खुलासे का अपना खुलासा

Sarokar

यूपीए के रण-नीति कारों का अपराध अधिक गम्भीर इसलिए हो जाता है क्योंकि उनका वास्तविक लक्ष्य जनरल सिंह पर चोट करना नहीं है। उन्हें तो, मत-दान केन्द्रों तक अपने इस दुष्‍प्रचार को सही ठहराते जाना है कि भाजपा की ओर से नरेन्द्र मोदी को प्रधान मन्त्री पद का दावे-दार ठहराये जाने से देश में ‘साम्प्रदायिक’ ध्रुवीकरण होने का संकट गहरा गया है।

पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह को लेकर एक तथा-कथित बड़ा खुलासा हुआ है। तथा-कथित इसलिए कि औसत नागरिक को भले ही यह लगने लगा हो कि सेवा-निवृत्त जनरल ने, अपने पद का दुरुपयोग करते हुए, कोई एक बहुत अनोखी गुप्‍तचर गति-विधि करवायी थी किन्तु विशेषज्ञ जान-कारों की बड़ी संख्या, खुलासे के सच या झूठ होने की बहस में पड़े बिना, ऐसे किसी घटना-क्रम में अनोखे-पन के किसी भाव अथवा आशय के छिपे होने को सिरे से नकारती है। इन विशेषज्ञों का दावा है कि ऐसी गति-विधियाँ सुरक्षा बलों की शाश्‍वत्‌ सचाई रहती आयीं हैं। वह भी केवल हमारे देश की नहीं, अपितु समूचे देशों की। और इसीलिए, सरकार इस तथा-कथित खुलासे की ऐसी कोई गम्भीर जाँच कभी नहीं करवायेगी। उनके पास इस दावे के ठोस आधार भी हैं। और, वे सभी यह स्पष्‍ट करने के लिए पर्याप्‍त हैं कि इस तथा-कथित खुलासे का लक्ष्य आसन्न चुनावों में भोले मत-दाताओं को येन-केन-प्रकारेण प्रभावित करना भर है। ‘खुलासे’ के तत्‍काल बाद रक्षा-विश्‍लेषक भरत वर्मा द्वारा किये गये विश्‍लेषण को जिस किसी ने, पूर्वाग्रह से उठ कर, उसमें निहित पूरी गम्भीरता से समझा है उसे खुलासे के पीछे छिपी ‘वोट बटोरने के लिए किसी भी स्तर तक गिर जाने की यह नीयत’ बड़ी सरलता से दिख जाती है।

दरअसल, देश के एक बड़े अंग्रेजी अखबार ने खबर छापी कि पूर्व सेनाध्यक्ष ने २०१० में, अपने निजी स्तर पर, सेना की एक विशेष गुप्‍त-चर शाखा गढ़ी। संकेतों ही संकेतों में आरोप उछाला कि जनरल सिंह ने ऐसा अपने दो निहित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया। कहा गया कि जहाँ उन्होंने करोड़ों की भारी राशि का घोटाला किया वहीं जम्मू-काश्‍मीर के एक मन्त्री ग़ुलाम हसन मीर को एक करोड़ से भी अधिक की मोटी धन-राशि इसलिए दी कि वे राज्य के मुख्य मन्त्री उमर अब्दुल्ला की सरकार का तख़्ता-पलट करा सकें। दावा तो यह तक किया गया कि इस गुप्‍त-चर यूनिट के गठन, उसके क्रिया-कलाप और इसमें हुए समस्त खर्च से केन्द्रीय सरकार पूरी तरह से अन-भिज्ञ रही। ऐसी स्थितियों में केन्द्र की ओर से आरोपों को मुखर करने के विशेषज्ञ मनीष तिवारी ने भी मीडिया को बुला कर यह व्यक्‍त करने में कोई देर नहीं लगायी कि यदि कोई दोषी पाया गया तो, फिर वह भले ही ‘सेवा-रत्‌‌’ हो या फिर ‘सेवा-निवृत्त’, उस पर कार्यवाही करने में थोड़ा सा भी संकोच नहीं किया जायेगा!

सब कुछ बहुत योजना-बद्ध रूप से हुआ। सम्भवत:, ‘सूत न कपास और जुलाहों में लठा-लठी’ को चरितार्थ करते हुए, औसत भोले मत-दाताओं के बीच सारी बहस ‘कांग्रेस-विरोधी और कांग्रेस-समर्थक’ धुरियों में बँट गयी। राजनैतिक अस्ति‍त्व के संकट से घिरी यूपीए के लिए, इसी वर्ष होने वाले विधान-सभा और फिर अगले वर्ष होने वाले लोक सभा चुनावों में, विरोधियों के स्वप्‍नों को धूमिल करने की इससे उत्तम गोपनीय रण-नीति और क्या हो सकती थी? किन्तु, यह उत्सुकता का विषय तो हो सकता है कि खुलासा करने वाला अखबार यूपीए के इस गुप्‍त षडयन्त्र में बराबरी का भागीदार था अथवा वह भी इसका शिकार हुआ? दबायी गयी सचाइयों की खबरों की ‘पहले-पहल’ खोज में अपना सब कुछ झौंक देने वाले मीडिया से, उतावली में, सचाई की पड़ताल के लिए अधिक गहराई में नहीं उतरने जैसी चूक हुई हो तो कोई अचरज नहीं। यहीं एक और भी चूक होती दिख रही है — हर उस विश्‍लेषक से जिसे खुलासे में एक सोचा-समझा राजनैतिक षडयन्त्र दिख रहा है। अपने विश्‍लेषण में किसी राजनैतिक निष्‍कर्ष तक पहुँचने की हड़बड़ी में वे भी उतावले हुए दिख रहे हैं।

स्वयं भाजपा भी बहस को उसी दिशा में ले जाने की उतावली से भरी हुई दिख रही है जिधर ठेलने की कोई गुप्‍त सोच यूपीए के रण-नीति कारों ने बना रखी है। भाजपायी भोंपू गरज रहे हैं कि क्या जनरल सिंह को केवल इसलिए प्रताड़ित किया जायेगा कि वे रेवाड़ी की रैली में मोदी के बगल-गीर हुए थे? दूसरे शब्दों में, राजनीति की सारी कच्ची गोटियाँ जनरल सिंह के किले को सुरक्षा-कवच देने में जुट गयी हैं। राजनैतिक रूप से यह भाजपा की बड़ी भूल साबित होगी, इसमें दो राय नहीं क्योंकि खुलासे की मिसाइल का वास्तविक लक्ष्य जनरल नहीं बल्कि भाजपा स्वयं ही है।

रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो जनरल सिंह पर सेना की जिस टैक्‍टिकल डिवीजन टीम को गुप-चुप गठित करने का आरोप है उसके गठन में कम से कम एक दशक का प्रक्रिया-गत्‌ समय अवश्य लगा होगा। हाँ, जनरल सिंह के सेनाध्यक्ष रहते उस प्रक्रिया की पूर्णाहुति अवश्‍य हुई थी। वहीं, यह एक स्थापित सचाई यह भी है कि अन्तर्राष्‍ट्रीय सीमा पर राष्‍ट्रीय सुरक्षा के बारीक तन्तुओं को पुष्‍ट करने के लिए सेना की ऐसी न जाने कितनी गुप्‍त यूनिटें गढ़ती और फिर समिटती भी रहती हैं। वह भी, अपने पीछे बिना कोई सबूत छोड़े। स्वयं रक्षा मन्त्रालय के उच्च-स्तरीय नियन्ता इन गति-विधियों से अच्छी तरह परिचित होते हैं। यह अकेले भारत की ही नीति नहीं है, दुनिया का प्रत्येक सम्प्रभु राष्‍ट्र ऐसा करता है क्योंकि यह उसकी सम्प्रभुता की सुरक्षा के सबल पक्षों में से एक है। हाँ, यह सरकारों की विवशता अवश्य रहती है कि वे ऐसे किसी आन्तरिक संगठन के अस्तित्‍व के ज्ञान को नकारते रहें। स्पष्‍ट है, जनरल सिंह के माथे पर कलंक की तरह थुपी दिखायी गयी इस गुप्‍त-चर शाखा के गठन की समूची योजना, और बजट का पैसा-पैसा भी, रक्षा मन्त्रालय की स्वीकृति की लम्बी प्रक्रिया से गुजरा है लेकिन सरकार कागजों पर इसके अस्ति‍त्व के अपने ज्ञान को कभी स्वीकारेगी नहीं।

चुनावों के इस मौसम में सरकार ने अपनी इसी ‘टैक्‍टिकल’ ताकत को राजनैतिक हथकण्डे के रूप में झौंक दिया है। और इसी कारण से, भारत जैसे विशाल लोक-तन्त्र की सरकार के इस दुर्भाग्य-जनक अपराध को ‘वोट बटोरने के लिए किसी भी स्तर तक गिर जाने की ओछी और दुर्भाग्य-जनक नीयत’ की तरह देखा जाना चाहिए। यूपीए के रण-नीति कारों का यह अपराध अधिक गम्भीर इसलिए हो जाता है क्योंकि उनका वास्तविक लक्ष्य जनरल सिंह पर चोट करना नहीं है। उन्हें तो, मत-दान केन्द्रों तक अपने इस दुष्‍प्रचार को सही ठहराते जाना है कि भाजपा की ओर से नरेन्द्र मोदी को प्रधान मन्त्री पद का दावे-दार ठहराये जाने से देश में ‘साम्प्रदायिक’ ध्रुवीकरण होने का संकट गहरा गया है।

तथ्य चाहे जो हों, रक्षा-विश्‍लेषकों का दावा है कि केन्द्र सरकार के छुट-भैये और उनके लगुए-भगुए चिल्ल-पों चाहे जितनी मचा लें, इस तथा-कथित खुलासे के सामने आने के बाद किसी गम्भीर जाँच के आरम्भ होने की सम्भावनाएँ शून्य ही हैं। ऐसी जाँचें कांग्रेस के लिए बर्र के छत्ते में हाथ डालने जैसी होंगी क्योंकि राष्‍ट्रीय सुरक्षा की आड़ ले कर अतीत के जितने घपलों-घोटालों को नेहरू-वंशजों ने दबाया है उनके आगे जनरल सिंह का कथित घोटाला पासंग में भी नहीं ठहरेगा। फिर, सचमुच कोई ठोस निष्‍कर्ष हाथ नहीं लगेगा क्योंकि बिना नीयत की किसी खराबी के होते हुए भी सेना के ऐसे क्रिया-कलापों के सारे चिन्ह बे-दाग मिटा देने की रण-नीति अपनायी जाती है। सम्भवत: यही कारण है कि जनरल सिंह ने, बिना विचलित अथवा उत्तेजित हुए, पूरी शालीनता से यह कहा है कि वे पूरे घटना-क्रम पर दृष्‍टि रखे हुए हैं और उसके कानूनी पहलुओं पर विचार कर रहे हैं ताकि उचित समय पर उचित प्रति-क्रिया दे सकें।

क्योंकि सभी कुछ शून्य में से ‘कुछ’ लपक लेने जितना, और महज गला-बजाऊ, समझ में आ रहा है इसलिए एक सम्भावित कल्पना और भी की ही जा सकती है। प्रमाणित करने का पलट-वार नहीं हो तो, इस कथित खुलासे का एक खुलासा यह भी तो हो सकता है कि अब्दुल्लाओं की रीति-नीति से परेशान हुए कांग्रेसी कर्ण-धारों ने स्वयं ही इसकी पहल करवायी हो कि जम्मू-कश्‍मीर से अब्दुल्लाओं का राजनैतिक सफ़ाया करवा दिया जाये। क्योंकि, उनके स्व-पोषित मूल्यांकन में, पिता-पुत्र की यह राजनैतिक जोड़ी राष्‍ट्रीय सम्‍प्रभुता-अखण्डता के लिए गम्भीर संकट बनती जा रही हो। और, इसीलिए रक्षा मन्त्रालय के स्तर पर वह सब हुआ हो जिसका ठीकरा अब जनरल सिंह के सिर फोड़ा जा रहा है। यही नहीं, तथा-कथित खुलासे का एक गम्भीर खुलासा यह भी तो हो सकता है कि स्वयं कांग्रेस के कर्ण-धारों ने यह शिगूफ़ा मीडिया तक पहुँचाया हो। यूपीए सरकार और कांग्रेस पर उछ्ली आरोप की यह सम्भावना सटीक भी प्रतीत होती है क्योंकि रक्षा मन्त्रालय की अत्यन्त गोपनीय आन्तरिक गति-विधियों की ऐसी किसी जान-कारी तक दूसरे देशों के खुफ़िया-तन्त्र की पहुँच अपवाद ही होती है।

सवाल खड़ा करने वाले यह पूछ सकते हैं कि कांग्रेसी नेतृत्‍व के लिए ऐसी क्या आवश्यकता आ खड़ी हुई कि वे ऐसा शिगूफ़ा छोड़ें जिसकी आँच में स्वयं उनके अपने ही कर्मों की पोल के खुलने का मार्ग प्रशस्‍त होता हो? लेकिन तब, उन्हें स्वयं ही खुलासों की दो-धारी तलवारों से जुड़ी यह बारीकी समझना होगी कि जहाँ कांग्रेसी नेतृत्‍व को पल-पल के घटना-क्रम और उसके पीछे निहित नीयत का सम्पूर्ण ज्ञान था वहीं वे इसे भी भली-भाँति जानते थे कि समूचे परिदृश्य में उनकी भागीदारी के एक भी प्रमाण पीछे नहीं छोड़े गये थे। सारे के सारे निशान मिटा दिये गये थे। और इस स्थिति में, सारी बीती बातों को एक उन्मादी ‘मुसलमान-विरोधी’ मानसिकता के माथे थोप देना न केवल आसान होता है, मोदी के बगल-गीर होने के अवसर को भुनाते हुए उसे भाजपा पर उड़ेलने की मुँह-माँगी सुविधा भी बैठे-ठाले मिल जाती है। किन्तु देश के दुर्भाग्य से, ऐसी रण-नीति बनाने वाले राजनैतिक रूप से दिवालिये हो चुके उनके चुनावी योजना-कारों ने इस पर विचार करना कतई आवश्यक नहीं समझा कि इस सबसे देश की सम्प्रभुता और अखण्डता को कितनी सांघातिक चोट पहुँचेगी?

(२२ सितम्बर २०१३)