मोदी की बनारस ‘विजय’ का तात्पर्य

Sarokar

यद्यपि परिणाम १६ मई को ही सामने आयेगा लेकिन इतना तो आज ही कहा जा सकता है कि बीते कल का दिन भारतीय प्रजा-तन्त्र में एक महत्व-पूर्ण घटना-क्रम का बीज बो गया है। १६ मई को तो यह पता चलेगा कि ८ मई को बोये गये बीज का फल बबूल के रूप में निकलेगा या फिर आम के?

८ मई के मतदान के आठवें चरण के पूरे होने के बाद आम चुनाव का अब अन्तिम पड़ाव ही बचा है। अब १२ मई को कुल ५४३ में से शेष बचे ४१ लोकसभा क्षेत्रों में भी मत-दाता अपने सामने उपस्थित प्रत्याशियों की महत्वाकांक्षाओं पर अपना अन्तिम निश्चय बतला देंगे। चुनाव के परिणाम पर औसत सोच तो यही होगी कि १६ मई को यह पता चलेगा कि क्या कोई एक दल अपने ही बूते पर अगले पाँच साल सत्ता की मलाई खायेगा या आम जन को एक बार फिर से सत्ता की बन्दर-बाँट वाली मार भोगनी पड़ेगी? कुछ चुनावी पण्डित यह समझाने में भी अपनी वाक्‌-चातुरी झौंकेंगे कि हार अथवा जीत से किस दल में आन्तरिक फूट पड़ने वाली है? लेकिन गहराई से विचार करने पर एक और सम्भावना भी दिख जायेगी। और, क्योंकि यह भारतीय मत-दाता के सोच में होते किसी परिवर्तन की सम्भावना का संकेत भी हो सकती है इसलिए, यदि समय की कसौटी पर खरी उतरी तो बनारस लोक सभा के चुनाव-परिणाम से जुड़ी, यह सम्भावना भारतीय प्रजा-तन्त्र में नींव के पत्थर की महती भूमिका भी निभायेगी।

सतही तौर पर यह प्रश्न उठेगा ही कि केवल एक चुनाव-क्षेत्र की हार अथवा जीत कैसे पूरे देश का राजनैतिक भविष्य तय कर सकती है? बड़ी सीमा तक यह प्रश्न औचित्य-भरा भी प्रतीत होता है क्योंकि बीते ६७ सालों ने राजनैतिक पण्डितों की ऐसी खाम-ख़्याली को अनेक बार स्वयं ही रसातल में डूबते पाया है। दरअसल, मैं इस समीक्षा का कायल नहीं हूँ कि इस चुनाव में बनारस से कौन जीतेगा? क्योंकि, न तो केजरीवाल की बनारसी जीत देश को स्वर्ग बनाने वाली है और ना ही मोदी की बनारस में होने वाली हार से देश और गहरे गड्ढे में गिरने वाला है। फिर भी, मैं अपने विचार पर अडिग हूँ क्योंकि मैं बनारस से आने वाले चुनाव-परिणाम में छिपी एक और सम्भावना भी देख पा रहा हूँ। ८ मई को अमेठी और बनारस में तेजी से अलग-अलग घटे घटना-क्रमों ने ही इस सम्भावना को अचानक ही जन्मा है।

दरअसल, ८ मई को मत-दान के दौरान राहुल अपने चुनाव-क्षेत्र अमेठी में मत-दान कक्ष की ईवीएम तक अनधिकृत रूप से पहुँचे। इस कारण उन पर गम्भीर आरोप लगे। ८ मई को ही प्रियंका की निजी सचिव प्रीति सहाय अमेठी के ही मत-दान केन्द्र में अनधिकृत रूप से मौजूद पायी गयी जहाँ भाजपा प्रत्याशी स्मृति ईरानी से उसकी लम्बी-चौड़ी बहस भी हुई। किन्तु, स्मृति ईरानी द्वारा प्रीति पर गम्भीर आरोप लगाये जाने के बाद भी जिम्मेदार सुरक्षा अधिकारियों ने प्रीति की वहाँ से सुरक्षित रवानगी सुनिश्चित की। मौके पर पूरे समय मौजूद रहे सुरक्षा अधिकारी की यह पक्षपात-पूर्ण सफाई भी मीडिया के कैमरों में रिकॉर्ड हुई कि जब उसे फुरसत मिलेगी वह तभी स्मॄति की शिकायत पर कोई कार्यवाही करेगा। और, वह भी तब जब उसे भाजपा प्रत्याशी की, स्वयं उस अधिकारी के ही सम्मुख घटे घटना-क्रम की अत्यन्त गम्भीर चुनावी शिकायत में सचाई का कोई ‘दम’ दिखेगा!

उधर बनारस में, जिले के निर्वाचन अधिकारी ने मोदी के अपने क्षेत्र के अन्तिम चरण के चुनावी कार्य-क्रम को बाधित करने का हर सम्भव प्रयास किया। आरोप है कि उसने मोदी के जीवन के लिए उत्पन्न होने वाले सम्भावित खतरे की किसी खुफ़िया इन-पुट के नाम पर बनारस में ८ मई के मोदी के चुनावी दौरे के कार्य-क्रम को तहस-नहस करने का षडयन्त्र रचा। और इसके लिए बनारस में मोदी की प्रस्तावित चुनावी रैली से धार्मिक उन्माद फैलने जैसे, चुनाव को प्रभावित करने वाले पक्ष-पात भरे, परोक्ष संकेत फैलाने तक से कोई परहेज नहीं रखा। जाहिर है, सीमित प्रतिशत्‌ के तथा-कथित सवर्णीय हिन्दू मत-दाताओं के विरोध में साम्प्रदायिक वैमनस्य का घृणित ट्रम्प कार्ड चला जा चुका है। और, इस चाल का इकलौता उद्देश्य यही है कि बनरस के चुनावी रण में चाहे जो जीते, यह सुनिश्चित हो कि मोदी की राजनैतिक हार हो। ८ मई का बनारस का राजनैतिक घटना-क्रम यह भी बतलाता है कि विरोधियों को सटीक जवाब देने के लिए मोदी ने भी बनारस की अपनी रैली, गंगा-आरती और बुद्धि-जीवियों से अपनी बात-चीत के प्रस्तावितBJP Ralley चुनावी कार्य-क्रमों को रद्द कर बेहद सतर्क राजनैतिक पैंतरे खेले हैं। और, कम से कम ८ मई का दिन तो यह दिखलाता भी है कि मोदी ने विरोधियों के तरकश से निकले तीरों को उन्हीं की ओर सफलता से मोड़ दिया है। उस दिन किसी ने अपने मुँह से भले ही स्वीकारा नहीं हो पर प्रत्येक मोदी-विरोधी अपने छोड़े तीर के लिए हताशा में पछता रहा था। ८ मई को ऐसा लगा था कि तथा-कथित अल्प-संख्यक वर्ग का मत-दाता भी मोदी की ओर उन्मुख हुआ था।

भारतीय मत-दाता के सोच में होते किसी परिवर्तन की सम्भावना के संकेत की मेरी सोच ८ मई के उपर्युक्त घटना-क्रमों से ही उपजी है। मेरे लिए, मोदी की हार अथवा जीत अपने औसत परिप्रेक्ष्य में अत्यन्त विशिष्ट जैसा कोई महत्व नहीं रखती है। चुनावों में यह सब तो होता ही आया है। लेकिन जैसे आपात्‌-काल के बाद हुए आम चुनाव में इन्दिरा की हार ने देश के प्रजा-तन्त्र को उसके तत्कालीन शिखर पर पहुँचाया था; ठीक वैसे ही बनारस के इस चुनाव में मोदी की भारी बहु-मत से होने वाली कोई जीत देश के मत-दाता के सोच में होने वाले क्रान्ति-कारी परिवर्तन के बीज बोयेगी।

मोदी-विरोधी राजनैतिक दलों के, और मोदी के अपने ही दल के आन्तरिक विरोधियों के भी, लाख प्रयासों के बाद भी यदि बनारस का आम मुस्लिम मत-दाता मोदी में अपार विश्वास व्यक्त कर देता है तो यह विश्वास ऐसा छुतहा सामाजिक सन्देश तक साबित हो सकता है जो हमारे प्रजा-तन्त्र के लिए हित-कारी होगा। इससे देश को जात-पाँत, ऊँच-नीच अथवा साम्प्रदायिक वैमनस्य के बीच बाँटे रखने वाली राजनैतिक सोचों को ऐसी चोट पहुँच सकती है कि वे दो-बारा खड़े होने में वे असमर्थ हो जायें। और यदि ऐसा हुआ तो यह भारतीय लोक-तन्त्र के नये, और अत्यन्त परिपक्व भी, युग का पदार्पण भी होगा। अन्यथा, बनारस में मोदी की पराजय अथवा मामूली सी जीत यह सन्देश देगी कि भारत को अभी भी न जाने और कितने समय तक अतीत के अपने सामाजिक पापों का टोकरा यों ही सिर पर ढोते रहना होगा?

(१० मई २०१३)