सिंघवी-विवाद : यह कैसी निजता?

Sarokar

इसमें दो मत नहीं कि निजत्व का अपना अस्तित्व है। इसे नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन, सचाई यह भी है कि सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्‍ठा को अर्जित करने के लिए अपने वैयक्‍तिक जीवन के तथ्यों के पोस्टर तानने वाले निजत्व का यह विशेषाधिकार सदा-सर्वदा के लिए खो देते हैं।

बीते दिनों दो ऐसी घटनाएँ घटीं जिनके कारण राष्‍ट्रीय परि-दृष्य पर दो बहसें समानान्तर रूप से फूटीं। उथली दृष्‍टि से देखने के आदी व्यक्‍ति इस घटना-क्रम में मात्र एक संयोग से आगे किसी अन्य व्यापक साम्य को सिरे से नकारते हैं। इसके विपरीत, तथ्यों को उनकी जड़ तक पहुँच कर समझने में रुचि रखने वालों को इनमें आधार-भूत सम-रूपता दिखलायी देती है। इन विचार-शील व्यक्‍तियों को हलाकानी हो रही है कि किस तरह से, एक ही सामाजिक-नैतिक आधार के चौ-गिर्द समानान्तर रूप से घटी दो घटनाओं को, प्रायोजित बहसों के माध्यम से, दो ‘अलग-अलग’ धाराओं के रूप में, कुछ इस शैली में बढ़ाया जा रहा है जिससे लगे कि दोनों में एक सूत्र का भी मेल नहीं है। जबकि, सरल सा तथ्य यह है कि इन घटनाओं का प्रवाह परस्पर विपरीत दिशाओं में अवश्य हुआ है किन्तु घटनाओं के पीछे काम कर रही नीयत और सूत्र-धार, नि:सन्देह, उभय-निष्‍ठ हैं।

ये धाराएँ मीडिया के माध्यम से छेड़ी गयी सबसे ताजी उन बहसों की देन हैं जो इन घटनाओं से जुड़े गहरे सामाजिक सरोकारों की खुली उपेक्षा करके आरम्भ की गयी हैं। कहा तो यह भी जा सकता है कि इन्हें छेड़ा ही इस बद-नीयती से गया है कि जन-मानस को घटना-क्रम से जुड़े गहरे नैतिक-सामाजिक सरोकारों से भटका कर, बलात्‌, किसी और दल-दल में ठेल दिया जाए। वैसे, बहसें हमारे समाज का सहज-स्वाभाविक हिस्सा रही हैं। लेकिन, इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया की अति-सक्रियता ने बहसों से मन-चाहा दोहन करने की क्षमता के निर्माण और विस्तार में बहुत योग-दान किया है। सरल शब्दों में, आम जन के ज्ञान-चक्षुओं पर भ्रमित करने वाली रण-नैतिक पट्‍टी बाँध देने के राज-नैतिक षड-यन्त्रों का सर्वथा नया प्रयास अपने चरम पर पहुँच गया है।

प्रिण्ट-मीडिया के मध्यम से छेड़ी जाती किसी बहस की यह सीमा है कि, प्रायोजन चाहे जितनी कुशलता से किया जाए, उसमें सारा कुछ केवल और केवल समग्रित रूप से परोसना होता है। और, यही सीमा ऐसी बहसों का उज्जवल पक्ष भी है। क्योंकि, इस तरह से आयोजित बहसों में पाठक को उसके विवेक से, एक सीमा से आगे, वंचित नहीं रखा सकता है। इसके उलट, ‘लाइव’ के नाम पर छेड़ी जाती इलेक्‍ट्रॉनिक मीडियाई बहसों की यह विशेष क्षमता है कि इनके माध्यम से सम्बन्धित पक्षों को त्वरित रुप से, अर्थात्‌ रंगे हाथों, घेरते हुए उनकी कमजोर नस अपने दर्शकों को पकड़ायी जा सकती हैं। सद्‌-नीयत इसकी इकलौती शर्त है। और, नीयत के इसी बिन्दु पर पहुँच कर इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया का ऐसा स्खलन भी सम्भव हो जाता है जिस पर, चाह कर भी, दर्शक अपनी कोई पकड़ नहीं बना सकता है — इसकी बहसों को मन-चाही क्रूरता से रोका-टोका और तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। नीयत में खोट हो तो यह सब इतनी ढिठाई से किया जाता है कि उसे देखते-सुनते समय, बहस से बाहर बैठा औसत मूक दर्शक चाह कर भी, अपने विवेक को मीडिया का गिरवी हो जाने से रोक नहीं सकता है। हाँ, जिस किसी में यह योग्यता है कि वह बहस में शामिल हुए पात्र-विशेष में उठे, स्वयं के बहस की बिसात का मोहरा-मात्र बना दिये जाने की, निरीहता के भाव पढ़ और समझ सके; वह, समय पाकर, इस सदमे से उबर अवश्य जाता है।

मौलाना शमून काज़मी और अभिषेक मनु सिंघवी से जुड़ी, और समानान्तर रूप से घटी, दो घटनाएँ यही चेता रही हैं।

पहली घटना लोकपाल आन्दोलन को लेकर दिल्ली में जुटी अन्ना हजारे और उनकी कोर-कमेटी की बैठक में घटी। खबर का संक्षेप यह है कि सदस्यों ने पाया कि बैठक में उपस्थित शमून काज़मी नाम का उनका एक साथी अपने दो-दो मोबाइलों के माध्यम से बैठक की पल-पल की जीती-जागती खबरें मीडिया को प्रेषित कर रहा था। दरअसल, कमरे के भीतर हो रही बात-चीत से जोड़ कर पूछे जाते मीडिया के तीखे सवाल जब बैठक के भागी-दारों को हलाकान करने लगे तब उन्हें सन्देह हुआ कि उनके बीच का कोई ‘अपना’ ही भेदिए की भूमिका निभा रहा है। फिर, जब यह भेदिया पकड़ में आया और उसे रोका-टोका गया तो वह तम-तमा उठा और आन्दोलन पर ‘मुसलमान-विरोध’ के गम्भीर आरोप का झण्डा लहराते हुए बैठक से निकल गया। इतना ही नहीं, वह बाहर उपस्थित मीडिया में मन-मानी बयान-बाजी पर भी उतर आया।

शमून काज़मी ने क्रोध में तिल-मिलाते हुए कुछ गम्भीर ‘रहस्योद्‍घाटन’ किये और इस तरह अन्ना की टीम में पड़ी फूट की खबरों से लगा कर टीम के सदस्यों के नैतिक स्खलन के गम्भीर आरोपों तक की बातें मीडिया की हैड-लाइन में छा गयीं। विशेष रूप से, इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में। एक परिवार के रूप में बैठ कर बन्द कमरे के भीतर होते विचार-विमर्श, या वाद-विवाद ही सही, के चोरी-छिपे सेंध-मार प्रसार की नैतिकता से जुड़े सरोकार को दबा कर अन्ना के साथियों पर इस प्रश्‍न की तोप दागी जाने लगी कि पार-दर्शिता की माँग करने वाला यह समूह बात-चीत की सचाइयों को छिपाना क्यों चाहता है? इस छोटे से तथ्य की खुली अन-देखी कर दी गयी कि जो बात हो रही थी उसके मूल में ‘उपस्थित हुई परिस्थितियों का मूल्यांकन’ और उसके अनुसार ‘क्या करना है अथवा क्या नहीं करना चाहिए’ जैसे निष्‍कर्षों पर पहुँचना था। इसे आन्दोलन की रण-नीति बनाना भी कहा जाता है। स्पष्‍ट है, रण-नीति के लिए होने वाले विमर्श को केवल भागी-दारों के बीच ही सीमित रखने को ‘पार-दर्शिता को सूली पर लटका देना’ तो कतई नहीं कहा जा सकता है।

दूसरी घटना, न्यायालयीन आदेश के बाद भी, एक वीडियो क्लिप के सामाजिक-मीडिया के विभिन्न ठिकानों पर जारी करने, उसे ठप्प कर देने और, नये सिरे से, फिर से जारी कर दिये जाने के घटना-क्रम से जुड़ी है। प्रत्यक्ष-परोक्ष संकेत उछले हैं कि इस कथित सैक्स विडियो सीडी के केन्द्र में जो व्यक्‍ति है वह कोई और नहीं बल्कि कांग्रेस प्रवक्‍ता और पार्टी सांसद अभिषेक मनु सिंघवी स्वयं हैं। सब कुछ इतने खुले रूप और निडरता से किया गया प्रचारित हुआ है कि स्वयं सिंधवी भी इसके प्रत्येक पक्ष से भिज्ञ हुए समझ में आते हैं। वे कह चुके हैं कि उनकी ऐसी कोई सच्ची सीडी नहीं है। उनका आरोप है कि किसी ने सीडी के साथ छेड़-छाड़ की है। यहाँ लाख टके का प्रश्‍न तो यही है कि छेड़-छाड़ हुई भी हो तो उसकी दिशा क्या थी — क्या सिंघवी की उपस्थिति को उनके जैसे दिखते किसी अन्य व्यक्‍ति के रूप में छल-पूर्वक ठूँसा गया था? या फिर, सिंघवी की उपस्थिति तो सचाई थी लेकिन सीडी में उनके बोल-वचनों के साथ छेड़-छाड़ की गयी थी? छन कर आते गरमा-गरम समाचारों का सार यह है कि ड्राइवर ने विवादित सीडी टीवी चैनलों को सौंप दी थी।

वैसे, इसी से जुड़ी लेकिन कम प्रचारित हुई एक घटना तो यह भी है कि सिंघवी ने अपने एक पुराने ड्राइवर पर बहुत गम्भीर आरोप लगाते हुए एक शिकायत पुलिस से की थी और इसके लिए न्यायालय में प्रकरण भी चला था। किन्तु, प्रकरण की प्रक्रिया में सिंघवी और उनके पुराने ड्राइवर ने गुरुवार को दिल्ली उच्च न्यायालय को सूचित किया कि उन्होंने सौहार्द-पूर्ण तरीके से सीडी विवाद का निपटारा कर लिया है। सिंघवी के वकील ने न्यायालय से कहा कि दोनों पक्षों के बीच न्यायालय के बाहर हुए समझौते को देखते हुए वह पुलिस के समक्ष प्रस्तुत की अपनी शिकायत को वापस ले लेंगे। इस पर न्यायालय ने ड्राइवर के जवाब को भी संज्ञान में लिया और कथित वीडियो के प्रसारण पर रोक लगा दी। कहा तो यह भी गया कि सीडी देने वाले नौकर के शपथ-पत्र और न्यायालय के आदेश के बाद टीवी चैनल भी इस विवादित सीडी को उस व्यक्‍ति को वापस लौटाने पर राजी हो गये जिसने वह उसे दी थी।

कोर-कमेटी की बात-चीत को ‘छिपाने’ के अन्ना-टीम के प्रयत्‍न पर ‘पार-दर्शिता’ से पीछे हटने का हो-हल्ला मचाने वाले एक भी व्यक्‍ति ने सिंघवी से यह प्रश्‍न नहीं किया कि जब कथित नकली सीडी में उनकी उपस्थिति किसी कूट-रचना का ही परिणाम थी तब उसकी अन्तर्वस्तु को लेकर ‘धमकाने’ वाले से समझौता करते हुए उन्होंने इतने गम्भीर आपराधिक कृत्य का ‘सौहार्द-पूर्ण’ निपटारा आखिर क्यों किया? जाहिर है, सीडी में ऐसा कुछ अवश्य था जिस पर यथा-शीघ्र प्राथमिकता से पर्दा डालना सिंघवी की विवशता हो गयी थी। यही वह बिन्दु है जो शिगूफ़े-बाजों को इण्टर-नेट का पेट भरने का अवसर दे रहा है। और, जब तक विशुद्ध वैज्ञानिक जाँच-पड़ताल के दावों के सहारे, स्वयं सिंघवी द्वारा आगे बढ़ कर, अन्यथा स्थापित न कर दिया जाए; सोशल मीडिया असली-नकली सीडी-क्लिप्स और उनकी ऐसी अन्तर्वस्तुओं से गूँजता रहेगा जो उत्सुक व्यक्‍तियों को बतलाती अथवा बरगलाती हैं कि कांग्रेस प्रवक्‍ता और पार्टी सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने न्यायालय में न्यायाधीश की नियुक्‍ति का लालच देकर किसी अधिवक्‍ता का दैहिक शोषण किया था। शायद, न्यायालय परिसर के चैम्बर में।

इस स्थिति में सिंघवी ने, औचक रूप से, संसद्‌ की कानूनी मामलों की स्थाई समिति का अध्यक्ष पद छोड़ दिया। यही नहीं वह पार्टी-प्रवक्‍ता के पद से भी, लगे हाथों, हट गये। वैसे, सिंघवी ने स्वयं को पार्टी का अनुशासित कार्य-कर्त्ता बतलाते हुए सफाई दी है कि पार्टी को रत्ती भर भी असुविधा नहीं होने पाये और उनको निशाने पर लेकर उठाये गये एक झूठे विवाद के कारण संसद्‌ के संचालन में कोई अवरोध न आये केवल इसलिए ही उन्होंने अपने दोनों पद त्यागे हैं! सिंघवी को यह कह कर घिघयाते हुए भी सुना गया है कि, वैसे तो वह सीडी झूठी है लेकिन ‘यदि वह सच भी हो’ तब भी उनके वैयक्‍तिक जीवन में इस तरह की खुली ताक-झाँक का नैतिक अधिकार किसी को भी नहीं है! व्यावसायिक प्रतिष्‍ठा की इतनी ऊँचाई पर आसीन एक वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता की ऐसी दया-याचना बतलाती है कि दाल एक-दम स्वच्छ-निर्मल तो नहीं ही है — उसमें कालिख का कुछ न कुछ अंश तो अवश्य है।

एक ओर कहा जा रहा है कि जिस व्यक्‍ति ने कथित आपत्ति-जनक सीडी इण्टर-नेट पर डाली थी उसने यह धमकी भी दी थी कि यदि सिंघवी से यह दोनों पद तत्‍काल ही छीने नहीं गये तो वह और भी व्यक्‍तियों के ऐसे-ऐसे क्लिप्स इण्टर-नेट के हवाले कर देगा कि राज-नीति हिल जायेगी। दबी जुबान, चिदम्बरम तक का नाम उछाल दिया गया है। वहीं दूसरी ओर, सिंघवी और उनके साथ खड़े दिखने वालों का दावा है कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि नैतिकता के दृष्‍टि-कोण से उन्हें यही करना भी चाहिए था! गोया, पार्टी-प्रवक्‍ता के पद से उन्हें धकियाया नहीं गया है! कांग्रेसियों की पूरी मुखर जमात, जिसे इस प्रकरण पर अपना मुँह खोलने की अनुमति मिली है, इसी अति भोले-पन के छोर को आगे तानते हुए देश से आग्रह कर रही है कि उसमें निहित सारे झूठ और कपट के बाद भी क्योंकि सीडी-विवाद के सामने आते ही, केवल नैतिकता के तकाजे के लिए, सिंघवी अपने दो-दो अति विशिष्‍ट पदों से स्वयं बाहर हो गये हैं; अब इससे जुड़े एक भी तार को आगे नहीं छेड़ा जाये क्योंकि ‘निजत्व के सम्मान की रक्षा के वृहत्तर सामाजिक दायित्‍व के निर्वाह के लिए’ ऐसा करना आवश्यक है।

बीते गिनती के दोनों की समीक्षा करें तो समझा जा सकता है कि कोर-कमेटी के विवाद पर अन्ना से तो सवाल किये जा रहे थे जबकि, समान परिस्थितियों में, सिंघवी को सलाम ठोंका जा रहा था। कमर दोहरी करते हुए। यही वह विरोधाभास है जो बतलाता है कि ‘पार-दर्शिता’ के प्रश्‍न पर मीडिया में दो परस्पर विपरीत धाराएँ बहाई गयीं। घटनाओं को, पूरी ढिठाई से, दो तराजुओं पर तौला गया। निजता के सवाल को मुँह देख कर परखा गया। और, न तो यह पहली घटना है और ना ही पहला दायरा। देश के स्वयं-भू महा-प्रभु ऐसे स्वयं-पोषित विशेषाधिकारों का दावा न जाने कब से करते आ रहे हैं। विधायिकाओं के प्रांगण में विराज कर, न्याय-पालिका की दहलीजों में सुशोभित होकर। और तो और, कार्य-पालिका के शीर्ष पर अथवा राज-भवनों में विराज कर भी।

इसमें दो मत नहीं कि निजत्व का अपना अस्तित्व है। और, यह बहुत अहम्‌ भी है। इसे नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन, कदम से कदम मिला कर चलने वाली सचाई यह भी है कि सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्‍ठा को अर्जित करने के लिए अपने वैयक्‍तिक जीवन के तथ्यों के पोस्टर तानने वाले निजत्व का यह विशेषाधिकार सदा-सर्वदा के लिए खो देते हैं। जैसे, रक्षा मन्त्रालय से जुड़े विवादों पर अपनी सफाई देते हुए जब एण्टोनी ने अपने जीवन की वैयक्‍तिक शुचिता का दावा लहराया था तब, लगे हाथों, उन्होंने यह कहने के अधिकार का भी तर्पण भी कर दिया था कि उनके वैयक्‍तिक जीवन के पक्षों के सार्वजनिकी-करण से बचा जाए।

जहाँ तक सिंघवी-विवाद की बात है तो यह तथ्य है कि उन्होंने जो कुछ भी किया उसको कर पाने की ताकत उन्होंने अपनी सार्वजनिक हैसियत से ही बटोरी थी। या कहें कि, अपनी सार्वजनिक हैसियत के सच्चे-झूठे दावों के प्रलोभन से ही वह सौदे का बयाना वसूल पाये थे। किन्तु, एक दूसरा तथ्य इससे भी गहरा है जिसकी पूरी तरह से अन-देखी केवल इसलिए हो रही है क्योंकि इसको लेकर बनने वाली सुर्खियाँ उतनी उत्तेजक, और इसलिए, लघु-जीवी होंगी। क्योंकि, राज-नीति और मीडिया को इससे वह तात्‍कालिक उपलब्धियाँ नहीं होंगी जो एक नामी-गिरामी व्यक्‍ति को सैक्स-स्कैण्डल में लिप्‍त हुआ दिखला कर गढ़ी जा सकने वाली सुर्खियों से हो हो सकती है। यह तथ्य, यथार्थत:, एक दृष्‍टि है जो दिखाये जा रहे समाचारों, और लगाये जा रहे आरोपों से कहीं बहुत आगे जा कर दिखलाती है कि उस तथा-कथित घृणित सौदे-बाजी में अपने कथित ग्राहक को सिंघवी ने जो ‘ऑफ़र’ किया था वह केवल उन तक ही सीमित नहीं था। उसका एक तार्किक-व्यवहारिक विस्तार भी है। जज की नियुक्‍ति एक ऐसी श्रृंखला-बद्ध प्रक्रिया है जिसके एकाधिक तन्तु होते हैं। और, इसका सरल सा अर्थ यही है कि इस ‘ऑफ़र’ के निर्वाह के लिए अनेक स्तरों पर समझौते किये जायेंगे। स्पष्‍ट है, सिंघवी द्वारा दिया गया कथित प्रलोभन अनेक धरातलों पर सार्वजनिक है। कम से कम, व्यक्‍ति-विशेष का सर्वथा वैयक्‍तिक तो बिल्कुल नहीं। और, सम्भवत: यही सबसे बड़ा कारण है कि पूरे विवाद की कालिख को यथा-सम्भव योग्यता से, और यथा-सम्भव शीघ्रता से भी, ढाँका-मूँदा जा रहा है। बस, एक ही पेंच है — बशर्ते, उन पर उछाला गया कीचड़ कोरी कल्पना की देन न हो। लेकिन, यह कोई ऐसी अ-साध्य कल नहीं है जिसे कभी खोला नहीं जा सकता हो। एक सक्षम और पक्ष-निरपेक्ष जाँच से इस पेंच को आसानी से खोला जा सकता है। हाँ, सिंघवी का ईमान-दार सहयोग इसकी प्राथमिक उप-शर्त अवश्य है।

जाहिर है, उठ रहे धुँए में यदि अंशत: भी सचाई है तो निजत्व की आड़ में दाबे जाने के बाद भी इसके अंगारों से सिंघवी के साथ-साथ कांग्रेस का भी मुँह इतना झुलस जायेगा कि अच्छी से अच्छी राज-नैतिक प्लास्टिक सर्जरी भी उसके नुकसानों से उबार नहीं पायेगी। बात दूर, बहुत दूर, तक जायेगी।

(२७ अप्रैल २०१२)

3 comments

    • TULSI TAWARI on April 29, 2012 at 8:27 am

    It is heartening to see precise surgical incision, on the issues raised by the author. Indeed, those who wish to play role in public services should be prepared for deeper scrutiny to their private actions, at least to the extent where common interests could seem to be in danger. Truth is not just restricted to visible actions, rather intent and motives. However, in the era of blatant abuse of privileges of power, every minute, by the people at the helm of affairs, little else can be expected other than cover-ups. However, no one is immune for all the times, as ‘the internet-era’ with its inherent nature to expose all that could be hidden, is here to stay. For integrity-driven public life to become a reality, constant analyses of individuals active in public-service is indeed a great necessity, as an ongoing activity. GREAT MANY JOURNALISTS WITH CONSCIENCE ARE REQUIRED! Congratulations for such an edeavour.

  1. महोदय ,
    सर्वप्रथम इस सार्थक लेख के लिए आपको सादर बधाई ,

    आपके दोनों बिन्दुओं पर कुछ प्रकाश डालना चाहूँगा ,, अन्ना गैंग में शामिल शमून काज़मी को मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ , व्यक्तिगत कई बार मिल चूका हूँ ,, यह महोदय कई बार हमसे पीटने से बच गए क्योकि इनकी हरकते ही ऐसी है की सहन नहीं होता ,, आज भी बाबा रामदेव जी के पीछे पीछे इनको चलता हुआ देखा जा सकता है और अन्ना से भी ये काज़मी बराबर संपर्क में है ,, उस दिन जो आडियो प्रकरण हुआ कुछ हिलाने वाला था , मुम्बई में १ करोड़ २७ लाख रुपया इक्कठा हुआ था , अनशन ज्यादा दिन चला नहीं इसलिए खर्च कुछ हुआ नहीं जब इस सम्बन्ध में हिसाब माँगा गया तो ये लोग आपस में उलझ पड़े , सब जानते है अन्ना ज्यादा पढ़े लिखे नहीं है और ना ही ज्यादा समझ रखते है यदि किरण बेदी और केजरीवाल ना हो तो अन्ना अपनी कुर्सी से हिलने की स्तिथि में भी नहीं होते | खैर पैसों का मामला था पारदर्शिता होनी चाहिए थी मगर नहीं हुयी , सबसे पहले केजरीवाल और कुमार विश्वास आपस में उलझे पैसो को लेकर ,, विदित रहे की आज भी इंडियन अगेंस्ट करप्शन का बैंक खाता नहीं है .. जिससे क्या आया क्या गया सार्वजनिक हो पाए सारा पैसा समिति की निगरानी में केजरीवाल के पास रहता है , मुलाना काज़मी ने भी इसका विरोध किया और विरोध सहा , जब बात नहीं बनी तो उसने इनकी रिकोर्डिंग करना शुरू कर दी जिससे इनकी असलियत सामने आ सके ,, नहीं तो ऐसी कौन सी बाते वहां होती है जो इतनी गंभीर है की उनको लीक करने पर हाहाकार मच जाता ?? दूसरा जब बाबा रामदेव जी को समर्थन देने का मुद्दा आया तो भी खीच तान हुयी ,, खीचतान की वजह फोर्ड फ़ौंडेशन का दबाब था फोर्ड वो संस्था जो इस गैंग में शामिल सभी एनजीओ चलने वालो को पैसा देती है और बाबा रामदेव विदेशी कम्पनियों के विरोधी है तो फोर्ड का दबाब था की बाबा रामदेव के साथ अन्ना गैंग ना जाए और इस बात का भी विरोध काज़मी ने किया जिसके बाद बात बड़ी और उसकी तलाशी ली गयी जिसमे उसके फोन को रिकोर्डिंग मोड़ पर पाया गया बाद में जो ड्रामा हुआ वो सब जानते ही है ||

  2. दुसरे बिंदु पर आता हूँ बात निजता की तो जब आप किसी सवैधानिक पद पर होते है और उसका रौब दिखा कर किसी को प्रलोभन दे कर उसकी तरक्की करने की बात पर उसका शोषण करते है तो वह निजता नहीं रह जाती , सिंघवी ने उस महिला वकील को जज बनाने का प्रलोभन दिया था जिसके बाद उसका शोषण किया ,, इसी क्रम में जब सिंघवी के ड्राइवर ने उसकी अश्लील हरकतों की सीडी बना ले और उसको ब्लैकमेल करने लगा , और सिंघवी से सही रकम ना मिलने की स्तिथि में उस सीडी को सार्वजनिक कर दिया , और सिंघवी ने उस सीडी के प्रसारण पर रोक लगाने के लिए कोर्ट का रूख किया तभी स्पष्ट हो गया था की यह सिर्फ मिडिया और लोगो के मुह पर ताला लगाने की प्रक्रिया है इसके अलावा और कुछ नहीं ? बाद में सिंघवी का ड्राइवर के साथ समझोता भी हो गया जिसे गुप्त रखा गया ,, अगर सिंघवी के अनुसार सीडी नकली थी तो ड्राइवर से समझोता क्यों किया ? अगर सीडी नकली थी तो इतना डर क्यों था उसकी वैज्ञानिक जांच क्यों नहीं करवाई ? आज सिंघवी का ड्राइवर कहाँ है कोई नहीं जानता ? भाजपा ने प्रश्नकाल में इस बात को उठाया था की सिंघवी के ड्राइवर का क्या हुआ उसको सामने क्यों नहीं लाया जा रहा ? मगर किसी को कोई जबाब तब तक नहीं मिलेगा जब तक कांग्रेस सरकार नहीं चाहेगी ||

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