नकारने के अधिकार की सार्थकता

Sarokar

यदि कुल वैध मत-दान के पचास प्रतिशत्‌ से एक भी अधिक मत मत-दाताओं की यह इच्छा व्यक्‍त करने वाले हों कि उपलब्ध उम्मीदवारों में से एक में भी उनका प्रतिनिधि होने की योग्यता नहीं है तो न केवल उस चुनाव-विशेष को निरस्त किया जाना चाहिए बल्कि सभी उम्मीदवारों को आगामी छह सालों के लिए किसी भी चुनावी प्रक्रिया का प्रत्याशी होने से प्रतिबन्धित कर दिया जाना चाहिए।

देश के सबसे बड़े न्याय-मन्दिर से न्याय की देवी ने लोक-तन्त्र की शुचिता के ‘उम्मीदवार को नकरने के अधिकार’ वाले अपने आदेश को पुष्‍ट क्या कर दिया, नीलामी में लोक-तन्त्र का ठेका उठाने वाली बिरादरी में श्‍वाँस की कठिनाई ऐसे फैल गयी जैसे देश को किसी महामारी की आपदा ने घेर लिया हो। लोक-तन्त्र के ठेकेदारों के मुख्यालय ने भी आपा-धापी दिखलायी और वहाँ से आपात्‌-नियंत्रक छिड़काव आरम्भ हो गया। दागी लोक-प्रतिनिधियों को राहत-पैकेज देने वाला अध्यादेश आनन-फानन में हस्ताक्षर के लिए राष्‍ट्रपति महोदय को भेज दिया गया।

इसी बीच न्याय-मन्दिर ने ऐसी जमात के लिए एक और संकट खड़ा कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय से कल आये इस फैसले में चुनाव-मैदान में उतरे सारे ही उम्मीदवारों को एक साथ नकार देने के मत-दाता के अधिकार को स्वीकार लिया गया। यों, मत-दान के दिन मत-पत्र को स्पर्श करने से ही मना कर देश के मत-दाता अपनी यह मंशा पहले से ही व्यक्‍त करते आये हैं लेकिन लोक-तन्त्र का ठेका उठाने वाली बिरादरी इसे अपने ऊपर लगे कलंक के दाग के रूप में स्वीकारने से मना करती आयी है। कारण एकदम स्पष्‍ट है — जन-भावना में भले ही इसे उनकी खुली बे-शर्मी माना जाता हो लेकिन इस कलंक को दस्तावेजों से पुष्‍ट कर पाना कतई असम्भव रहा है। सर्वोच्च न्यायालय का कल का निर्णय इस असम्भव को सम्भव हुआ दिखलाने की लोक-तान्त्रिक आधार-भूत आवश्यकता की पहली सीढ़ी है। और, लोक-प्रतिनिधित्‍व के ठेके को हथिया लेने में माहिर बिरादरी इससे बेचैन हो उठी है।

यों, सर्वोच्च न्यायालय से आये ये दोनों आदेश स्वतन्त्र रूप से सामने आये हैं लेकिन धीरज से विचारने पर समझ में आता है कि दोनों ही, प्रकारान्तर से, परस्पर पूरक हैं। दरअसल, दूसरा आदेश पहले की धार को और आगे तक प्रखर करता है। इसीलिए, जिस तरह से न्याय-मन्दिर से ‘उम्मीदवार को नकारने’ को लेकर मिले अधिकार की निरर्थकता की बातें फैलाने में कोई देर नहीं की गयी उसे देखते हुए यह मान लेने को जी करता है कि जल्दी ही कोई न कोई ऐसा रास्ता खोजने का प्रयास अवश्य किया जायेगा जिसकी सहायता से विधायिका के अधिकार-क्षेत्र में न्याय-पालिका के इस ‘अनधिकृत और अवांछित’ हस्तक्षेप को भी तिलांजलि दी जा सके। बिना इसकी चिन्ता किये कि उसको न्याय की कसौटी पर खरा सिद्ध कर पाना कतई असम्भव होगा।

वहीं दूसरी ओर, झीनी सी ही सही, राष्‍ट्रपति से भेंट कर और उन्हें दागी लोक-प्रतिनिधियों वाले अध्यादेश को वापस भेजने का अभ्यावेदन सौंप कर भाजपा ने अपनी बचत की अध-गढ़ी पगडण्डी तो ढूँढ़ ही ली है। सम्भवत:, इसी कारण से राष्‍ट्रपति ने दागी लोक-प्रतिनिधियों वाले अध्यादेश पर अभी तक हस्ताक्षर नहीं किये हैं। दूसरे शब्दों में, कार्य-पालिका को संकेत मिल चुके हैं कि इस मामले में राष्‍ट्रपति ‘उर्वरक’ सिद्ध नहीं होंगे। इसीलिए, अमेरिका के हवाले, गुरुवार देर रात से ही यह संकेत मिलने आरम्भ हो गये थे कि सरकार कभी भी अध्यादेश को वापस लेने की अपनी मंशा को व्यक्‍त कर सकती है। और यदि ऐसा हो जाता तो, अनैतिक मंशा का जितना ठीकरा प्रधान मन्त्री के सिर फूटता उससे कहीं अधिक इसका कलंक कांग्रेस-यूपीए नेतृत्‍व के माथे चिपकता। और तब, इसका सबसे अधिक खामियाजा प्रधान मन्त्री की कुर्सी पर विराजने को आतुर राहुल गांधी को ही भुगतना पड़ता। जाहिर है, अध्यादेश को निरी बकवास बतला कर कूड़े-दानी में फेक देने वाली राहुल की औचक और अनोखी प्रति-क्रिया इसी आशंका से उत्पन्न भय का परिणाम थी।

बहरहाल, दागी लोक-प्रतिनिधियों वाले अध्यादेश का भविष्य राष्‍ट्रपति के दृष्‍टि-कोण और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा होने वाले किसी सम्भावित मूल्यांकन का मोहताज रहने वाला है। लेकिन, उम्मीदवार को नकारने के अधिकार को उसका सार्थक विधायी स्वरूप कैसे मिले यह सीधे-सीधे नागरिक-चेतना का ही मोहताज रहेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान कि समीक्षा के अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए यह तो स्थापित कर दिया है कि उम्मीदवार को नकारने का मत-दाता का अधिकार मौलिक है और मत-दान के समय इसका विकल्प उसे मिलना ही चाहिए। न्यायालय ने स्वीकारा है कि इस विकल्प के उपलब्ध होने से असंतुष्‍ट मत-दाता मत-दान केन्द्र तक पहुँचेंगे। उसने माना कि मत-दान के प्रति बढ़ने वाला उनका यह रुझान लोक-तन्त्र की जीवन्तता और इस तरह, प्रकारान्तर से, उसकी रक्षा का सबसे महत्‍व-पूर्ण कारक होगा। लेकिन इस मामले में न्यायालयीन दायित्‍व की यह सीमा भी है कि इससे आगे का दायित्‍व विधायिका का है। उसे ही लोक-प्रतिनिधित्व कानून में ऐसा प्रावधान करना होगा जो उसके द्वारा स्वीकृत नागरिक के इस मौलिक अधिकार को किसी भी शंका से परे फली-भूत करता हो। लेकिन, क्या ऐसा तब भी सम्भव हो सकेगा जब देश का आम मत-दाता विधायिका के समक्ष या तो मौन साधे अथवा केवल याचक की भूमिका में गिड़-गिड़ाता हुआ दिखे?

चतुर राजनीति ने अपने पाँसे चल दिये हैं। राजनेताओं की भारी-भरकम बिरादरी मत-दाता तक यह सन्देश पहुँचाने में जुट गयी है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय में तनिक सी भी सार्थकता नहीं है। मत-दान के समय ‘कोई भी नहीं’ की मंशा व्यक्‍त करने के मिले अधिकार से लोक-तान्त्रिक प्रणाली को कुछ भी सार्थक उपलब्धि नहीं होगी क्योंकि न्यायलय ने ईवीएम में ‘कोई भी नहीं’ वाला विकल्प उपलब्ध कराने से आगे कोई ठोस दर्शन नहीं रखा है। इस न्यायिक सीमा का खुला लाभ उठाते हुए राजनैतिक बढ़त के लिए किसी भी गति-विधि से संकोच नहीं रखने वाले लोगों की भारी भीड़ न्यायालय द्वारा सुझाये गये विकल्प की निरर्थकता को ऊँची आवाज में परोस रही है। यह भीड़ सवाल उठा रही है, “इस विकल्प को जोड़ने से आगे क्या?” गैर-राजनतिक छवि वाले गिने-चुने लोगों में से कुछ सुझा रहे हैं कि इस विकल्प को अपने आप में एक ‘उम्मीदवार’ मान लिया जाये और यदि इस विकल्प को प्राप्‍त मत गिनती में बहुमत दिखलाते हों तो सम्पन्न हुए चुनाव को निरस्त कर दिया जाये। लेकिन बहुसंख्य उम्मीदवारों की भीड़ में क्योंकि यह भी सम्भव हो सकता है कि कुल वैध मत-दान के ३० प्रतिशत्‌ से कम मत भी इस विकल्प को ‘विजयी’ हुआ प्रदर्शित कर सकते हैं, यह सुझाव प्रजा-तान्त्रिक प्रणाली को हानि भी पहुँचा सकता है। वहीं, चुनाव-सुधार की न्याय-पालिका की पहल की प्रतिक्रिया में आयी इस नकारात्मकता को दर-किनार करने के लिए एक सुझाव यह भी आया है कि यदि कुल वैध मतों का आधे से अधिक नकारने के अधिकार को चुनने वाला हो तब तो चुनाव निरस्त किये ही जाने चाहिए। यद्यपि इस सुझाव में पर्याप्‍त दम है फिर भी समस्या यही है कि ‘इससे आगे क्या’ वाला सवाल फिर भी अनुत्तरित छूटा रहता है।

जय प्रकाश नारायण के आन्दोलन के बाद से मैं स्वयं भी ‘उम्मीदवार को नकारने’ के अधिकार की बहस का हिस्सा रहता आया हूँ। अस्सी के दशक के आरम्भ में प्रतिष्‍ठित प्रकाशनों में मेरे विचारों को समुचित स्थान दिया जा चुका है। तभी मैंने उन सारे प्रश्‍नों का प्रजा-तन्त्र को स्वीकार्य हल सुझाया था जो आज केवल इसलिए उठाये जा रहे हैं कि जैसे भी हो, मत-दाता को हाशिये से बाहर निकलने से रोक रखा जाये। उच्चतम्‌ न्यायालय ने जो निर्णय सुनाया है, और उसकी सार्थकता पर जो कुछ भी कीचड़ उछाला जा रहा है, उस सब का सरल सा समाधान मैं बरसों पहले रख चुका हूँ।

मेरा मानना है कि यदि कुल वैध मत-दान के पचास प्रतिशत्‌ से एक भी अधिक मत मत-दाताओं की यह इच्छा व्यक्‍त करने वाले हों कि उपलब्ध उम्मीदवारों में से एक में भी उनका प्रतिनिधि होने की योग्यता नहीं है तो न केवल उस चुनाव-विशेष को निरस्त किया जाना चाहिए बल्कि चयन के लिए उपलब्ध रहे सभी उम्मीदवारों को आगामी छह सालों के लिए किसी भी चुनावी प्रक्रिया का प्रत्याशी होने से प्रतिबन्धित कर दिया जाना चाहिए। ऐसा हो जाने से राजनीति में उतरने वाले आपराधिक भूमिका वाले अथवा केवल मत काटने की नीयत से खड़े किये गये किराये के उम्मीदवार प्रजातन्त्र का उपहास उड़ाने से कठोरता पूर्वक वंचित किये जा सकेंगे। इस इकलौते चुनाव-सुधार से प्रजा-तन्त्र की नींव इतनी पुष्‍ट होगी कि राजनीति से अपराधी-करण का भूत हवा हो जायेगा। इसी में प्रजा-तन्त्र की यथार्थ सार्थकता निहित है क्योंकि तभी जन-तन्त्र में आम जन अपनी भूमिका के निर्वाह के प्रति उत्तरोत्तर उत्सुक होते जायेंगे।

(२८ सितम्बर २०१३)

1 comment

    • जय प्रकाश on September 29, 2013 at 11:36 am

    धन्यवाद व बधाई आपको और सत्येन्द्र त्रिपाठी जी सहित उन सभी को जिन्होंने प्रजातंत्र के सुधार में इतना बड़ा योगदान दिया।
    परन्तु सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मैले हुए प्रजातंत्र की धुलाई भर है, अब साबुन तथा मैल को पृथक न किया गया तो धोने की सारी मेहनत निरर्थक ही होगी।

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