रतन मोल भाजी, कौड़िन मोल खाजा!

Ateet Ka Jharokha

कौड़ी और रत्‍न को आँकने का प्रजा-तान्त्रिक अन्दाज बड़ा अनोखा है। पिछले सालों में होमिअपैथी की वैधानिक पढ़ाई तब तक पूरी नहीं हुई जब तक एलोपैथी के ‘पैथॉलॉजी’ और ‘प्रेक्टिस ऑफ मेडिसिन’ जैसे लिखित और प्रैक्टिकल उत्तीर्ण न कर लिये गये हों। और अब तो एम०बी०बी०एस० पाठ्य-क्रम में होमिअपैथी के मूल सिद्धान्त शामिल किये जा रहे हैं।

इस नयी सहस्राब्दि की बलिहारी! विज्ञान ने तो जैसे ठान रखी है, नित नयी चौंकाने वाली खबर देने की। आज का ‘विज्ञानी’ रह-रह कर, विज्ञान और तकनीक की समझ की अपनी सफलता के दम्‍भ में आकाश छूने के दावे कर रहा है। परिणाम चाहे जो हों। जैसे स्खलित विश्‍वामित्र एक बार फिर, द्विगुणित जोश से, दर्पित हो रहे हों — ‘जीवन’ प्रयोगशालाओं की हद पार कर घरेलू पैदावार बनने की कगार पर खड़ा है। आत्म-श्‍लाघा के इस चौतरफा फुगावे के बीच लगभग दो सौ सालों से अब तक अ-बूझ ही बने हुए ‘सिमिलिया सिद्धान्त’ के सिद्धान्त-कार डॉ० सैम्युएल हैनिमैन को उनके जन्म-दिवस १० अप्रैल पर शत्-शत् नमन्।

इस शताब्दि की बलिहारी जाने का यह इकलौता कारण नहीं है। खासकर उनके लिए, होमिअपैथी के प्रति जिनकी निष्‍ठा सन्‍देह से परे है। खबर है कि मध्य प्रदेश सरकार ढूँढ़-ढूँढ़ कर ऐसे होमिअपैथी चिकित्सकों की ‘दुकानें’ बन्द करा रही है जो उसकी नजर में ‘झोला-छाप’ हैं। जाहिर है, उसके अनुसार यह चिकित्सक गैर-कानूनी और इस कारण अपराधी काम कर रहे हैं! लेकिन इस एक सचाई को क्या कहिए कि इन्हीं अफसरों की दृष्‍टि में ऐसे ‘चिकित्सा-विशेषज्ञ’ सरकारी पुण्य का काम कर रहे हैं जिनकी शिक्षा-दीक्षा हुई तो एलोपैथी में है लेकिन जो ठस्से से होमिअपैथी की दवाओं के पर्चे लिख रहे हैं; जिनकी लिखी ऐसी दवाएँ नुकसान पहुँचाने की लगभग पूरी गारण्टी रखती हैं क्योंकि उन्हें होमिअपैथी के विज्ञान का ‘क-ख-ग’ भी नहीं आता। उनके शिक्षा-दोष के चलते आयेगा भी या नहीं, इस पर दाँव तक खेला जा सकता है। गौरांग महा-प्रभुओं का दौर नये सिरे से जोर पकड़ता दिख रहा है।

कौड़ी और रत्‍न को आँकने का प्रजा-तान्त्रिक अन्दाज तब तक उजागर नहीं हो सकता जब तक कोई यह तथ्य न जान ले कि पिछले सालों में होमिअपैथी की वैधानिक पढ़ाई तब तक पूरी नहीं हुई जब तक शिक्षार्थी ने एलोपैथी के अधिकृत शिक्षक से ‘पैथॉलॉजी’ और ‘प्रेक्टिस ऑफ मेडिसिन’ जैसे विषयों पर न केवल नियमित कक्षाओं में शिक्षा ले ली हो बल्कि उन्हीं के रहमो-करम पर, इनको लिखित और प्रैक्टिकल दोनों रूप में बाकायदा उत्तीर्ण भी कर लिया हो।

Dr Samuel Hahnemannयह व्यञ्जना नहीं तो और क्या है कि जिस होमिअपैथी के शिक्षार्थी को उसकी पढ़ाई के दौरान मलेरिया के उपचार के लिए होमिअपैथी औषधियों के स्थान पर ‘क्लोरोक्विन’ और टी०बी० के उपचार के लिए ‘ईथेम्बुटाल’ जैसी एलोपैथी औषधियाँ ही सिखायी-पढ़ायी गयी हों, जिसकी चिकित्सकीय योग्यता किसी सरकारी एलोपैथी चिकित्सालय में कम से कम छह माह की इन्टर्नशिप पूरी किये बिना अमान्य ही रहने वाली हो; उसे अब इसी शिक्षण, प्रशिक्षण और मार्ग-दर्शन के बाद मिली व्यवहारिक योग्यता के प्रयोग पर ‘अपराधी’ मान कर धरा-पकड़ा जा रहा है!

स्थिति के जायके के लिए जैसे इतना ही काफी नहीं है। मध्यप्रदेश शासन द्वारा सन् १९९५ से ‘एक ट्रेड के रूप में’ मान्यता के साथ शुरू की गयी ‘जन स्वास्थ्य-रक्षक योजना’ को जाने बिना बात पूरी नहीं होगी। ब-कौल मध्य प्रदेश शासन, इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य के लिये ऐसे प्रशिक्षित व्यक्‍ति प्रत्येक गाँव में उपलब्ध कराना है जो प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करा सकें और छोटी-मोटी बीमारियों का वैज्ञानिकइलाज गाँव में ही कर सकें। ट्रायसेम योजना के अन्‍तर्गत ले-देकर मात्र दसवीं पास और छह महीने ‘छोटी-मोटी’ बीमारियों के इलाज के लिए ट्रेड-प्रशिक्षित, ऐसे स्वास्थ्य-रक्षकों के घोषित कर्त्तव्यों में से एक यह भी है कि वे ‘बुखार’ आने पर ‘मलेरिया’ का इलाज करें! यही नहीं, सरकारी विनोद यह कि अपने ‘झोले’ में जो औषधियाँ इन ‘वैध’ चिकित्सकों को ‘अनिवार्य रूप से’ रखना ही होंगी उनमें जीवन-दायिनी लेकिन जोखिम से भरी ‘डेकाड्रान’ भी है।

किन्तु, प्रदेश सरकार के एक अन्य निर्णय के उल्लेख के बिना सब कुछ फिर भी अधूरा ही छूटेगा। इसके अनुसार, प्रदेश में अब एम०बी०बी०एस० पाठ्य-क्रम में होमिअपैथी के मूल सिद्धान्तों की पढ़ाई भी शामिल की जा रही है। होमिअपैथी तथा एलोपैथी के गहरे विरोधाभास से निहायत अपरिचित उन सभी ‘स्वनाम-धन्य’ विद्वानों से, जो इस निर्णय के लिए जिम्मेदार हैं, दो सीधे-सीधे सवाल हैं — (१) ज्ञान-विस्तार के नाम पर, सैद्धान्तिक रूप से एकदम विपरीत, इन दो दर्शनों को क्लिष्‍ट तकनीकी शिक्षा में (औने-पौने जान-कारों के सहारे) इस तरह शामिल करने से उत्पन्न होने वाले मति-भ्रम की गाज अन्तत: किस पर गिरेगी और उसका खामियाजा कौन भरेगा?; (२) जैसे-तैसे डिग्री हासिल कर लेने के बाद क्या इन एलोपैथी डिग्री-धारियों के साथ वही कहानी फिर नहीं दोहरायी जायेगी जो इनके सम-कक्ष होमिअपैथी चिकित्सकों के साथ उन्हीं हाथों, आज उसी समय घट रही है जब यह नया निर्णय लागू करने की प्रक्रिया चल रही है?

सारी परिस्थितियों पर पक्षपात-निरपेक्ष विचार किये बिना, और सभी मुद्दों पर पूरी पार-दर्शिता रखे बिना; लिया गया कोई भी निर्णय केवल एक ही बात साबित करेगा कि इसके जिम्मे-दार व्यक्‍ति नयी सहस्राब्दि में मुहम्मद बिन तुगलक के जीवन्त मंचन को बेचैन हैं।

शेयरिंग नोट्स; वर्ष ३, अंक २ से (सम्‍पादित)