वैदिक दर्शन में मिलेगी होमिअपैथी की समझ

Ateet Ka Jharokha

होमिअपैथी औषधियाँ, पदार्थ के भौतिक-रासायनिक गुणों से परे, उसके उन जैविक गुणों का उपयोग करती हैं जिनकी अब कल्पना तो की जाने लगी है लेकिन, समुचित कसौटियों के अभाव में, जो अभी तक परखे नहीं जा सके हैं।

‘रोग-मुक्‍ति’ एक बड़ी ही सापेक्ष स्थिति है। इसी कारण यह हमेशा ही विवादों से घिरी रही है। हालाँकि जो रोग-मुक्‍त (?) करता है उसे, सर्वदा, होमिअपैथी के रूप में ही नहीं परोसा जा सकता। होमिअपैथी औषधि-निर्धारण की एक-मात्र शर्त है कि वह सम्बद्ध मामले के सभी होमिअपैथीय संघटकों का, समस्त विवादों और अपवादों से परे, हर हालत में पालन करे।

होमिअपैथी का विज्ञान अखिल ब्रह्माण्ड में मौजूद प्रत्येक पदार्थ में औषधीय सम्‍भावनाएँ देखता है। किन्तु, साथ ही साथ, वह ऐसे किसी भी भौतिक या रासायनिक मिश्रण को ‘औषधि’ मानने से साफ तौर पर मना करता है जो विशुद्ध होमिअपैथीय मानदण्ड पर ‘सिद्ध’ न किया गया हो। भले ही वह तथाकथित रूप से कोई मूल अर्क हो या उच्चतम्‌ स्तर पर शक्‍ति-कृत कही जा रही कोई औषधि।

आज बाजार पेटेण्टेड होमिअपैथी औषधियों के नाम पर ‘हर कुछ’ से पाटे जा रहे हैं। ऐसे में उत्पादकों द्वारा उनके साथ ही उपलब्ध कराये जाने वाले उत्पादन-विषयक विवरण काफी रोचक और उपयोगी होते हैं। सचेत निगाह से देखने पर उनमें ऐसी जानकारियाँ भी मिल जाती हैं जो उपभोक्‍ता को ऐसे उत्पादों के (बिना सोचे-समझे) उपयोग के जोखिमों की गम्‍भीर अ-लिखित चेतावनियाँ देती हैं।

उदाहरण के लिए, जर्मनी की डॉ० रैकवैग एण्ड कम्पनी ने अतीत में, कुछ नये ‘आर नम्‍बर’ भारतीय दवा-बाजार में उतारे थे। इनमें से एक (आर-८९) के बारे में दावा किया गया कि इसके सेवन से गञ्‍जापन दूर किया जा सकता है। लेकिन, इस उत्पाद्‌ के बारे में कम्पनी ने जो साहित्य उपलब्ध कराया उससे यह संकेत भी मिलते हैं कि आर-८९ के सेवन में नपुंसकता मोल लेने का जोखिम अन्‍तर्निहित है। तो क्या इस बारे में उपभोक्‍ता को सावधान नहीं रहना चाहिए?

दूसरी ओर, सम्‍भवत: भ्रम फैलाने के लिए ही, आजकल यह एक सुझाव चाहे जब उछाल दिया जाता है कि होमिअपैथी को वैकल्पिक चिकित्सा-व्यवस्था की तरह, या कि ऐलोपैथी की मदद-गार की तरह, उपयोग में लिया जाना बेहतर रहेगा। यहाँ यह एक बड़ी साफ बात भी, उतने ही साफ तरीके से, समझ लेना बहुत आवश्यक है कि पारम्‍परिक चिकित्सा-विधान के गम्भीर दोषों से हैनिमेन के आधार-भूत मत-भेदों के उभरने से ही होमिअपैथी के दर्शन की विधि-वत् नींव पड़ी थी। तब, आज ऐलोपैथीय बाजार द्वारा, चतुराई से भरा, यह परोक्ष सुझाव उछालना कि होमिअपैथी इस ‘पारम्‍परिक’ चिकित्सा-विधा की सह-योगी हो सकती है, (पूरी तरह) हारी हुई बाजी को जीतने का एक नया प्रयास ही कहा जायेगा।

यद्यपि, यह मानने के भी पर्याप्‍त कारण हैं कि हैनिमेन की ‘आर्गेनॉन’ में दर्शन की कई कड़ियाँ छूटी हुई हैं। और, इस कारण, परिणाम की दृष्‍टि से व्यवहारत: मिलने वाली आशातीत सफलताओं को, इसके लिखित दर्शन के माध्यम से, समझा पाना कई बार सम्‍भव नहीं होता। यह भी कि, होमिअपैथी के दर्शन के इस एक-मात्र ‘धर्म-ग्रन्थ’ में कुछ गम्भीर सैद्धान्तिक त्रुटियाँ भी हैं। यह दोनों ही स्थितियाँ होमिअपैथी के लिए दु:खद भी हैं और नुकसानदेह भी।

इस स्थिति से उबरने का एक-मात्र रास्ता यही है कि हैनिमेन के प्रति पूर्ण सम्मान रखते हुए भी, उनके दर्शन के दोषों को न केवल रेखांकित किया जाए, उन्हें दूर भी किया जाए। और, क्योंकि ऐसे प्रयासों में सफलता आसान नहीं होती है इसलिए उनसे अ-सहमति रखने पर अपनी उन अ-सहमतियों के बारे में, पूरे खुले मन से, अपने दृष्‍टि-कोण से प्रयास-कर्त्ता को अवगत्‌ कराया जाना चाहिए। यही विज्ञान का आधार-भूत तत्व है।

होमिअपैथी, ‘पदार्थों’ को ‘औषधि’ में रूपान्तरित करने के लिए कुछ सीमित माध्यमों को प्रयोग में लाती है। तकनीकी शब्दावलि में इन्हें ‘बायो-प्रोन मीडिया’ कहा जा सकता है। इन माध्यमों की विशेषता यह है कि ये माध्यम औषधीय पदार्थ की सतही भौतिक-रासायनिक पहचानों के अलावा उसकी समस्त गूढ़ जैविक पहचानों को भी आत्म-सात् करते हैं। भौतिक-रासायनिक पहचानों के, किसी भी माध्यम में, अपना अस्तित्व दिखाते रखने की एक भौतिक सीमा है जिसका निर्धारण एवोगैड्रो नामक विज्ञानी ने बहुत पहले ही कर दिया था। ‘भौतिक अस्तित्व’ के ज्ञान के आधार पर यह ‘एवोगैड्रो-सिद्धान्त’ अभी तक केवल इसीलिए किसी भी वैज्ञानिक चुनौती से परे बना हुआ था क्योंकि उसके सम-कक्ष ‘जैविक अस्तित्‍व’ का ऐसा कोई सिद्धान्त अभी तक सामने नहीं आया था। किन्तु, विगत समय में मेरे द्वारा विकास-वाद की अव-धारणा के आधार पर प्रस्तुत की गयी प्राथमिक परि-कल्पना से इस दिशा में एक बिल्कुल नया सोच सामने आया है।

यह होमिअपैथी का बड़ा महत्व-पूर्ण पक्ष है। जो स्पष्‍ट सन्‍देश देता है कि इसकी औषधियाँ, पदार्थ के भौतिक-रासायनिक गुणों से परे, उसके उन जैविक गुणों का उपयोग करती हैं जिनकी अब कल्पना तो की जाने लगी है लेकिन जो, समुचित कसौटियों के अभाव में, अभी तक परखे नहीं जा सके हैं।

जाहिर है, ‘विज्ञान’ की कसौटी पर होमिअपैथी को कसने के लिए स्वयं विज्ञान को ही पहले ऐसी कसौटी बनानी पड़ेगी जो होमिअपैथीय औषधियों के बायो-प्रोन मीडिया से बनने वाले सम्‍बन्धों को नाप और परख सके। इस दिशा में भारतीय वैदिक दर्शन का, आधुनिक ‘विज्ञान’ की चकाचौंध में भुला दिया गया, गूढ़ विज्ञान बड़ा सहयोगी हो सकता है। जैसे, इसकी तान्त्रिक शाखा का ‘सूर्य विज्ञान’ मानता है कि इस भौतिक जगत्‌ की प्रत्येक वस्तु ‘सर्वात्मक’ है। अर्थात्, जगत् की प्रत्येक (चराचर) वस्तु में अन्य सभी (चराचर) वस्तुओं की सत्ता का कुछ न कुछ अंश रहता ही है। वस्तु का चरित्र और स्व-रूप जहाँ इस तथ्य पर निर्भर है कि सर्व-सत्ताओं के इन अंशों में से उस वस्तु-विशेष में ‘कारक’ सत्ता किसकी है; वहीं इस तथ्य का भी उतना ही महत्व है कि उसमें अन्य सत्ताओं के परस्पर समीकरणों का व्यवहारिक स्व-रूप किस तरह का है?

सरल शब्दों में, होमिअपैथी विकास-वाद के सिद्धान्त पर कार्य करती है। अर्थात्, होमिअपैथीय औषधि के शक्‍ति-करण और शरीर पर होने वाली उसकी क्रिया की समझ में प्रकृति के विकास के रहस्यों की समझ अन्‍तर्निहित है।

(११ मई २००७; www.rediscoverhomoeopathy.com से साभार)