जिसका एक सिरा ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ जैसे मुहावरे को आज भी थामे हुए है।

प्रजा-तन्त्र में कुछ लोग यह मुगालता पाले हुए हैं कि मत-पेटी से निकले जिन्नात ही वह अन्‍तिम ताकतें हैं जो ‘सरकार’ कहलाने का अधिकार रखती हैं। कागजी तौर पर ऐसे लोग सही भी हैं। और, उनके इस तरह से सही माने जाने से, वे जिन्न भी अपने को ‘सरकार’ मान लेने की ताल ठोंकते फिरते मिल जायेंगे जो समय-दर-समय जन-मत रूपी छोटी-बड़ी बोतलों में ठूँसे और फिर बाहर निकाले जाते हैं। लेकिन, अनुभव ने दर्शाया है कि सब मुगालतों में जी रहे हैं। असली ‘सरकार’ तो वे हैं जो कागजों पर तो, और शायद सार्वजनिक देख-दिखावे में भी, सरकारों की जी हुजूरी करते जान पड़ते हैं लेकिन व्यवहार में पूरे देश को अपनी जी-हुजूरी के लिए मजबूर करते रहते हैं। चूँकि इस बारे में इन बीते सालों में बहुत कुछ लिखा-कहा जा चुका है (बल्कि अब तो न्याय के मन्दिरों में बजने वाली कुछ घण्टियों से भी इसी सुर-ताल की गूँज होती समझ पड़ने लगी है) कि इस बहस को विस्तार देने की कोई जरूरत शेष नहीं रही है।

तब फिर यह बात एक बार फिर यहाँ यों उठी क्यों?

इसलिए कि, घपलों पर घपले उजागर होने के इस दौर में आम जन की निरीहता के भी उजागर होते जाने से उत्साहित यह ‘सरकारें’ इतनी बेफिक्र, या कहें कि बेशर्म, हो गयी हैं कि भरी दोपहर के सूरज को पूनम का चाँद ठहराने पर तुली हुई भर नहीं हैं, वैसा ठहरा भी पा रही हैं। रंज की बात तो यह है कि उनकी इन बेजा हरकतों के खिलाफ न्याय की गुहार के अधिकांश दरवाजे न केवल सुरक्षित किलों की तरह मजबूती से बन्द पड़े हैं बल्कि कोशिश करके इन्हें बन्द रखने वाले अपनी इस ‘सफलता’ के ढोल पीटते हुए शायद सम्मानित भी हो रहे हैं। शायद, बीरबल की यादें ताजा कराते हुए से।

बीरबल के बारे में एक किस्सा प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि उसकी घूस-खोरी की शिकायतों से तंग आकर एक बार अकबर हुजूर ने उसे ऐसा कोई जिम्मा सौंपने का निर्णय लिया जहाँ घूस मिलने की गुंजाइश रत्ती भर भी न हो। बहुत सोच-विचार के बाद बादशाह को लगा कि यदि बीरबल को समुद्र किनारे उठने वाली लहरों को गिनने का निहायत निरर्थक काम दे दिया जाये तो वह किसी से घूस वसूलने की स्थिति में नहीं रहेगा। किस्से का अन्त यह है कि बीरबल ने यहाँ बैठकर भी घूस खायी और मजे की खायी! उसने बस, लहरों की गिनती के ‘शाही काम’ में दखल डालने के नाम पर वहाँ से गुजरने वाली नावों को वहाँ से गुजरने या वहाँ पड़ाव डालने से सख्ती से रोकना शुरू कर दिया!

बीरबल का उपरोक्‍त कथानक कितना वास्तविक है और कितना काल्पनिक, यह बताना चाहे जितना कठिन हो, ‘सरकारी अमले की मिली भगत से लोक-धन को हड़पे जाने से बचाने की नीयत से १९८८ में लागू किया गया मध्य प्रदेश लोक धन (शोध्य राशियों की वसूली) अधिनियम १९८७ बीरबल के इस किस्से की स्वाभाविक पुनरावृत्ति साबित हो रहा है’ यह कह पाना आज उतना ही आसान है।

सभी जानते हैं कि सरकारी तन्त्र पर मजबूत पकड़ रखने वाला एक बड़ा वर्ग सरकारी खजाने को दोनों हाथों लूटने में लगा है। इसमें राज-नेता और नौकर-शाहों के साथ ही इनके दलाल भी शामिल हैं। यहाँ, बड़े महत्व का यह स्पष्‍टीकरण जरूरी हो जाता है कि ‘दलाल’ कहने से इस तीसरे तबके की न तो हैसियत कम होती है और न ही भूमिका। कहा तो यह भी जा सकता है कि खजाने की लूट में शामिल इस तीसरे तबके की कुछ मछलियाँ इतनी विशाल हैं कि वे विश्‍व बैंक जैसी व्यापक लाबियों की सिफारिशें लेकर यहाँ के व्यापार-महासागर में उतरी हैं और इस देश की अर्थ-व्यवस्था को निगलने में जुट गयी हैं। जाहिर है, यह तबका अब धीरे-धीरे अपने दोनों सह-भागी तबकों के भाग्य का लेखक तक साबित होता जा रहा है।

यह बड़ी मछलियाँ आम जन की अपेक्षाओं को अ-व्यवहारिक रूप से ऊँचा उठाने और इसकी आड़ में या तो शासन पर दबाव बढ़ाने, या फिर, शासन में मौजूद ‘अपनों’ के सहारे अपने धन्‍धे के अनुकूल माहौल बनाने और उसके लिए हर सम्‍भव सुविधा जुटाने की दो-तरफा मुहिम पर रही हैं। उन्हें इस बात से भी कोई सरोकार नहीं है कि इन ‘व्यवस्थाओं’ के लिए ‘सरकार’ को किस सीमा तक कानून को अपने हाथों में लेना पड़ेगा। वे तो, सारी बातों को व्यापार और कमाई की तराजू पर तौलती हैं। और, निजी हितों की पूर्ति में जुटी छोटी-बड़ी सभी ‘सरकारें’ भी धन की खातिर उनसे हर सम्‍भव सहयोग करने के लिए तत्पर दिख रही हैं।

सहयोग की इस धुरी में फँस कर जो पिस रहा है वह ऐसा आम नागरिक है जो सरकार और संविधान दोनों से डरता है। जबकि जिन्हें डरना चाहिए, और जिनकी असंयत हरकतों को नियंत्रण में रखने के लिए नित नये कानून बने हैं, उनकी बाँछें खिली हुई हैं क्योंकि सरकारें गैर-कानूनी तरीकों के सहारे अ-नीति पर चलने वाले व्यवसायी को हर सम्‍भव संरक्षण दे रही हैं।

आये दिन बहसें होती रही हैं कि औसत निरीह नागरिक पर टैक्स थोपते जाने की जगह राजस्व की एकत्र हुई बड़ी-बड़ी रकमें भिन्न-भिन्न तरीकों से खा कर भाग जाने वाले सफेद-पोश बे-ईमानों से वह राशियाँ सख्ती से वसूलने को प्राथमिकता दी जाये। जबकि, बैंकों और सरकारों में शामिल इन तत्वों के सह-योगियों की हर-चन्द कोशिश होती है कि यह राशि डूबन्त खाते में डालकर भुला दी जाये। इसी स्थिति से उबरने के लिए मध्य प्रदेश में एक अधिनियम पारित हुआ।

अपने मूल रूप में मध्य प्रदेश लोक धन अधिनियम (शोध्य राशियों की वसूली) अधिनियम १९८७ लोक-धन को हड़पे जाने से बचाने की नीयत से पारित हुआ था। इस दिशा में अधिनियम में संशय की गुंजाइश नहीं रखी गयी थी। कम से कम, प्रस्तावना के रूप में तो लक्ष्य एकदम साफ था — आधार-भूत रूप से जरूरी हुई सामाजिक जिम्मे-दारियों के तहत सरकार की पहल पर बाँटा हुआ लोक-धन लूट-खसोट में जाने से हर हालत में रोका जाये। और, यदि किसी जुगत से ऐसा हो भी जाये तो, उसकी वसूली त्वरित तो हो ही, तमाम गैर-वाजिब हथ-कण्डों से मुक्‍त भी रहे।

स्वयं अधिनियम की प्रस्तावना में ही साफ किया गया है कि अधिनियम ‘कतिपय वर्गों की शोध्य राशियों की, जो राज्य सरकार, सरकारी कम्‍पनियों तथा कतिपय प्रवर्गों के निगमों और बैंककारी कम्‍पनियों को देय है, शीघ्र वसूली’ (Speedy recovery of certain classes of dues payable to the State Government, Government Companies and certain categories of Corporations and Banking Companies) के सीमित और स्पष्‍ट उद्देश्य के लिए है।

अर्थात्, सभी तरह के और सभी ऋण-दाताओं के, दुनिया भर के सारे ऋणों की बकाया पर इस अधिनियम के प्रावधानों को आँखें बन्द करके लागू नहीं किया जा सकता है।

इसके लिए, अधिनियम में निम्न दो बिन्दु मुख्य हैं और दोनों ही अधिनियम में बिना किसी सन्‍देह के साफ किये गये हैं :

(अ)  किसका दिया हुआ ऋण इस अधिनियम के तहत संरक्षित है?

(ब)  किस तरह का ऋण इस अधिनियम के तहत संरक्षित है?

अर्थात्‌, न तो सभी ऋण-दाता अधिनियम का लाभ उठा सकते हैं और न ही सभी तरह के ऋणों की वसूली इस अधिनियम के दायरे में आती है। इसका सरल सा अर्थ यह है कि उपर्युक्‍त दोनों मुख्य बिन्दुओं का एक साथ लागू होना ही इस अधिनियम के क्षेत्राधिकार को आधार देता है। अर्थात्, उपर्युक्‍त में से केवल किसी एक बिन्दु के सहारे किसी भी बकाया की वसूली हेतु अधिनियम का संरक्षण पाना विधि-अनुकूल नहीं है।

ऊपर दिये गये बिन्दु (अ) में शामिल होने वाले ऋण-प्रदाताओं की विभिन्न श्रेणियाँ अधिनियम में स्पष्‍टत: निर्देशित हैं [Section 2 की Clauses (a), (b), (c) और (e)]। इनके लिए अलग से किसी भी तरह की व्याख्या की न तो आवश्यकता है और न ही वह मान्य होगी।

हालाँकि, अधिनियम में ऊपर वर्णित बिन्दु (ब) के बारे में जरूर उतनी स्पष्‍टताएँ नहीं हैं लेकिन यह इसलिए है कि सरकारों को, अपनी नीतियों के हिसाब से, राज्य की नीतियों की प्राथमिकता निर्धारित करने का अधिकार प्राप्‍त है। साथ ही, राजनैतिक-सामाजिक कारणों से, सरकारों के ‘सामाजिक रूप से वांछनीयता’ का मान-दण्ड भी बदलता रह सकता है। और इस कारण से, ‘राज्य की योजनाओं’ और ‘सामाजिक रूप से वांछनीयता’ की वह सूची बदलती रह सकती है जो अधिनियम के तहत वसूली अधिकारों के लिए संरक्षित है।

लेकिन इस अधिकार के प्रयोग की मर्यादा यह है कि इसकी व्याख्या इस तरह से बिल्कुल भी नहीं की जा सकती है कि अधिनियम के खण्ड २ की धारा (घ) की उपधारा (चार) में वर्णितराज्य प्रायोजितयोजना अथवासामाजिक रूप से वांछनीययोजना की बन्‍धन-कारी शर्त की किसी भी तरह से अन-देखी कर दी जाये।

राज्य सरकार के जिस गजट नोटिफिकेशन [F. 12-3-2000-IF-IV, dated 13 September 2000 published in M.P. Rajapatra (Asadharan) dated 13-9-2000 pages 1090(1-2)] का हवाला देकर सरकारी राजस्व-वसूली अधिकारियों द्वारा यह कहा जा रहा है कि उसके अन्तर्गत्‌ अधिनियम में प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए सभी प्रकार के ऋणों की बकाया की वसूली का अधिकार उन्हें मिला हुआ है; वह वास्तव में नोटिफिकेशन की निहित स्वार्थों में पगी, पूर्वाग्रह से ग्रसित तथा गलत तरह से की जा रही व्याख्या के कारण ही है। नोटिफिकेशन में इस तरह के जिस बकाया का उन्हें अधिकार है उसे तो चुनौती ही नहीं दी जा रही है। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि अधिकार-क्षेत्र के बाहर जाकर वे जिस तरह के किसी भी सरकारी योजना/ नीति/ जिम्मेदारी से बाहर के और विशुद्ध व्यावसायिक ऋणों की वसूली करते आ रहे हैं वह विधि-सम्मत है।

दरअसल, उपर्युक्‍त कथन का अर्थ यह है कि यदि कोई गृह-ऋण ‘सामाजिक रूप से वांछनीय’ और ‘राज्य प्रायोजित’ किसी सु-स्पष्‍ट योजना के अन्‍तर्गत्‌ दिया गया है तो ऊपर वर्णित नोटिफिकेशन के अनुसार ऐसे ऋण की बकाया का अधिकार वसूली अधिकारी को मिला हुआ है। सामान्यत: ऐसे ऋण कमजोर तबकों को या फिर किसी व्यापक आपदा से घिर गये व्यक्‍तियों को, राज्य की जिम्मेदारी मानते हुए, राहत के तौर पर शासन की कल्याण-कारी योजनाओं/ घोषणाओं के तहत्‌ ही दिये जाते हैं। इनमें लिये जाने वाले ब्याज की दरों में छूटें भी मिल सकती हैं। लेकिन, ऐसा कोई भी गृह-ऋण जो न तोराज्य प्रायोजितऔर नसामाजिक रूप से वांछनीयकिसी योजना के अन्तर्गत्‌ दिया गया है, केवल इसलिए कि वह गृह-ऋण है, अधिनियम के तहत्‌ कतई वसूला नहीं जा सकता। यह तथ्य सन्‍दर्भित नोटिफिकेशन में ही मोटी-मोटी और स्पष्‍ट लिखावट में दीवार पर लिखी इबारत की तरह एकदम साफ है।

अधिनियम में, उसे कार्यान्वित करने के विभिन्न प्रयोजनों के लिए, नियम बनाने की व्यवहारिक छूट अवश्य सरकार को मिली हुई है। इसके अलावा अधिनियम में ही सरकार को यह अधिकार भी मिला हुआ है कि वह अधिनियम में निहित भावना के अनुरूप ‘सामाजिक रूप से वांछनीय’ उन योजनाओं की अपनी सूची समय-समय पर राज-पत्रीय घोषणाओं के माध्यम से जारी कर सकती है जिनमें बाँटे गये लोक धन को वह, इस अधिनियम के दायरे में लाकर, संरक्षित करना चाहती है।

किन्तु, जहाँ एक ओर उपर्युक्‍त छूट अधिनियम में ही निहित इस स्पष्‍ट निर्देश से बाधित है कि अधिनियम के अन्तर्गत्‌ बनाये जाने वाले ऐसे समस्त नियम अधिनियम में निहित मंशा और उसके दायरे को (पूर्वाग्रह-ग्रसित रूप से) किसी भी तरह से प्रभावित किये बिना, केवल उसे कार्यान्वित करने के विभिन्न प्रयोजनों तक ही सीमित रहेंगे; वहीं, दूसरी ओर मूल अधिनियम में बिना किसी संशय के स्पष्‍ट है कि राज्य सरकार नोटिफिकेशन के माध्यम से, किसी भी तरह से और किसी भी रूप/ अर्थ में अधिनियम के किसी भी प्रावधान में ऐसा कोई संशोधन नहीं कर सकती है जो अधिनियम के मूल स्वरूप अथवा दायरे को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से थोड़ा सा भी अन्यथा प्रभावित करता हो।

सरकार ने एकाधिक बार उपर्युक्‍त अधिकारों का निर्द्वन्द्व प्रयोग किया है। और, क्योंकि सामान्यत: राज्य की कल्याणकारी योजनाओं के दायरे को चुनौती नहीं दी जा सकती है; सर-सरे तौर से देखने पर, या कि इस आधार पर अधिनियम की समीक्षा करने पर, बड़े से बड़ा विधि-विशेषज्ञ भी इस सूची को लेकर कोई कानूनी दोष नहीं निकाल सकता है। लेकिन, कलेक्टर-तहसीलदार के स्तर पर, जहाँ कि उक्‍त अधिनियम के प्रावधानों को व्यवहारत: लागू किया जा सकता है, इस सूची का मन-माना अर्थ गढ़ा जा रहा है। इस स्तर पर इस सूची और इस कारण से अधिनियम की समूची व्याख्या ही सरा-सर रूप से निजी हितों का पालन-पोषण कर रहे षड-यन्त्र से आ-कण्ठ डूबी हुई है। और इस गढ़े हुए अर्थ के लपेटे में वह सब किया जा रहा है जिसे यदि कोई दूसरा करता तो कट-घरे में खड़ा करके बड़ी आसानी से उसे विभिन्न आपराधिक धाराओं का दोषी ठहरा दिया जाता।

‘सामाजिक रूप से वांछनीय’ राज्य-प्रवर्तित योजनाओं की फेहरिस्त जारी करने की छूट का लाभ उठाकर ‘सरकार’ ऐसे खास तत्वों को लाभ देने में जुट गयी है जो इसके बिल्कुल भी अधिकारी नहीं हैं। जैसे कि, आईसीआईसीआई होम फाइनेंस कम्‍पनी लिमिटेड। इस विशुद्ध व्यावसायिक कम्‍पनी का विशेषाधिकार केवल इतना है कि, उसके अनुसार, वह एक अन्य निजी व्यावसायिक संस्थान आईसीआईसीआई बैंक की शत्-प्रतिशत् मिल्कियत में आ गयी है। यहाँ, जहाँ इस बैंक की भी विशेषता जान लेनी चाहिए — आईसीआईसी बैंक के ही कभी किये गये एक दावे के अनुसार, यह बैंक भारत में विश्‍व बैंक की पहल पर स्थापित हुआ था; वहीं, इस एक बात का उल्लेख बड़े महत्व का है कि बैंकों की निगरानी करने की ही नीयत से स्थापित बैंक लोकपाल ने उनके समक्ष आईसीआईसीआई होम फाइनेंस कम्‍पनी लिमिटेड द्वारा की जा रही अ-नियमितताओं, धाँधलियों और गैर-कानूनी व्यवहार के बारे में की गयी लिखित शिकायत के प्रत्युत्तर में अपने पत्र क्र० बैलो/ भोपाल/ २००२-०३/ १६९१ दिनांकित २० अक्टूबर २००३ द्वारा लिखित रूप से यह कहा है कि यह व्यावसायिक संस्थान उसके नियमन एवं पर्यवेक्षण के दायरे में नहीं आता है।

यह इकलौता तथ्य ही यह स्थापित करने के लिए पर्याप्‍त है कि आईसीआईसीआई होम फाइनेंस कम्‍पनी लिमिटेड मध्य प्रदेश लोक धन (शोध्य राशियों की वसूली) अधिनियम १९८७ में प्रदत्त अधिकारों के प्रयोग के लिए (अधिनियम द्वारा संरक्षितबैंकिग कम्‍पनीकी परिभाषा के अन्‍तर्गत्‌) आवेदन करने की अधिकारी नहीं है।

अधिनियम का दूसरा बड़ा महत्व-पूर्ण पक्ष यह है कि, मूल रूप में, इसमें लेन-दार द्वारा ली गयी उधार अर्थात् ‘वित्तीय सहायता’ को भी बिना किसी द्विविधा के बड़े स्पष्‍ट रूप से परि-भाषित किया गया है। अधिनियम के प्रावधानों के तहत परि-भाषित ‘बैंक-कारी कम्‍पनी’ की वसूली जाने योग्य ‘वित्तीय सहायता’ के निर्धारण में ऐसी वित्तीय सहायता का बिना किसी संशय के ‘राज्य प्रायोजित योजना’ से सीधा और साफ-सुथरा जुड़ाव होना तथा तमाम संशयों से परे उसकी ‘सामाजिक रूप से वांछनीयता’ सिद्ध होना आधार-भूत शर्तें हैं। राज्य सरकार द्वारा अधिनियम के खण्ड २ की धारा (झ) में प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग कर जोड़ी गयी कोई भी सूची इन दोनों आवश्यक शर्तों के परि-प्रेक्ष्य में ही प्रभाव-शील होती है। इनसे बाहर, स्वतन्त्र रूप से, अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के सन्‍दर्भ में, इस सूची का कोई वैधानिक अर्थ नहीं है।

बिना विस्तार में गये यहाँ इतना भर कहना पर्याप्‍त होगा कि केवल ऐसी ‘वित्तीय सहायता’ जो ‘औद्योगिक समुत्थान’ के निमित्त दी गयी हो अथवा ऐसी ‘राज्य प्रायोजित योजनाओं’ के कार्यान्वन के प्रयोजन के तहत बाँटी गयी राशि जो घोषित रूप से ‘सामाजिक दृष्‍टि से वांछनीय’ हों, अथवा किसी न किसी रूप से शासकीय कोष से आ-बन्‍टित हो या फिर जिसके लिए शासन ने किसी प्रकार की कोई गारण्टी दी हो; इस अधिनियम द्वारा वसूली हेतु संरक्षित हैं। स्पष्‍ट है, किसी भी अर्थ में, विशुद्ध व्यावसायिक उद्देश्य से किये गये किसी ऋण-व्यवहार से उत्पन्न किसी भी प्रकार की कोई बकाया देन-दारी इस अधिनियम के तहत संरक्षित नहीं है। फिर भले ही दाता, स्वयं को अधिनियमित ‘बैंकिंग कम्‍पनी’ की परिभाषा में शामिल किये जाने का, कितना भी बड़ा दावे-दार क्यों न हो।

निष्कर्ष यह कि, दोनों मुख्य बिन्दुओं — ‘राज्य प्रायोजित योजना’ औरसामाजिक दृष्‍टि से वांछनीयता’का एक साथ लागू होना इस अधिनियम के क्षेत्राधिकार की बन्‍धन-कारी शर्त है; केवल किसी एक बिन्दु का होना अधिनियम के संरक्षण की पात्रता के दावे लिए अपर्याप्‍त है।

अर्थात् चाहे जो हो, मूल अधिनियम में आईसीआईसीआई होम फाइनेंस कम्‍पनी लिमिटेड के लिए गृह-वित्त के अपने बकाया-दारों के खिलाफ राजस्व वसूली के इस अधिनियम के अन्‍तर्गत्‌ सरकार के समक्ष माँग-पत्र प्रस्तुत करने की कोई भी गुंजाइश नहीं है। और, यदि वह (अधिनियम की मंशा के ठीक विपरीत) ऐसा कर भी दे तो भी, उसके द्वारा मूल अधिनियम के प्रावधानों के तहत कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत किये गये ‘वसूली प्रमाण-पत्र’ (प्रारूप-एक, नियम ३) की विधि-वत् छान-बीन किये बिना, और अधिनियम के प्रावधानों के तहत उसकी स्वीकार्यता पर विधि-पूर्वक निश्‍चित हुए बिना भी; उसका संज्ञान नहीं लिया जा सकता।

इस खुले तथ्य के बाद भी कि, उधार देकर ब्याज कमाने के प्रतियोगिता भरे खुले बाजार में विशुद्ध व्यावसायिक आधार पर विभिन्न माध्यमों और तरीकों से रिझा-रिझाकर, और बुला-बुलाकर भी, उपलब्ध कराये जाने वाले किसी भी ऋण को महजलोक धनकी वसूली के निमित्त लागू किये गये उक्‍त अधिनियम का संरक्षण नहीं दिया जा सकता है और इस कारण न तो इसे देने वाले किसी भी व्यवसायिक प्रतिष्‍ठान को अपनी व्यावसायिक वसूलियों के लिए अधिनियम के प्रावधानों को लागू करवाने के आवेदन का अधिकार है और न ही उसे लागू करने वाले शासकीय अधिकारी को ऐसा करने का क्षेत्राधिकार उपलब्ध है, विधि के प्रावधानों के विरुद्ध ऐसी वसूलियाँ धड़ल्ले से करवायी जा रही हैं।

अर्थात्, नियमों को बनाने की छूट की कृपा से और अधिनियम में (स्पष्‍टतया) बेईमानों द्वारा वसूली से बच निकलने के लिए अपनाये जाने वाले हथ-कण्डों पर लगाम कसने की सदाशयता से लागू किये गये प्रक्रियात्मक प्रावधानों का सरा-सर दुरुपयोग करते हुए भी, अब प्रदेश भर के कलेक्टर इस व्यावसायिक संस्था से सूचना मिलते ही उसके लिए धन-उगाही करने को तत्पर हुए पड़े हैं। उन्हें इस बात का भी संकोच नहीं हैं कि ऐसा करते हुए वे निहित स्वार्थों के लिए अपने पद और उसमें निहित संस्था का खुला दुरुपयोग कर रहे हैं। वे हमारी न्याय-प्रक्रिया के आधार-भूत रूप से महत्व-पूर्ण इस आदर्श की भी जानते-बूझते (और अधिकांश मामलों में शायद बद-नीयती से भी) अन-देखी करने पर तुले हुए हैं कि भले ही सौ गुनह-गार छूट जायें लेकिन कोई बे-गुनाह दण्डित नहीं होना चाहिए।

कुछ कलेक्टर और तहसीलदार यह दावा जरूर करते हैं कि एक शासकीय ‘डीओ’ के द्वारा उन्हें ऐसा करने के लिए अधिकृत किया गया है लेकिन न तो वे वह ‘डीओ’ दिखाते हैं और न यह सुनने के लिए तैयार हैं कि सरकार ही सही, महज एक ‘डीओ’ के द्वारा उनमें निहित न्यायिक हैसियत को अपनी मन-मर्जी से हाँक नहीं सकती है इसके लिए, विधान-सम्मत प्रक्रिया का अपनाया जाना जरूरी है। एक तहसीलदार ने तो उसके समक्ष रखे गये सर्वोच्च न्यायालय के एक दृष्‍टान्त को भी यह कहते हुए मानने से मना कर दिया कि उसके समक्ष ऐसे निर्णयों की कोई कीमत नहीं है। लेकिन, जब उससे यही बात लिख कर देने या फिर ऑर्डर शीट पर ही सही, दर्ज करने कहा गया तो उसने दोनों ही से साफ मना कर दिया। हाँ, स्वार्थ और पूर्वाग्रह भरी, अपनी कार्यवाही उसने जारी अवश्य रखी।

मध्य प्रदेश लोक धन (शोध्य राशियों की वसूली) अधिनियम, १९८७ के सम्‍बन्ध में विधान-सम्मत प्रक्रिया यह है कि नियम बनाने के अधिकार के अन्तर्गत्‌ केवल प्रक्रियाएँ ही निर्धारित की जा सकती हैं, अधिनियम के दायरे में कोई बदलाव कतई नहीं किया जा सकता। साथ ही, बनाये हुए नियम विधान सभा के पटल पर रखे जाना भी अनिवार्यता है। नियमों के बनाने की यह जिम्मेदारी मध्य प्रदेश सरकार ने अपने एक नोटिफिकेशन के माध्यम से पूरी कर ली जिसका प्रकाशन म० प्र० राज-पत्र (अ-साधारण) दिनांकित २४-१२-१९८८ में किया गया।

जबकि, प्रदेश सरकार ने दिनांक ५ नवम्‍बर १९८८ और १३ सितम्‍बर २००० की राज-पत्रित घोषणाओं के द्वारा उक्‍त अधिनियम के खण्ड २ की धारा (झ) के तहत उपलब्ध अधिकारों का प्रयोग करते हुए ‘सामाजिक दृष्‍टि से वांछनीय’ योजनाओं की फेहरिस्त में मन-मानी हेरा-फेरी भी कर ली। सारा खेल इसी फेहरिस्त में है जिसमें सरकार में निहित अदृश्य ‘सरकारों’ द्वारा ‘सामाजिक रूप से वांछनीय’ राज्य-प्रवर्तित योजनाओं की सूची में कुछ अ-स्पष्‍ट लेकिन विशिष्‍ट प्रविष्‍ठियाँ भी जोड़ दी गयी हैं। अधिनियम के पालन के नाम पर हो रही शासकीय धोखा-धड़ी पर निगाह डालें तो एक-दम साफ हो जाता है कि यह सब सोच-विचार कर और निजी सूद-खोर व्यावसायिक प्रतिष्‍ठानों के हाथों वसूली अधिकारियों की साठ-गाँठ से भोली-भाली जनता को धड़ल्ले से ठगने की सुविधा निर्मित करने के उद्देश्य से किया गया है।

यद्यपि उपरोक्‍त सन्‍दर्भ में कानूनी स्थिति बिल्कुल साफ है कि तमाम सन्‍देहास्पद नीयत के बावजूद इन प्रविष्‍ठियों के माध्यम से अधिनियम के ऐसे मन-माने अर्थ नहीं गढ़े जा सकते हैं जो अधिनियम में निहित मूल भाव और उसके अधिकार-क्षेत्र को विपरीत रूप से किसी भी तरह प्रभावित कर सकें। फिर, तरीका चाहे प्रत्यक्ष हो अथवा परोक्ष। लेकिन व्यवहार में किसी भी जिले के कलेक्टर-तहसीलदार की कचहरी में किसी भी दिन जाकर इस तथ्य की पुष्‍टि की जा सकती है कि वहाँ कुर्की-नीलामी की सरकारी हैसियत की बन्दर-घुड़की देकर निजी गृहस्थी की टीवी, फ्रिज या फिर मोटर-साइकिल, मकान जैसी (किसी भी प्रकार के वास्ते से सरकार से कोसों दूर तक किसी भी प्रकार का कोई सम्‍बन्ध नहीं रखने वाली) निहायत निजी खरीद-दारियों के लिए विशुद्ध व्यावसायिक आधार पर लिये गये कर्जे की वसूली का एक तरह से समानान्तर व्यवसाय चल रहा है। यह वे वसूलियाँ हैं जो ‘राजस्व’ वसूली के इस अधिनियम के दायरे से साफ-साफ बाहर हैं।

प्रदेश के कटनी जिले के एक ही परिवार में की गयी पाँच आत्म-हत्याओं के कारण उठी राख की गर्द शायद अभी ठीक तरह से बैठी नहीं है। लेकिन, वह घटना एक तरह से भुला ही दी गयी है। जबकि, उपर्युक्‍त सारी बातें उस घटना पर भी एक सीमा तक सीधे-सीधे लागू होती हैं। कायदे से जाँच की जाये तो अनेक व्यक्‍तियों के विरुद्ध ‘आत्म-हत्या’ की परिस्थितियों को निर्मित करने की साजिश तक का आरोप बड़ी आसानी से सिद्ध किया जा सकता है।

कानून के जान-कारों का कहना है कि आईसीआईसीआई होम फाइनेंस कम्‍पनी लिमिटेड या इस जैसे अन्य किसी भी व्यापारिक प्रतिष्‍ठान द्वारा कलेक्टरों के समक्ष नियम ३ प्रारूप-एक के अन्‍तर्गत्‌ प्रस्तुत किये गये घोषणा-पत्रों की ग्राह्यता की स्वतन्त्र न्यायिक छान-बीन होनी चाहिए और यदि उसमें घोषणा-गत्‌ उपरोक्‍त दोष पाये जाते हैं तो न केवल झूठी घोषणा के लिए घोषणा-कर्त्ता व्यक्‍ति, और उसके नियोक्‍ता संस्थान दोनों ही, के विरुद्ध दण्ड-प्रक्रिया संहिता के अन्‍तर्गत्‌ समुचित न्यायिक प्रक्रिया तुरन्त ही प्रारम्‍भ की जानी चाहिए बल्कि, मिली-भगत अथवा पदेन ला-परवाही के लिए सम्‍बन्धित अधिकारियों के खिलाफ भी समुचित दण्डात्मक कार्यवाहियाँ की जानी चाहिए। यही न्याय का तकाजा है। यही समाज का विश्‍वास भी है।

(२९ अक्‍टूबर २००४; www.sarokaar.com से साभार)