कानून नागरिक के लिए है, नागरिक कानून के लिए नहीं

Ateet Ka Jharokha

एक सहज सवाल है कि नजरें इतनी नीची करके कि वे बन्द सी ही बनी रहें, आखिर कब तक जिया जा सकेगा? सच है कि नागरिक को कानून के प्रति जिम्मेदार बनना पड़ेगा पर कानून की भी अपनी जिम्मेदारियाँ होती हैं कि नहीं?

कल्पना कीजिए, आपके पास आपके किसी मूल अधिकार को पाने का एक वैध आदेश है। आदेश चाहे किसी भी शासकीय विभाग का हो और चाहे जिस स्तर के उच्चाधिकारी द्वारा जारी किया गया हो; उसे उसके पालन के लिए, उचित और आवश्यक कार्यवाही के लिए, प्रशासक के पास भेजा भी गया हो; आपकी अपेक्षा क्या होगी? आपका विश्‍वास क्या होगा?

यदि नागरिक-प्रशासन इन आदेशों का पालन करवाने में, बिना कोई वैध कानूनी आधार समझाये, अपनी असहायता बताये और यह आपको उसकी असहायता कम तथा अरुचि अधिक नजर आती हो; तब आपके पास क्या बच रहता है? आपके मन में एक यह बात भी उठ सकती है कि क्या प्रजा-तन्त्र में नागरिकता के दो दर्जे हो गये हैं? तब आप, जो इस जन-तन्त्र में ‘जन’ होने के नाते ‘तन्त्र’ के आर्थिक-मानसिक नियंत्रणों का इतना भारी बोझ ढो रहे हैं; अपने ‘जन’ होने के दावे का कितना प्रति-फल पा सकते हैं? यह प्रति-फल अपनी किसी वैध-अवैध ‘हैसियत’ से नहीं, मात्र नागरिक की तरह पाने की अपेक्षा करने वाले आज बुरी तरह निराश हो रहे हैं।

बहस का मुद्दा मध्य प्रदेश के एक शहर सतना में महिला व्याख्याताओं के आमरण अनशन से उठा। लगभग दो सालों से एक निजी शिक्षण संस्था की ये व्याख्याताएँ संस्था की ढेर सारी अनियमितताओं के खिलाफ शासन के विभिन्न विभागों से लगातार कुछ न कुछ आदेश प्राप्‍त करती रहीं। परन्तु हर उस अधिकारी ने, जिसके जिम्मे इन आदेशों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी आती रही; इस या उस कारण से, इन आदेशों को प्रभावी करने में टाल-मटोल की। आखिरी शस्‍त्र के रूप में तीन व्याख्याताएँ आमरण अनशन कर बैठीं। अनशन के तीसरे दिन भारी नागरिक दबाव के बीच जिले के एक वरिष्‍ठ अधिकारी ने लोगों से कहा कि वे सम्बन्धित संस्था के प्रमुख से आदेशों का पालन करवाने में असमर्थ रहे हैं; लोग वकीलों से राय लेकर बतलायें कि ऐसी हालत में वे (अधिकारी महोदय, और प्रकारान्तर से जिला प्रशासन) क्या कर सकते हैं? अधिकारी महोदय ने तब यह भी स्वीकार किया कि आदेश वैध हैं और उनका पालन नहीं करते हुए संस्था-प्रमुख गलती कर रहे हैं।

बहस यह नहीं है कि एक निजी व्यापारिक किस्म की शिक्षण संस्था के इस विवाद में कौन गलत है और कौन सही? बहस यह है कि सामाजिक-प्रजातान्त्रिक संरचना के सिद्धान्तों को स्वीकार करते हुए, ऊँचे पदों और खर्चों पर, हमें स्वस्थ और मान्य सामाजिक नियन्त्रण में रखने के उद्देश्य से स्वयं हमने ही जिन्हें बड़े-बड़े अधिकारों का दण्ड देकर बैठाया है; यदि वे नागरिक-प्रशासक अपने अनिवार्य कर्त्तव्यों और दायित्वों से हाथ खींच लेते हैं तब नागरिक के पास क्या कुछ नागरिकजैसा बच भी रहता है या नहीं?

नागरिक प्रशासन के इस व्यवहार के पीछे कारण चाहे जो कुछ भी हो — वह प्रत्यक्ष कारणों से अपने आपको राजनैतिक संस्थाओं या व्यक्‍तियों का नौकर समझने की भूल में हो या अधिकारों को एक बार पाकर उनके हाथों से नहीं छीने जाने के अतिविश्‍वास में, पूर्वाग्रह से या कि दुर्भावना से, उनका लाभ किन्हीं विशेष लोगों को देने की आदत पाल चुका हो; ‘कानून और व्यवस्था’ जैसे कठिन मुहावरों की आड़ में गैर-राजनैतिक प्रशासन नागरिकों के प्रति अपनी जवाब-देही से निरन्तर मुकरता जा रहा है। यह स्थिति न प्रजा-तन्त्र के लिए स्वस्थ संकेत है और न प्रजा के लिए ही।

लगभग इसी दायरे में ‘नागरिक कानून के लिए है या कानून नागरिक के लिए’ विषय पर एक गोष्‍ठी में तात्कालिक प्रसंग से हटकर जो बात-चीत हुई उसमें औसत हर नागरिक के जीवन में कभी न कभी उठने वाले कई महत्व के प्रश्‍नों को गम्भीरता से टटोलने का प्रयास किया गया।

‘सिविक सैंस की आवश्यकता है’ और ‘हमारा सिविक सैंस आखिर कब जागेगा’ जैसी चर्चाओं के बीच एक सहज सवाल यह भी था कि नजरें इतनी नीची करके कि वे बन्द सी ही बनी रहें, आखिर कब तक जिया जा सकेगा? सच है कि नागरिक को कानून के प्रति जिम्मेदार बनना पड़ेगा पर कानून की भी अपनी जिम्मेदारियाँ होती हैं कि नहीं?

आज कानून, व्यवस्था या कि स्वयं प्रशासन की विश्‍वसनीयता कितनी बची रह गयी है कि नागरिक अपने कई ऐसे मामलों को, जो प्रशासनिक और न्यायिक आधारों पर ही सुलझाये जाने चाहिए, अपने-अपने स्तर पर दूसरे कई तरह के तत्वों और हथ-कण्डों से निबटाने को ही सुविधा-जनक और अधिक प्रभाव-कारी मानने लगे हैं। इसमें आपसी समझ या सामाजिक सह-भागिता के ऊँचे सामाजिक आदर्शों की कल्पना करना हमारी भूल ही होगी। स्पष्‍ट ही यह स्थिति एक अराजक समाज की फैल रही जड़ों की ओर ही संकेत करती है। आम धारणा ही बन गयी है कि छोटे से छोटे मामले में भी हालात बद-तर होते जा रहे हैं; लोगों को काफी धक्के खाने पड़ते हैं।

इसमें सन्देह नहीं कि भारतीय संरचना में न्याय पाने के लिए सीढ़ी-दर-सीढ़ी दरवाजे खट-खटाये जा सकते हैं; खट-खटाये भी जाते हैं। पर क्या केवल इस आधार पर कि अगला दरवाजा खट-खटाने का प्रावधान है, पहला या कि निचला दरवाजा भड़ाक से बन्द किया जा सकता है? सचमुच, पीड़ित ही ‘रेमेडी’ का उपयोग करने को बाध्य रहे और पीड़ा देने वाला आराम से बैठा रहे — यह स्थिति चिन्ता देने वाली है। इसमें भी शक नहीं कि पर्याप्‍त आधार पास में हो और अगला दरवाजा खट-खटाने लायक साधन भी हों तो पीड़ा देने वाला ऐसा व्यक्‍ति, औसतन, अधिक दिनों तक मौज में रह नहीं सकता। परन्तु, अन्यथा सामान्य स्थितियों में भी उन जिम्मेदार ओहदे-धारियों के प्रति क्या सोच हो जिन्होंने सुनवाई के अपने दायित्वों को ईमान-दारी से निभाये बिना अपने दरवाजे बे-रहमी से बन्द कर दिये थे?

ऐसी स्थितियों में नागरिकों को क्या अधिकार मिले हैं? वही अपीलीय! दादा दर्माधिकारी के शब्दों में इस स्थिति के प्रति अ-सन्‍तोष जाहिर करना हो तो कहना पड़ेगा कि, “यह अति राज्य-निर्भरता जब तक रहेगी, तब तक हमारा उद्धार विधाता भी नहीं कर सकता।”

स्वायत्त किस्म की संस्थाओं की अनियमितताओं को दूर करने के लिए अधिकतर आन्दोलनों का ही सहारा लेना पड़ता है और इसकी परिणति होती है किसी जिम्मे-दार ओहदे-दार की मध्यस्थता में। आम तौर पर यही ओहदे-दार अपने प्रदत्त अधिकारों का वैध उपयोग कर इन आन्दोलनों के प्रारम्भ से भी पहले समस्या हल कर सकते हैं। परन्तु, तब उनके लिए किसी न किसी को दण्ड-विधान के दायरे में लेना जरूरी हो जाता है। और, कई प्रत्यक्ष कारणों से वे इसे टालना ही पसन्‍द करते हैं। इसमें दो राय नहीं कि उनका यह रवैया उन्हें सौंपे गये संवैधानिक दायित्व के प्रति ऐसे गम्भीर लोक-तान्त्रिक अपराध का परिचायक है जिसके लिए इन्हें दण्डित किया ही जाना चाहिए। किन्तु इसके उलट, आशंकाओं-कुशंकाओं के लम्बे दौर के बाद, जब इनकी ही मध्यस्थता से राहत की हल्की सी स्थिति बनती है तब उसके लिए इन्हें शतश: प्रशंसा मिलती है। और, अपनी प्रशंसा में वे स्वयं भी कहते हैं कि केवल ‘जन-हित’ में ही उन्होंने ‘अनुचित दबाव’ डालकर स्थिति को ‘जैसे-तैसे’ निबटाया है।

यदि सच में ही अनुचित होता हो तब दबाव का यह तरीका प्रशंसनीय हो जाता है; यह दुर्भाग्य की बात नहीं तो और क्या है?

इस तरीके को मिलने वाली नागरिक-स्वीकृति स्वयं नागरिकता के लिए बेहद खतरनाक है। इस स्थिति को अधिक फैलने से रोका जाना चाहिए तथा कानून और व्यवस्था के नाम पर अधिकारों का डण्डा घुमाने वालों को यह बात धीरज से समझना चाहिए कि उनका यह नकारात्मक रवैया, सच में तो, स्वयं कानून और व्यवस्था की छीछालेदर करने वाला ही है।

अधिकारी वर्ग आज यह जताने में कोई हिचक नहीं रखता कि वह जो सोचता है, वही ठीक है। वही कानून भी है। उसकी खुली मान्यता है कि नागरिकों को इससे अ-सहमति हो तो वे कानून का दरवाजा खट-खटाने के लिये स्वतन्त्र हैं। ऐसी हालत में नागरिकों के लिए एक ही रास्ता बच रहता है कि वे गांधी के सिद्धान्तों पर चलकर, एक बार फिर, अधिकारियों के इन अवैध कानूनी आचरणों को मान्यता देने से ही इन्कार कर दें। यानि, इन अ-नियमितताओं के खिलाफ कानून के दरवाजों को नहीं बल्कि समाज के दिलों को खट-खटायें।

क्योंकि हालात यह हो गये हैं कि अब नागरिक की जागरूकता ही निर्णायक होगी इसलिए एक और रास्ता भी आजमाया जा सकता है — नागरिक अधिकारों के लिए ऐसी वजन-दार समितियों का गठन हो जो विभिन्न नागरिक समस्याओं के प्रति सजग तो हों ही सक्रिय भी हों। ऐसी नागरिक-समितियाँ या जन-अदालतें कानून का पालन करवाने में असमर्थ रहने वाले अधिकारियों को स्वयं आगे आकर कानून के घेरे में लें कि क्यों नहीं वे कानून का पालन करवाते?

सचमुच, जिस पर निर्णय दो टूक हो, वही आज विचारणीय बन गया है; यह स्थिति स्वयं में विचारणीय है। आज नागरिक कानून के लिए रह गया है जबकि मान्य सिद्धान्त यही है कि कानून नागरिक के लिए बनाये गये हैं।

मशीन के कलपुर्जों की तरह, बेशक, नागरिक प्रजा-तन्त्र के कल-पुर्जे हैं। परन्तु, एक फ़र्क भी है — मशीन और उसके कल-पुर्जे बे-जुबां हैं क्योंकि वे बे-जान हैं। जबकि, नागरिक और प्रजा-तन्त्र दोनों ही जिन्दा चीजें हैं और यह फ़र्क एक मुद्दे का फ़र्क है। इसे कायम रखना ही होगा।

– गांधी मार्ग; जून, १९८३ से (सम्पादित)