थमा नहीं है गुजरात लोकायुक्‍त तमाशा

Sarokar

पद त्यागने की चिट्‍ठी के सार्वजनिक होने में नामित लोकायुक्‍त की निजी हिस्सेदारी कितनी थी, यह अनुसंधान का विषय हो सकता है किन्तु उसके प्रकाश में मेरी उत्सुकता पर उनकी गहरी चुप्पी पूरी गम्भीरता से संकेत दे रही है कि गुजरात लोकायुक्‍त का तमाशा अभी थमा नहीं है। किसी नये अध्याय का जल्दी ही खुलना बिल्कुल पक्का है।

५ अप्रैल २०१३ के अपने लेख ‘मोदी दा जवाब नहीं’ में मैंने ३ अप्रैल २०१३ को गुजरात विधान सभा द्वारा गुजरात लोकायुक्‍त आयोग अधिनियम, २०१३ को पारित किये जाने पर टिप्पणी की थी, नरेन्द्र मोदी के लिखे इस नये अध्याय का मजा यह है कि इसके सदमे से बाहर आने पर भी शुतुरमुर्गी राज-नेता केवल लाचार रहने को अभिशप्‍त रहेंगे। अब राज्यपाल ही उनके अन्तिम आसरे हैं। यद्यपि उनके बारे में यह कहना ही अधिक सुरक्षित होगा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राज्य में लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति के विवाद पर अपील क्र० ८८१४/१२ और ८८१५/१२ में २ जनवरी २०१३ को पारित हुए अन्तिम निर्णय के बाद अब उनका विवेक उन्हें इसके लिए तत्‍पर होने से रोकेगा कि वे अध्यादेश को वापस करने जैसा कोई कदम उठायें क्योंकि उनका ऐसा कोई भी कदम न केवल राजनैतिक झंझावात खड़ा करेगा बल्कि ऐसा होने पर उनके विरोध में किसी गम्भीर न्यायिक टिप्पणी के आने की भी सम्भावना रहेगी। अतीत में इससे बाल-बाल बची कमला बेनीवाल ऐसे जोखिम को न्यौतने से निश्‍चय ही कतरायेंगी। किन्तु राज्यपाल द्वारा लोकायुक्‍त के रूप में नामित पूर्व न्यायाधीश रमेश ए मेहता द्वारा ६ अगस्त २०१३ को उन्हें और गुजरात उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि मैंने परिस्थितियों को आँकने की हड़बड़ी में चूक की थी।मुझे लोकायुक्‍त के स्वयंवर की इस बिसात के दूसरे सम्भावित शातिरों की क्षमताओं को भी आँक लेना चाहिए था।

पूर्व न्यायाधीश के पत्र को देखते ही बिल्कुल सीधी उत्सुकता होती है कानून और संविधान की समीक्षा करने में पक्षपाती और दायित्वविमुख रहने की किंचित्‌ सी आशंका से मुक्‍त रहा मान लिये जाने से ही जिस विधि-वेत्ता ने ‘न्याय-मूर्ति’ कहलाने का आजीवन आधिकार अर्जित किया है क्या वह इस वैधानिक सचाई से अनभिज्ञ भी हो सकता है कि राज्य लोकायुक्‍त के पद पर किसी की नियुक्‍ति उस राज्य के राजपत्रीय प्रकाशन के अधीन नहीं होती? वैधानिक परम्परा यह रही है कि ऐसी नियुक्‍ति राज्यपाल द्वारा ‘नियुक्‍ति के वारण्ट’ से सुनिश्‍चित होती है? यही नहीं, लोकायुक्‍त के पद पर नियुक्‍ति की प्राथमिक योग्यता रखने वाले न्याय-वेत्ता से यह अपेक्षा भी रखी जाती है कि वह भली-भाँति जानता होगा कि अपनी नियुक्‍ति को ठुकराना हो तो इसके लिए उसे केवल और केवल नियोक्‍ता राज्यपाल को ही इसकी सूचना देनी है। यह समझा जा सकता है कि, कारण चाहे जो हों, नियुक्‍ति को अस्वीकार करने की वैधानिक औपचारिकता पूरी कर देने के बाद वह उन सबको आभार-प्रदर्शन सूचक वैयक्‍तिक पत्र लिख सकता है जिन्होंने या तो उसे इस हेतु योग्य माना था या फिर उसकी ऐसी नियुक्‍ति में प्रत्यक्ष-परोक्ष भूमिका निभायी थी। ठीक इसी तरह, उसे ऐसे प्रत्येक व्यक्‍ति की प्रत्यक्ष-परोक्ष आलोचना का भी अधिकार है जिसने उसकी नियुक्‍ति की प्रक्रिया को बाधित करने की मंशा से उस पर ऐसे दोषारोपण किये जो सचाई से कतई परे हों।

नि:सन्देह, केवल न्याय-पीठ पर विराजित हो चुकने से एक न्याय-मूर्ति इन नैसर्गिक अधिकारों से वंचित नहीं हो जाता है। उसके पास यह तीनों अधिकार एक सामान्य नागरिक की ही तरह आ-जीवन बने रहते हैं। किन्तु, इन तीनों ही घटकों का घाल-मेल कर नियुक्‍ति अस्वीकारने का निवेदन करने, और अस्वीकार्यता के ऐसे निवेदन को नियोक्‍ता के अतिरिक्‍त किसी अन्य को भी औपचारिक रूप से सम्बोधित करने को एक ‘न्याय-मूर्ति’ के उससे अपेक्षित ‘लोक-तान्त्रिक प्रपंचों से निर्लिप्‍त रहने’ के दायित्‍व से विमुख होने के रूप में ही देखा जायेगा। विशेष रूप से तब जब वह ऐसे पत्र में अतीत की अपनी न्यायिक प्रतिष्‍ठा की दुहाई देता दिख रहा हो! यही नहीं, पत्र[i] को पढ़ने से सरसरे ढंग से भले ही यह दिखायी देता हो कि नामित लोकायुक्‍त ने भी राज्यपाल को ही अपना पंच बनाया है लेकिन पत्र में छिपी शातिर मंशा की वास्तविक गहराई तक उतरने से समझ में आता है कि अपनी चाल को चलते हुए उन्होंने न केवल गुजरात राज्य के मुख्य न्यायाधीश को बल्कि उस समूची न्याय-पालिका को भी उकसाया है जिसके सामने प्रस्तुत हो कर अपना कानूनी पक्ष विधि-वत्‌ रखने से बचने को उन्होंने सर्वोपरि प्राथमिकता दी थी।

नामित लोकायुक्‍त ने नियुक्‍ति के आमण्त्रण को अस्वीकार करने की अनुमति देने के साथ ही दोनों माननीयों से स्वयं को ‘मुक्‍त करने’ का निवेदन कर दिया है। मजा यह कि उन्होंने इसी पत्र में, लगे हाथों, सबसे अन्त में यह भी जोड़ दिया है कि पद त्यागने के अपने इस निर्णय के उचित-अनुचित होने पर वे द्विविधा से घिरे हुए हैं। इस सारे परिप्रेक्ष्य में कुछ को यदि यह लगता हो कि पूर्व न्यायधीश ने सम्भावनाओं के सारे द्वार खोल रखे हैं तो किसी को आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए। वहीं दूसरी ओर राज्य के संवैधानिक प्रमुख ने अभी तक मनोनीत लोकायुक्‍त के इस निवेदन पर, औपचारिक-अनौपचारिक, कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। सरल शब्दों में, राज्य के राजनैतिक नेतृत्व के पास लोकायुक्‍त की प्रक्रिया नये सिरे से प्रारम्भ करने का विकल्प अभी तक खुला नहीं है। दूसरे शब्दों में, राजनीति की बिसात पर वे सारे विकल्प खोल कर रखे गये हैं जिनसे देश की आगामी राजनैतिक लड़ाई को यथा-सम्भव प्रभावित किया जा सकता हो।

यही कारण है कि जैसी कि हमारी प्रत्यक्ष-परोक्ष राजनैतिक परम्परा है, गुजरात के राज्यपाल और मुख्य न्यायाधीश जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर प्रतिष्‍ठित दो पदाधिकारियों को सम्बोधित यह पत्र बिना किसी विलम्ब किये सार्वजनिक हो गया और मीडिया में इसकी व्यापक चर्चा भी हुई। चर्चा भी ऐसी जो सोचे-समझे ढंग से पूरी तरह एक-तरफ़ा थी मोदी की नीयत पर गम्भीर हमले। हमले भी ऐसे-वैसे नहीं, नामित लोकायुक्‍त द्वारा लिखे गये पत्र की विषय-वस्तु को तोड़-मरोड़ कर उसे न्याय-मूर्ति मेहता द्वारा मोदी पर लगाये गम्भीर आरोपों के रूप में आम नागरिकों के बीच दोहरा-दोहरा कर परोसा गया। यों इसके अगले ही दिन, नरेन्द्र मोदी की ओर से पत्र की विषय-वस्तु का बिन्दु-वार खण्डन भी कर दिया गया लेकिन न्याय-मूर्ति मेहता के पत्र का बढ़-चढ़ कर बखान करने में जुटे किसी भी मीडिया संस्थान ने इस खण्डन[ii] का उल्लेख भी किया हो यह न तो देखने में आया और ना ही सुनने में।

वैसे तो नामित लोकायुक्‍त का पत्र और मोदी का खण्डन, दोनों ही, ‘प्रत्‍यक्ष को प्रमाण क्या?’ भाव में सिक्के के परस्पर पहलू हैं। और, यह भी बहुत महत्व-पूर्ण है कि मोदी ने, बिना कोई लाग-लपेट किये, नामित लोकायुक्‍त के कथनों के जो बिन्दु-वार खण्डन किये हैं उन्होंने उनमें से एक का भी खण्डन नहीं किया है। लेकिन मोदी के खण्डन को झूठों का पुलिन्दा मान कर उसकी पूरी तरह से उपेक्षा भी कर दें तब भी स्वयं नामित लोकायुक्‍त के पत्र के दूसरे ही पैराग्राफ़ से, किसी भी सन्देह से परे, स्पष्‍ट हो जाता है कि लोकायुक्‍त के पद पर उनकी नियुक्‍ति को लेकर राज्यपाल और राज्य के मुख्य न्यायाधीश के दों पर विराजित माननीयों के बीच अपने वैयक्‍तिक मान-दण्डों वाली कोई खिचड़ी पक रही थी। नामित लोकायुक्‍त ने लिखा है कि (उन दोनों ने) उन्हें जोर देकर समझाया कि (उनकी नियुक्‍ति का) निर्णय सर्व-सम्मत होगा और उस पर सरकार सहित किसी भी पक्ष को कोई आपत्ति नहीं होगी। अपने पत्र में नामित लोकायुक्‍त आगे लिखते हैं, “…I had my own reason to believe that (it has turned out to be wrong) and I had consented at some personal sacrifice…”। क्योंकि नामित लोकायुक्‍त के वे ‘निजी कारण’ और ‘वैयक्‍तिक बलिदान’ क्या थे, इसकी कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई है इसलिए उन पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी उचित नहीं होगी। फिर भी, अपने पत्र में यदि उन्होंने सच में ही सचाई व्यक्‍त की है तो, बिना किसी द्विविधा के यह तो समझा ही जा सकता है कि राज्यपाल और मुख्य न्यायाधीश जैसे संवैधानिक रूप से प्रतिष्‍ठित पदों पर विराजे महानुभावों ने न्याय-मूर्ति मेहता को सहमत कराने की नीयत से बरगलाने का अत्यन्त गम्भीर नैतिक अपराध किया था।

यों, विवाद की इस लम्बी श्रृंखला में स्वयं को दूध का धुला दिखाने के प्रयास में नामित लोकायुक्‍त ने अपने पत्र के आरम्भिक अंश में जो लिखा उसका सार मात्र यह है कि वे लोकायुक्‍त के पद को स्वीकारने से हिचक रहे थे क्योंकि उन्हें किसी भी विवाद में पड़ने से परहेज है (“…was reluctant, being averse to any controversy.”)लेकिन, पत्र में उनकी अप्रसन्नता के जो ढेरों कारण गिनाये गये हैं उनमें से अधिकांश विवादों के बिल्कुल नये आयामों को जन्म दे रहे हैं। अपनी नियुक्‍ति पर हुई समूची न्यायिक लड़ाई को उन्होंने जिस तरह से परोसा है उसका संक्षेप केवल यह है कि मोदी ने उनके प्रति वैयक्‍तिक विरोध का पूर्वाग्रह पाल रखा था जिसके लिए ‘लोक-धन के पैंतालीस करोड़ फूँक डाले’ थे। जबकि, पूरी न्यायिक प्रक्रिया पर सतर्क दृष्‍टि रखने वाले जानते हैं कि मोदी ने राज्यपाल ने अनुचित हस्‍तक्षेप के विरोध की लड़ाई लड़ी थी और देश के सर्वोच्च न्याय-मन्दिर ने, बड़ी सीमा तक, उनसे सहमति व्यक्‍त की थी। यह भी कि, ‘पैंतालीस करोड़’ के इस आँकड़े की सचाई पर तर्क-वितर्क करने से अधिक महत्व-पूर्ण यह है कि समझा जाये कि गण-राज्य के भाव की संवैधानिक समझ की स्थापना की ऐसी गम्भीर न्यायिक बहसों में इससे कई गुना राशि भी न्यौछावर है।

नामित लोकायुक्‍त द्वारा गढ़े गये आयामों में लोकायुक्‍त कार्यालय के लिए नियत बजट-राशि पर बवाल खड़े करना भी शामिल था। देखने वाले को दिख जायेगा कि वे कहना चाहते थे कि यदि बजट राशि उनके अपने सोच के अनुसार नहीं बढ़ायी गयी तो अपनी नियुक्‍ति का प्रस्ताव उन्हें अस्वीकार रहेगा। यहाँ एक प्रश्‍न जो सहज ही सूझता है वह यह है कि, अपनी नियुक्‍ति का वारण्ट जारी होने से पहले, क्या नामित लोकायुक्‍त इस बजट-राशि के ज्ञान से पूरी तरह अन-भिज्ञ थे? और यह भी कि, यदि सच यही रहा हो तब भी अपनी नियुक्‍ति के प्रस्ताव पर सहमति व्यक्‍त करने से पूर्व ही क्या उन्हें इस विवाद का सन्तोष-जनक हल नहीं निकाल लेना चाहिए था? मजेदार तो यह भी है कि अप्रसन्नताओं की इस लम्बी सूची की उपेक्षा करते हुए उन्होंने पद अस्वीकारने की सूचना देने से पहले राज्य सरकार से २६ जुलाई २०१३ के उस औपचारिक पत्र की प्राप्‍ति तक प्रतीक्षा की जिसकी भाषा, उनके अनुसार, उनकी गरिमा को नकारने की खुली नीयत रखने वाली थी! राज्य सरकार कि ओर से उनकी नियुक्‍ति को स्वीकारने और इसके लिए औपचारिक रूप से उन्हें न्यौतने की तारीख पर मोदी ने बिल्कुल दूसरी कहानी सुनाई है।

नामित लोकायुक्‍त के पत्र की सचाई भले ही यह हो कि उसकी विषय-वस्तु का पर्याप्‍त अंश दूसरों के हवाले से उद्धृत हुआ था फिर भी क्योंकि उसमें बहुत गम्भीर उल्लेख इस भाव में शामिल किये गये थे कि वे गुजरात की तत्‍कालीन सरकार को यथा-सम्भव लांछित कर सकें, इस पत्र की विषय-वस्तु और उसके लेखक की प्रत्यक्ष-परोक्ष नीयत पर कुछ भी टिप्पणी करने से पहले मैंने सीधे उन्हें ही एक पत्र लिखा। २२ अगस्त २०१३ को ई-मेल से लिखे इस पत्र में मैंने जो लिखा था उसका अविकल पाठ निम्नानुसार था

सम्मान्य,

गुजरात के लोकायुक्‍त पद पर अपनी प्रस्तावित नियुक्‍ति को त्यागते हुए आपके दृष्‍टिकोण की खबरें सुर्खियों में रही हैं। आपने कुछ गम्भीर आरोप भी लगाये हैं। मेरी दृष्‍टि में उनमें मुख्य ये हैं –

·                सबसे अहम्‌ आरोप यह है कि सर्वोच्च न्यायालय से तीन-तीन फैसलों के आ जाने के बाद भी मुख्यमन्त्री ने आपकी नियुक्‍ति को राज-पत्र में अधि-सूचित नहीं किया।

आपका आरोप सच में बहुत गम्भीर है। लेकिन उसे ऐसे ही दोहराने से पहले अपनी निम्न कुछ उत्सुकताओं का समाधान करना चाहता हूँ –

1.             क्या राज्यपाल द्वारा लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति के लिये गये निर्णयों की सूचना राज्य सरकार के राज-पत्र में उसी तरह से प्रकाशित किये जाने की वैधानिक परम्परा है जसी कि आपने अपेक्षा व्यक्‍त की है? या फिर इसका कोई अलग ही वैधानिक प्रावधान होता है?

2.            यदि राज-पत्र में प्रकाशित करना ही एक-मात्र वैधानिक विकल्प है तो राज्यपाल द्वारा लोकायुक्‍त की नियुक्‍ति पर लिये गये निर्णयों को राज्य सरकार द्वारा, बिना उनसे निर्देश पाये, राज-पत्र में महज स्व-विवेक से अधि-सूचित कराने का वैधानिक प्रावधान है?

3.            क्या राज्यपाल की ओर से किसी अधि-सूचना को प्रकाशित करने का निर्देश मिलने के बाद राज्य सरकार उसके पालन को वैधानिक रूप से बाध्य होती है? या वह उसे प्रकाशित करने से मना भी कर सकती है?

4.            यह भी कि, क्या राज्यपाल महोदया ने लोकायुक्‍त पद पर आपकी नियुक्‍ति की अधि-सूचना राज-पत्र में प्रकाशित करने का निर्देश राज्य सरकार को दिया था? और, दिया था तो कब?

·                खबरों के हिसाब से क्योंकि राज्य के मुख्यमन्त्री आपको पसन्द नहीं करते हैं उन्होंने आपकी नियुक्‍ति में यथा-सम्भव हर अड़ंगा लगाया।

·                खबरों के हिसाब से आपका विचार है कि मुख्यमन्त्री ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे लोकायुक्‍त के पद पर अपना ‘पिट्‍ठू’ अथवा ‘पलेर’ बैठाना चाहते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि इसी कारण से राज्य में कोई एक दशक से लोकायुक्‍त का पद रिक्‍त है इस पद पर नियुक्‍ति नहीं हुई है।

उपर्युक्‍त दोनों बातों का सहज सा निष्‍कर्ष यही हो सकता है कि बीते एक दशक से सारी सम्भावित नियुक्‍तियाँ केवल इसलिए नहीं हो पायी हैं कि मुख्यमन्त्री ने इसके लिए कभी अपनी सहमति नहीं दी। और, इसके लिए वे ही सीधे-सीधे व इकलौते जिम्मेदार हैं।

क्या आप उपर्युक्‍त निष्कर्ष से पूर्णत: सहमत हैं?

अपनी इन उत्सुकताओं के समाधान के लिए आपके यथा-सम्भव त्वरित प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा रहेगी।

पद त्यागने की चिट्‍ठी के सार्वजनिक होने में नामित लोकायुक्‍त की निजी हिस्सेदारी कितनी थी, यह भले ही अनुसंधान का विषय हो किन्तु उस पत्र की खबरों से मची खल-बली के प्रकाश में मेरी उत्सुकता पर इस पल तक की उनकी गहरी चुप्पी पूरी गम्भीरता से संकेत दे रही है कि गुजरात लोकायुक्‍त का तमाशा अभी थमा नहीं है। किसी नये अध्याय का जल्दी ही खुलना बिल्कुल पक्का है।

(०१ सितम्बर २०१३)